चंद्रयान-2: पृथ्वी की कक्षा से चांद की कक्षा का सफ़र

चंद्रयान-2 अब धरती की कक्षा से बाहर निकल चुका है। इसरो का कहना है कि 20 अगस्त तक चंद्रयान-2 चंद्रमा की कक्षा में पहुंच जाएगा और फिलहाल ये धरती की कक्षा से निकलकर चंद्रमा तक पहुंचने की प्रक्रिया में है। ऐसे में आप सोच सकते हैं कि आख़िर ये प्रक्रिया होती क्या है?

-विज्ञान विश्व



दरअसल 22 जुलाई से 14 अगस्त तक चंद्रयान-2 को धरती की कक्षा में रखा गया था। चंद्रयान धरती के कई चक्करों को लगाते हुए धीरे-धीरे चंद्रमा की तरफ़ बढ़ने लगता है। इसी के तहत चंद्रयान-2 की धरती से दूरी बढ़ती जाती है और वो चंद्रमा के क़रीब जाता रहता है। इसी क्रम में 14 अगस्त रात क़रीब 2 बजे इसे एक तरह का तेज़ धक्का दिया गया है, जिससे चंद्रयान-2 के रॉकेट की फायरिंग हुई।


चंद्रयान-2 में पहले से एक रॉकेट होता है। इसकी मदद से एक स्पेशल फायरिंग तब की जाती है, जब सेटेलाइट धरती की कक्षा के पास होता है। इस फायरिंग को ही ट्रांस लूनर इंजेक्शन कहा जाता है। इसी के साथ एक और टर्म 'लूनर ट्रांसफर ट्रांजेक्ट्री' का इस्तेमाल हो रहा है।


जब अंतरिक्षयान धरती की कक्षा छोड़कर चंद्रमा की तरफ जाता है तो जो रास्ता तय किया जाता है, उस रास्ते को लूनर ट्रांसफर ट्रांजेक्ट्री कहा जाता है।'


कितनी जटिल है प्रक्रिया?


ये काम एक निश्चित समय में एक निश्चित दिशा में किया जाता है। ये काम सुनने में तो आसान लगता है लेकिन असल में मुश्किल होता है। क्योंकि आपको शुरुआत धरती से 276 किलोमीटर की दूरी से तय करनी होती है और इसकी मंज़िल होती है 3.84 लाख किलोमीटर दूर। ऐसे में आपका निशाना ऐसा रहे कि आप सही दिशा में सही वक़्त पर पहुंचे।'

चंद्रयान-2 की इस प्रक्रिया में क्या किसी तरह के जोखिम होते हैं?


प्रक्षेपण से लेकर चंद्रमा तक पहुंचने के सारे चरण जोखिम भरे होते हैं। 20 अगस्त को चंद्रमा की कक्षा तक पहुंचने और सॉफ्ट लैंडिंग भी कम जोखिम से भरे नहीं हैं। क्योंकि अगर निशाना सही जगह न लगे तो चंद्रयान-2 चंद्रमा के क़रीब न जाकर कहीं दूर जा सकता है। अभी इसे 39 हज़ार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार दी गई है। चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के बाद इसकी रफ्तार को कम कर दिया जाएगा। इस रफ़्तार को अगर आसानी से समझना है तो यूं समझिए कि इस गति से आप एक घंटे में कश्मीर से कन्याकुमारी के क़रीब छह चक्कर लगा सकते हैं।


चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने के बाद लैंडर ऑर्बिटर से अलग हो जाएगा। इसके बाद आख़िरी स्टेज में चंद्रयान-2 चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की कोशिश करेगा। 'विक्रम' को चंद्रमा पर सॉफ़्ट लैंडिंग के हिसाब से बनाया गया है, ताकि रोवर को नुकसान ना पहुंचे। रोवर का नाम प्रज्ञान है। ये छह पहियों वाला रोबोटिक व्हीकल है, जो चंद्रमा पर चलेगा और तस्वीरें लेगा।