एक शताब्दी बाद हागिया सोफ़िया में आज होगी नमाज़

1500 सालों का ​इतिहास ख़ुद में समेटी यह इमारत इसे फिर से मस्ज़िद में बदले जाने से पहले पिछली तक़रीबन एक सदी तक एक महत्वपूर्ण म्यूज़ियम रही थी.

- Khidki Desk


इस्तांबुल की एतिहासिक इमारत हागिया सोफ़िया जिसे इतिहास के अलग अलग दौर में आया सोफ़िया, सेंट सोफ़िया जैसे दूसरे नामों से भी जाना जाता रहा है, उसे फिर से मस्ज़िद में बदले जाने की घोषणा के बाद वहां पहली बार आज यानि शुक्रवार को नमाज़ हो रही है. इस्तांबुल के गवर्नर अली येर्लिकाया ने कहा है ,


''मुसलमान इसे लेकर काफ़ी उत्सा​हित हैं और हर कोई इसके उद्घाटन में मौक़े पर वहां होना चाहता है.''

1500 सालों का ​इतिहास ख़ुद में समेटी यह इमारत इसे फिर से मस्ज़िद में बदले जाने से पहले पिछली तक़रीबन एक सदी तक एक महत्वपूर्ण म्यूज़ियम रही थी. इस महीने की शुरूआत में तुर्की की एक अदालत ने हागिया सोफ़िया को मस्ज़िद में बदलने का आदेश दिया था और तुर्की के राष्ट्रपति रैसप तैयप अर्दोगान ने इस दुनिया भर में मशहूर इस म्यूज़ियम को मस्ज़िद में बदलने की घोषणा की थी. आज की नमाज़ के बाद से इस इमारत को ​एक बार फिर से मस्ज़िद की तरह इस्तेमाल किया जाएगा.


पूर्वी रोमन साम्राज्य के ईसाइयत क़ुबूल कर लेने के बाद कुस्तुंतुनिया में छटी सदी में ईसाई धर्म के सबसे बड़े कैथेड्रल के तौर पर हागिया सोफ़िया को बनाया गया था. यह इमारत उसी नई शैली में बनाई गई जो रोमन सम्राट कॉस्टेटाइन के राजधानी को पूर्व की ओर लाकर एक नया शहर कुस्तुंतुनिया बसाने के दौरान विकसित हुई थी. जब पूर्वी रोमन साम्राज्य एक हज़ार साल से अधिक चल चुका था और हागिया सोफ़िया की उम्र भी तक़रीबन 900 साल की हो रही थी, तब ओस्मानली तुर्कों ने एक हमला किया, जिसने पूर्वी रोमन साम्राज्य का अंत कर दिया. 15वीं सदी में ओस्मानली तुर्कों ने कुस्तुंतुनियां पर फ़तह पाई और नतीज़ा यह हुआ कि यहां का जो सबसे बड़ा ईसाई कैथेड्रल था वह अब सबसे बड़ी मस्ज़िद हो गई. 'सेंट सोफ़िया' का नाम 'आया सूफ़िया' हो गया.


पहले विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज़ों ने कुस्तुंतुनिया पर क़ब्ज़ा कर लिया तो इसकी हुक़ूमत वापस इस्लामी हाथों से निकलकर कुछ समय के लिए ईसाई हाथों में आई. यह इमारत ईसाइयों और इस्लाम को मानने वाले लोगों की बीच हमेशा विवाद में रही. बाद में जब मुस्तफ़ा कमाल पाशा आतातुर्क के नेतृत्व में तुर्की का आधुनिकी करण हो रहा था तो 1935 इस विवादित इमारत के विवादों का पटाक्षेप करने के लिए मुस्तफ़ा कमाल पाशा आतातुर्क ने इस इमारत को एक आलीशान एतिहासिक म्यूज़ियम में बदल डाला था. मुसलमानों का रूढ़ीवादी तबका हमेशा इस क़दम के ख़िलाफ़ रहा. इसी क्रम में पिछले दिनों इस ​इमारत को​ फिर से मस्ज़िद में बदल गया है और आज से यहां नमाज़ पढ़ी जाएगी.


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