पिता का कंधा होता है पहाड़ी दर्रा

Updated: Jun 22

मिन्कियानी दर्रा पिता का कंधा है. मिन्कियानी ही क्यों, कोई भी दर्रा पिता का कंधा ही होता है. दोनों ओर को उठी चोटियाँ कंधों से ऊपर उठ गये पिता के हाथ हैं, जो कंधे पर उचक रहे बच्चे को संभालने की कोशिश में उठे होते हैं. पिता चाहें तो अपनें हाथों को किसी भी दिशा में ऊपर-नीचे, कहीं भी घुमा सकते हैं. शीश के साथ उठी हुई पिता की बांहें वे चोटियां हैं जो पर्वतारोहियों को उकसाने लगती हैं. 

- विजय गौड़


दशहरे के मैदान में दहन होते रावण के पुतले या मेले-ठेले में भीड़ के बीच दूर तक देखने की बच्चे की अभिलाषा को बहलाते पिता को देखा है कभी? आतिशी बाण रावण की नाभी पर आकर टकराया या, अपने आप धूं-धूं कर उठी लपटें- पिता के कंधें पर इठलाता बच्चा ऐसी मगजमारी करने की बजाय खूब-खूब होता है खुश.


बहुत भीड़ भरी स्थिति में बमों के फटने के साथ चिथड़े-चिथड़े हो रहे रावण, मेघनाद और कुम्भकरण के पुतलों को देखने के लिए पिता के कंधें की जरूरत होती है. पिता की बांहों के सहारे कंधे पर पांव रख और बच्चा ऊँचे और ऊँचे ताकने लगता हैं. पिता की बांहें बिगड़ जा रहे संतुलन को सहारा दे रही होती. बाज दफा ऊँचाई के खौफ को दूर फेंक वह सिर के ऊपर ही खड़ा होना चाह रहा होता है.


संतुलन को बरकरार रखने की कोशिश में उठी पिता की बांहें भी उस वक्त छोटी पड़ जाती हैं. बच्चे की उत्सुकता के आगे लाचार पिता अपनी हदों के पार भी कंधों के लम्बवत और शीष के सामानन्तर बांह को खींचते चले जाते हैं. शीष पर खड़े बच्चे का हैरान कर देने वाला संतुलन पिता की बांहों का मनोवैज्ञानिक आधार बना रहता है. बिना घबराये वह खिलखिलाता है, तालियां बजाता है.


वश चले तो उड़ा चला जाये चिंदी-चिंदी उड़ रहे रावण के परखचों के साथ. पिता की लम्बवत बांहें ऐसे किसी भी खतरे से खेलने की ख्वाइश से पहले ही उसे सचेत किये होती हैं. डगमगाते हुए पांवों के बहुत हल्के अहसास पर ही खुली हथेलियों की पकड़ में होता है पूरा शरीर. पिता की बांहों के यागदान को कुछ ज्यादा बढ़ा चढ़ा देने की को मंशा नहीं.


हकीकत को और ज्यादा करीब से जानने के लिए अभ्यास के बल पर किसी चोटी पर पहुँचे पर्वतारोही से पूछा जा सकता है कि पहाड़ के शीष पर खड़े होकर डर नहीं लगता क्या? बहुत गुंजाइश है कि कोई जवाब मिले जिसमें बगल की किसी चोटी का सहारा पर्वतारोही को हिम्मत बंधाता हुआ हो. मेले के बीच पिता के शीष पर खड़े होकर दृश्य का लुल्फ उठाते बच्चे के पांवों की सी लड़खड़ाहट पर सचेत हो जाने की स्थितियां पर्वताराही को भी और उचकने की गुस्ताखी नहीं करने देती हैं.


उचकने की कोशिश में उठी हुई बांहों की पकड़ छूट जाने का सा अहसास होता है और धम्म से बैठने को मजबूर हो जाने की स्थितियां होती हैं. चोटियों के पाद सरीखे दिखते दर्रे पिता के कंधें जैसे होते हैं जहां खड़े होकर कुछ लापरवाह हो जाना खड़ी हुई चोटियों के सहारे ही संभव होता है. करेरी झील से उतरते नाले के बांये छोर के सहारे हम मिन्कियानी दर्रे की ओर बढ़ रहे थे.


मिन्कियानी दर्रा पिता का कंधा है. मिन्कियानी ही क्यों, कोई भी दर्रा पिता का कंधा ही होता है. दोनों ओर को उठी चोटियों कंधों से ऊपर उठ गये पिता के हाथ हैं, जो कंधे पर उचक रहे बच्चे को संभालने की कोशिश में उठे होते हैं. पिता चाहें तो अपनें हाथों को किसी भी दिशा में ऊपर-नीचे, कहीं भी घुमा सकते हैं. शीश के साथ उठी हुई पिता की बांहें वे चोटियां हैं जो पर्वतारोहियों को उकसाने लगती हैं.


कई दफा हाथों को बहुत ऊपर खींचते हुए किसी एक खड़ी उंगली सी तीखी हो गई चोटियों पर चढ़ना कितने भी जोखिम के बाद संभव नहीं. ऐसी तीखे उभार वाली चाटियों के मध्य दिख रहे किसी दर्रे की कल्पना करो, निश्चित ही वह बेहद संकरा हो जाएगा. लमखागा पास कुछ ऐसा ही तीखा दर्रा है, जो हर्षिल के रास्ते जलंधरी के विपरीत दूसरी ओर किन्नौर में उतरने का रास्ता देता है. मिन्कियानी दर्रा वैसा तीखा नहीं. चैड़े कंधे वाले पिता की तरह उसका विस्तार है. मध्य जून में बर्फ के पिघल जाने पाने पर हरी घास से भर जाता है. नडडी तक पहुंचने के बाद जीप मार्ग को एक ओर छोड़ सीधे एक ढाल उतरता है भतेर खडढ तक. भतेर खडढ के किनारे है गदरी गांव. पर्यटन विभाग के नक्शों में ऐसे छोटे-छोटे गांवों का जिक्र बहुत मुश्किलों से होता है. इतिहास को दर्ज करने वाले नक्शों की तथ्यात्मकता के आधार पर सत्यता को जांचते हुए आगे बढ़ जाते हैं.


हम कोई इतिहासविद्ध नही तो भी यह तो कह ही सकते हैं कि सत्ता के लिए खूनी संघर्ष से भरे सामंतों के आपसी झगड़े और उनकी वंशावलियों की सांख्यिकी से भरी इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें ऐतिहासिक दृष्टि से इस देश की भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थिति को समुचित रुप से रख पाने में अक्षम हैं.


उत्तरोतर भारत के बारे में हमारे पास बहुत ही सीमित जानकारी है. वहां रहने वाले लोगों का इतिहास क्या नृशंस आक्रमणों से जान बचाकर भागे हुए लोगों का इतिहास है? पश्चिम भारत को हड़प्पा और मोहनजोदड़ों के बाद हमने खंगाला है क्या? दक्षिण भारत में क्या एक ही दिन में विजय नगर राज्य की स्थापना हो गयी? सिंहली और तमिलों के विवाद की जड़ कहां है? नागा, कुकी और मिजो जन-जाति की संस्कृति को हम कैसे जान पायेगें? जंगलों के भीतर निवास करने वाले लोगों से हमारा रिश्ता कैसा होना चाहिए? ऐसे ढेरों सवालों के हल ढूंढने के लिए दुनिया से साक्षत मुठभेड़ के सबसे अधिक अवसर यात्राओं के जरिये ही मिलते हैं.


हिमाचल के कांगड़ा क्षेत्र के इस बहुत अंदरूनी इलाके को सबसे ज्यादा परिचित नाम वाली जगहों चिह्नित करें तो धर्मशाला और मैकलाडगंज दिखायी देते हैं. नड्डी मोटर रोड़ का आखिरी क्षेत्र है जो मैकलोडगंज से कुछ पहले ही कैंट की ओर मुड़ने के बाद आता है. मैकलोडगंज शरणार्थी तिब्बतियों का मिनी ल्हासा है, जहां दलाई लामा रहते हैं. नाम्बग्याल मोनेस्ट्री में. अपनी कसांग के साथ. मैकलोडगंज की संस्कृति में तिब्बत की हवा है. नक्शे में गदरी ही नहीं, आगे के मार्ग में पड़ने वाले गजनाले के पार बसा भोंटू गांव भी नहीं. भोंटू से ऊपर रवां भी नहीं. भोंटू से आगे न नौर न करेरी गांव. मिन्कियानी दर्रा करेरी के बाद कितनी ही चढ़ाई और उतराई के बाद है.


देवदार, बन, चीड़, अखरोट, बुरांस, कैंथ, बुधु और खरैड़ी यानी हिंसर की झाडि़यों चारों ओर से करेरी गांव का घेरा डाले हुए होती हैं. वन विभाग के विश्राम गृह से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर रिंगाल की झाडि़यां, एलड़, तिरंड के घने जंगलों के बीच से जो रास्ता जाता है, उसे आगे गजेऊ नाला काटता है, जिस पर लकड़ी का पुल है. पुल के इस पार से ही गजेऊ नाले के बांये छोर से सर्पीले रास्ते पर बढ़ लिये. पुल पार नहीं निकले. पुल पार कर लेते तो नौली, मल्ली, कनेाल, बो, दरींडी आदि गांवों में पहुँच जाते.


यूं इस तरह से गांवों की यात्रा जन के बीच घमासान तो नहीं होती पर उखड़ते मेले से घर लौटती भीड़ की तरह लौटना तो कहलाता ही. मेला देखे बगैर घर लौटने का तो सोचा भी नहीं जा सकता. बेशक उछाल ले-लेकर नीचे को तेजी से दौड़ रहा नाला चाहे जितना ललचाये और अपने साथ दौड़ लगाने को उकसाता रहे. उसके मोह में पड़े बगैर उसकी धार के विपरीत बढ़ कर ही मिन्कियानी की ऊंचाई तक पहुंचा जा सकता था. पहाड़ की पीठ पर उतरता नाला ऐसे दौड़ रहा था मानो पिता की पीठ पर नीचे को रिपटने का खेल, खेल रहा हो.


पिता हैं कि पीठ लम्बी से लम्बी किये जा रहे हैं. छोटा करने की कोशिशों में होते तो तीव्र घुमावों के साथ नाला भी घूम के रिपटता. बल्कि घुमावों पर तो उसकी गति आश्चर्यमय तीव्रता की हो जाती. पैदल मार्ग के लिए बनी पगडंडी भी ऐसे तीव्र घुमावों पर सीढ़ी दार. हम पिता की पीठ पर चढ़कर कंधें की ऊंचाई तक पहुंच जाना चाहते थे. कंधे पर खड़े होकर दुनिया को निहारने के बाद मिन्कियानी की दूसरी ओर की ढलान पर उतर जाना हमारा उद्देश्य था. दूसरी ओर नाले के साथ-साथ, पिता की दूसरी पीठ पर उतर जाना चाहते थे. दोंनों ओर की ढलान पिता की पीठ थी. पिता का हमसे कोई सामना नहीं जो हमें अपनी छाती दिखाते. वे दोनों ओर अपनी पीठ पर हमारे बोझ को झेलने लेने की विनम्रता भरी हरियाली से बंधे हैं. अपने कंधें को दर्रे में बदल देने वाले पिता की धौलादार पीठ पर मिन्कियानी दर्रा हमारा गंतव्य था.


करेरी, नौली, छतरिमू, कोठराना, शेड, चमियारा, गांवों के लोग अपने जानवरों के साथ करेरी लेक के गोल घेरे से बाहर दिखायी देती पत्थरीली जमीन पर छितराये हुए थे. गाय भैंसों को उससे आगे की चढ़ाई पर ले जाना बेहद कठिन है. लेक के उस गोल धेरे में अपने अपने कोठे में वे टिक गये. जवान छोकरे बकरियों को लेकर लमडल की ओर निकल गए. बकरियां दूसरे दूधारू-पालतू जानवरों से भिन्न हैं. कद-काठी की भिन्नता और देह में दूसरों से अधिक चपलता के कारण वे पहाड़ के बहुत तीखे पाखों पर पहुंच जाती हैं. हरी घास का बहुत छोटा सा तृण भी उन्हें तीखी ढलानों तक पहुंच जाने के लिए उकसा सकता है. वे चाहें तो किसी भी ऊंचाई तक जा सकती हैं. लेकिन उनके रखवाले जानते हैं कि एक सीमित ऊंचाई के बाद भेड़-बकरियों के खाने के लिए घास तो क्या वनस्पति का भी नामोनिशान नहीं.


ऊंचाई की दृष्टि से कहें तो लगभग 14000-15000 फुट की ऊंचाई के बाद जमीन बंजर ढंगार है. बर्फ से जली हुई चट्टानों के बाद बर्फ के लिहाफ को ओढ़ती चटटानों की उदासी अपने बंजर को ढकने की कोशिश में बहुत कोमल और कटी फटी हो जाती है. ऊंचाईयों तक उठते उनके शीष, उदासी का उत्सव मनाते हुए, गले मिलने की चाह में दो चोटियों के बीच दर्रे का निर्माण कर देते हैं. बहुत फासले की चोटियों के मिलन पर होने वाले दर्रे का निर्माण इसी लिए बाज दफा एक सुन्दर मैदान नजर आने लगता है. मिन्कियानी वैसा चोड़ा मैंदान तो नहीं, लेकिन सीमित समतलता में वह हरियाला नजर आता है. तीखी ढलान वाला दर्रा.


करेरी झील से मिन्कियानी के रास्ते बोल्डरों पर चलना आसान नहीं. वह भी तीखी चढ़ाई में. कुछ जगहों पर चट्टान इतनी तीखी हो जाती है कि बिना किसी दूसरे साथी का सहारा लिये चढ़ा नहीं जा सकता. एक संकरी सी गली जिसके दूसरी ओर भी वैसा ही तीखा ढाल और पत्थरों का सम्राज्य है, मिन्कियानी कहलाता हुआ है. करेरी के बाद मिन्कियानी पार करने से पहले एक ओर झील है. मिन्कियानी के दूसरी ओर भी एक बड़ी झील-गजेल का डेरा है. गजेल का डेरा खूबसूरत कैम्पिंग ग्राऊंड है. गद्दियों का घर कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं. पीने के लिए पानी हो, भेड़ बकरियों के चारे के लिए घास हो और सहारे के लिए ओट- बस इतना ही तो एक गद्दी का ठिकाना. कितनी खोह और कितने उडयार पनाहगाह हैं लेकिन घर नहीं कह सकते उन्हें. कितने ही अमावास और चांद की भरी पूरी रात गुजारते हुए भेड़ो के बदन पर चिपकती झुर-झुरी और कच्ची बर्फ ऊन में बदलने का खेल ऐसे ही जोखिमों में खेला जा सकता है. कितनी गुद-गुदी और कितनी चिपचिपाहट है बर्फ में, ठिठुरन कितनी, कितने ही रतजगे हैं गद्दी के जीवन में घुलती चिन्ताओं के कि अबकि बर्फ देर से पड़े और देर तक बची रहे घास. भेड़-बेरियों के लिए बची रहे घास, उनके सपनों में ऐसे ही उतरती है रात.


बहते पानी के साथ आगे बढ़ें तो एक झील पर पहुचेंगे. जिसके रास्ते हमें दरकुंड पहुंचना है. यदि पानी के विपरीत दिशा में बढ़ें तो सीधे लमडल पहुँच जायेगें. गजेल के डेरे से लगभग चार गुना बड़ी झील. लमडल तक का रास्ता झीलों का रास्ता है. लमडल से निकल कर भागता जल झील के रूप में कैद हो जाता है. लमडल भी एक झील है. बल्कि लमडल तक पूरी सात झीलें हैं. लमडल से निकल कर तेज ढाल पर भागते पानी की खैर नहीं. नदी होने से पहले उसे जगह जगह मौजूद झीलों के साथ कुछ समय गुजारना है. रूप बदलकर हर क्षण भागती बर्फ को अपने आगोश में समेट लेने को आतुर धौलादार की यह श्रृंखला इस मायने में अदभुत है. लमडल से उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ें तो चन्द्रगुफा तक पहुंच सकते हैं. चंद्रगुफा भी एक झील है. वहां से आगे नगामण्डल निकल सकते हैं. एक झील का अपना सौन्दर्य है. लमडल एक बड़ी झील है. नीचे की ओर उतरते हुए झीलों के आकार अनुपात में छोटे होते चले गए हैं. नागमण्डल को इन्द्राहार पास के रास्ते का ही पड़ाव कह सकते हैं. यूं नागमडल से नीचे उतरने लगे तो होली गांव पहुंचा जा सकता है. धौलादार की इस श्रृंखला में भुहार, बल्यानी, मिन्कियानी, भीम की सूत्री, इन्द्राहार, जालसू, थमसर और न जाने कितने ही दर्रे हैं जो कांगड़ा और चम्बा घाटी के द्वार भी कहे जा सकते हैं। वैसे इन्हें पिता का कंधा कहें तो पिता के कंधे पर चढ़कर मेला देखने का उत्साह अपनी तरह से उकसाता है.

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