महामारी भारी या बेरोज़गारी?

दुनिया ऐसी दो ऐसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है कि एक से निपटती है तो दूसरी सिर चढ़ जाती है और दूसरी से निपटने की कोशिश में पहली भयानक हो जाएगी.

- रोहित जोशी

दुनियाभर में कोरोनावायरस की महामारी फ़ैलने के बाद उठाए गए लॉकडाउन के ए​हतियातन क़दमों का गहरा असर दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में पड़ा है. तक़रीबन सारी आर्थिक गतिविधियों के ठप पड़ जाने से दुनिया भर में उद्योग धंधे भारी नुक़सान झेल रहे हैं वहीं इसका सीधा असर दुनिया भर में रोजगार संकट के तौर पर भी उभरा है. शुक्रवार को अमेरिकी सरकार की ओर से जारी आंकड़ों से पता चला है कि अप्रैल महीने में रिकॉर्ड स्तर पर दो करोड़ पांच लाख अमेरिकियों ने अपनी नौकरियां खो दी हैं। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ़ स्टेटिस्टिक्स यानि बीएलएस ने बताया है कि बेरोज़गारी दर तीन प्रतिशत के आसपास से सीधे 14.7 प्रतिशत जा पहुंची है जो​ कि 1930 की महामंदी के दौर में हुआ था. इसी तरह के आंकड़े ​भारत से भी आए हैं जहां सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी का आंकलन है कि तक़रीबन 12 करोड़ 20 लाख लोग अपना रोजगार खो चुके हैं. इनमें से तीन चौथाई लोग ऐसे हैं जो कि दिहाड़ी के मजदूर या छोटे व्यापारी हैं.

दुनिया भर में यही आलम है और सरकारें मान रही हैं कि अब लॉकडाउन को और अधिक खींच कर अ​र्थव्यवस्था को हो रहे नुक़सान को झेलना संभव नहीं है. ऐसे में दुनिया भर में सरकारें धीरे धीरे लॉकडाउन को खोलने की ओर कोशिशें कर रही हैं. लेकिन सरकारों का यह क़दम दुनिया भर के उन संगठनों और व्यक्तियों को परेशानी में डाल रहा है जो सीधे तौर पर कोरोना वायरस से मुक़ाबला कर रहे हैं. ऐसे में जबकि संयुक्त राष्ट्र वैज्ञानिक निष्कर्षों के आधार पर यह स्वीकार चुका है कि जब तक कोरोना वायरस का टीका ईजाद नहीं कर लिया जाता इस महामारी से सही अर्थों में जीतना संभव नहीं है. अमेरिका समेत दुनिया भर के देशों में कोरोना का संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है और जिन देशों ने संक्रमण पर कुछ हद तक क़ाबू पाया भी है वहां आशंका जताई जा रही है कि संक्रमण की दूसरी लहर आ सकती है. ऐसे में विश्व स्वास्थ संगठन देशों की लॉकडाउन को खोले जाने की पहल को लेकर आशंकित है कि इससे कोरोना वायरस से सीधे मोर्चा ले रहे संगठनों और व्यक्तियों की चुनौतियों और बढ़ जाएंगी. ऐसे में एक प्रेस वार्ता में विश्व स्वास्थ संगठन के हेल्थ इमरजेंसीज़ प्रोग्राम के प्रमुख माइक र् यान ने अपील की है कि दुनिया भर के देशों को सार्वजनिक स्वास्थ निगरानी के बुनियादी सिद्धांतों को लागू करना होगा. उन्होंने कहा,

''हमें यह भी लगता है कि असुविधाजनक असलियत को स्वीकारना होगा कि हमें सार्वजनिक स्वास्थ निगरानी की ओर वापस लौटना होगा. हमें वापस वहां लौटना है जहां हमें कई महीनों पहले होना चाहिए था. हमें संक्रमण के मामलों की तलाश करनी होगी. उन्हें ट्रेक करना होगा, टेस्ट करने होंगे, उन लोगों को आइसोलेट करना होगा जो कि पॉज़िटिव पाए गए हैं, और उन लोगों को क्वारंटीन करना होगा जो संक्रमित लोगों के संपर्क में आए हैं.''

र् यान ने इस तरह की निगरानी में मानवाधिकारों का ख़्याल रखने का ​भी ज़िक्र किया है. हुए उन्होंने कहा—


''बिना लॉकडाउन्स को अपनाए भी कई देशों ने कोरोना वायरस पर क़ाबू पाया है. ज़रूरत मानवाधिकारों को सुरक्षित रखते हुए ऐसी तक़नीक के सहारे सार्वजनिक स्वास्थ निगरानी करने की है. कई बार हमें ऐसे जवाब तलाशने होते हैं जो कि हैं नहीं. हमें वापस उन बुनियादी सिद्धांतों की ओर वापस लौटने की ज़रूरत है जिनसे हम इस बीमारी पर क़ाबू पा सकें.''

अमेरिका की ओर से WHO के फंड में अपनी हिस्सेदारी को रोक दिए जाने के बाद WHO कोरोनावायरस के प्रकोप को रोकने के अपने प्रयासों में फंड की कमी से भी जूझ रहा है. र् यान ने सभी देशों से साथ आकर इस वासरस से जूझने की अपील की है उन्होंने कहा कि ''एकजुट होकर हम इस लड़ाई को जीतेंगे. हमें ध्यान में रखना है कि तब तक कोई भी सुरक्षित नहीं है जब तक सब सुरक्षित नहीं हों.

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