नरमुंडों का मौन साक्षात्कार

ये नरमुंड इतिहास के कालखंड से निकल कर अपना परिचय कराने की कवायदों में छटपटा रहा है. ये सिर यहां पर अकेला नहीं है. ऐसे लगभग ढाई सौ नरमुंड और भी हैं. इन नरमुंडों तक पहुंचने में मुझे अपने साथियों के साथ कई दिनों की कठिन पदयात्रा करनी पड़ी और जब इनके पास मौन साक्षात्कार लेने पहुंचे तो हमने सबको अपने चारों ओर बैठा पाया. मानो वो अपने इतिहास के बारे में बताना चाह रहे हों.

- मनमीत

ये जो मेरे हाथ में है न। किसी महानुभाव का नर मुंड है। जो इतिहास के कालखंड से निकल कर अपना परिचय कराने की कवायदों में छटपटा रहा है। ये सिर यहां पर अकेला नहीं है। ऐसे लगभग ढाई सौ नरमुंड और भी हैं। इन नरमुंडों तक पहुंचने में मुझे अपने साथियों के साथ कई दिनों की कठिन पदयात्रा करनी पड़ी और जब इनके पास मौन साक्षात्कार लेने पहुंचे तो हमने सबको अपने चारों ओर बैठा पाया। मानो वो अपने इतिहास के बारे में बताना चाह रहे हों, वो बताना चाह रहे हों कि देखो तुमने हमारे बारे में फलां किताब में गलत लिखा। वो कहानी तो बिल्कुल ही गलत है। सुनो हम तुम्हे असली कहानी सुनाते हैं। लेकिन, फिर वो ही नुरमंड चुप हो जाते हैं, जब उन्हें खुद अहसास होता है कि हम तक अपनी आवाज पहुंचाने की उनकी ये असफल कवायदे हैं।


हिमालयी श्रंखलाओं के दामन में छुपे कई रहस्यों में से एक है ‘रूपकुंड’। चमोली जिले में नंदादेवी पर्वत के ट्रेक में पढ़ता है रूपकुंड। 12 साल में होने वाली नंदादेवी यात्रा भी रूपकुंड से होकर ही जोरागली दर्रा होते हुये होमकुंड जाती रही है।रूपकुंड एक ऐसा रहस्य है, जिसकी गुत्थी सुलझाने में कई देशों के वैज्ञानिक लगे हुये हैं। वाडिया हिमालयन भू-विज्ञान संस्थान के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक भी इस रहस्य पर अपनी बात विभिन्न मंचों से रख चुके हैं। जब हम रूपकुंड पहुंचे तो झील का पानी जमा हुआ था। हम उसके ऊपर भी चल सकते थे। चारों तरफ नर कंकालों के ढेर लगे हुए थे। कुछ झील के अंदर बर्फ में गले भी नहीं थे। वो साबूत दिख रहे थे और उनकी आंख काफी डरावनी लग रही थी। हमने कुछ दूरी पर ही अपना टैंट गाड़ दिया। रात काटने के लिये।


इन नर-कंकालों के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। कोई कुछ कहता है और कोई कुछ, लेकिन जो सबसे ज्यादा मान्यता प्राप्त कहानी है। वो ये है कि 11वीं शताब्दी में राजा मान सिंह ने तिब्बत पर हमला कर उन्हें हरा दिया था। तिब्बत को हराने के बाद उन पर राजा मान सिंह की ओर से टैक्स लगाया गया। जिसमें कई मण घी, कई सेर दालें आदि शामिल थीं। टैक्स की ये लिस्ट तिब्बती राजा को थमाने के बाद राजा की एक टुकड़ी इसी रास्ते से होकर वापस लौट रही थी। जहां पर रूपकुंड है, वहां पर पहले एक छोटा से समतल मैदान था जो एक ग्लेशियर के नीचे गुफा नुमा था। रात होने पर थकी फौज की टुकड़ी वहीं पर रुक गई और खाना बनाने के लिए आग लगाई गई। आग से ग्लेशियर का एक बड़ा हिमखंड पिघल कर फौज के ऊपर गिर गया। सभी दब गए। अब हजार साल बाद वहीं पर एक झील बन गई और सैनिकों के दबे शव यहां वहां बिखरे हुए हैं। तापमान शून्य से नीचे होने के कारण कई शव अभी पिघले भी नहीं हैं।



रूपकुंड बहुत कम लोग पहुंच पाते है। अक्सर यहां तक देश विदेश के वैज्ञानिक और साहसी यात्री आते रहे हैं। नेशनल जियोग्राफिक की टीम ने इस रहस्य पर एक बड़ी डाक्योमेंट्री भी बनाई है। कुछ वैज्ञानिकों से बात हुई तो उन्होंने बताया, धार्मिक कर्मकांडों के चक्कर में कई तस्कर यहां से मानव हड्डियां तस्करी कर महंगे दामों में अंधविश्वासी लोगों को बेचते हैं। इसलिये सरकार को रूपकुंड का संरक्षण लेना चाहिये। रूपकुंड के आसपास सुंदर ब्रहमकमल भी खिले हुये रहते हैं। सरकार को इस झील को ही म्यूजियम बना देना चाहिये। इसके लिये टिहरी में वरिष्ठ पत्रकार श्री महिपाल सिंह नेगी और श्री अनुराग पंत जी ने काफी काम भी किया था। उन्होंने सरकार को गहन अध्ययन कर एक प्रस्ताव दिया था। ये पूर्ववर्ति कांग्रेस सरकार के दौरान की बात है। हालांकि सरकार को शायद कुछ समझ नहीं आया और फाइनली हुआ कुछ नहीं। हमें अपनी प्राकृतिक और एतिहासिक संपत्ति के लिये गंभीर होना चाहिये। सरकारों को इस बारे में सोचना चाहिये।

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