212 पर्यावरण कार्यकर्ताओं की हत्या

2019 में 212 पर्यावरण और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं की हत्याएं हुई हैं. यह आंकड़ा अब तक सबसे अधिक है.

- Khidki Desk

साल 2019 पर्यावरणवादियों के लिए एक चेतावनी की तरह गुजरा है. इस साल 212 पर्यावरण कार्यकर्ताओं की पर्यावरण और भू​मि अधिकार से जुड़े मसलों पर आवाज़ उठाने के लिए हत्या कर दी गई. यह अब तक किसी भी साल में हुई पर्यावरण कार्यकर्ताओं की हत्या का सबसे बड़ा आंकड़ा है.


यह पर्यावरण कार्यकर्ता पूरी दुनिया के सामने खड़े क्लाइमेट क्राइसिस के दौरान मनमाने ढंग से प्राकृतिक संसाधनों का खनन करने वाले उद्योगों और उनमें सक्रिय माफ़िया के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ें उठाते रहे हैं.

इन आंकड़ों को अपनी एक ताज़ा रिपोर्ट में दर्ज करने वाले ​इंडिपेंडेंट वॉचडॉग Global Witness ने यह आशंका भी जताई है कि Covid-19 के लॉकडाउन के चलते अपने घरों में क़ैद, पर्यावरण कार्यकर्ताओं की हत्याएं करना आसान हो गया है.


2018 में यह आंकड़ा 164 हत्याओं का था. यानि ऐसी हत्याओं में 2019 में साल 2018 की तुलना में 30% का इजाफ़ा हुआ है. इन 212 हत्याओं की ठीक आधी हत्याएं अकेले कोलंबिया और फ़िलिपिंस में हुई हैं. बीते सालों के आंकड़े बताते हैं कि अधिकतर मामलों में इन हत्याओं के लिए किसी को कोई सज़ा नहीं हुई है. जबकि असल आंकड़े दर्ज किए गए आंकड़ों से अधिक है क्योंकि कई ऐसे मामले दर्ज तक नहीं हो पाते.


इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं की 2019 में हत्याएं हुई हैं वे खनन उद्योग से पैदा हो रहे पर्यावरण संकट के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठाते रहे हैं. इस रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों ने फिर एक बार बताया है कि मूलनिवासी आदिवासी समुदायों के लोग पूरी दुनिया में पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों के मुख्य निशाने पर हैं. हत्या किए गए इन 212 कार्यकर्ताओं में से भी 40 प्रतिशत कार्यकर्ता मूलनिवासी आदिवासी समुदायों से हैं.


पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर दुनिया भर में लगातार हमले हो रहे हैं और कार्यकर्ता आरोप लगाते रहे हैं कि उन पर हमला करने वाले समूहों का स्थानीय सत्ता और प्रशासन के साथ गहरा गठजोड़ होता है ​इसके चलते उनपर हुए हमलों या हत्याओं के मामलों की ना ही जांच ठीक से हो पाती है और ना ही कोई कार्रवाई होती है.


इस रिपोर्ट में, Covid-19 के दौर में लगाए गए लॉकडाउन के बीच यह आशंका जताई गई है कि कॉरपोरेशंस, माफिया, सरकार और प्रशासन का यह गठजोड़ पर्यावरण कार्यकर्ताओं के लिए बड़ा ख़तरा साबित हो सकता है. रिपोर्ट में इसे पर्यावरण कार्यकर्ताओं पर आॅपोर्चुनिस्टिक अटैक्स यानि अवसर वादी हमलों का ख़तरा कहा गया है.

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