कोरोना के बाद आप कैसी नई दुनिया चा​हेंगे?

इस महामारी के प्रबंधन में लगे दिग्गज ‘युद्ध-युद्ध’ चिल्ला रहे हैं। वे युद्ध शब्द का इस्तेमाल जुमले के तौर पर नहीं, बल्कि सचमुच के युद्ध के लिए ही कर रहे हैं। लेकिन अगर वास्तव में यह युद्ध ही होता तो इसके लिए अमरीका से ज़्यादा बेहतर तैयारी किसकी होती? अगर अगले मोर्चे पर लड़ रहे सिपाहियों के लिए मास्कों और दस्तानों की जगह बंदूकों, स्मार्ट बमों, बंकर-ध्वंसकों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों और परमाणु बमों की ज़रूरत होती तो क्या उनका अभाव होता?

- अरुंधती राय

अनुवाद: शैलेश

अंग्रेजी में “वायरल होना” (किसी वीडियो, संदेश आदि का फैलना) शब्द को सुनते ही अब किसको थोड़ी सिहरन नहीं होगी? दरवाजे के हैंडल, गत्ते का डिब्बा या सब्जी का थैला देखते ही किसकी कल्पना में उन अदृश्य छींटों के झुंड साकार नहीं हो उठेंगे जो न जीवित ही हैं, न मृत ही हैं और जो अपने चिपकने वाले चूषक पंजों के साथ हमारे फेफड़ों में कब्जा जमाने का इंतज़ार कर रहे हैं। एक अजनबी को चूमने, बस में घुसने या अपने बच्चे को स्कूल भेजने के पहले कौन भयभीत नहीं हो उठेगा? अपनी रोज़मर्रा की खुशियों से पहले उनके जोख़िम का आकलन कौन नहीं करने लगेगा? अब हममें से कौन है, जो एक झोलाछाप महामारी-विशेषज्ञ, विषाणु-विज्ञानी, सांख्यिकी विद् और भविष्यवक्ता नहीं बन चुका है? कौन वैज्ञानिक या डॉक्टर मन ही मन में किसी चमत्कार के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा है? कौन पुजारी है जो मन ही मन में विज्ञान के आगे समर्पण नहीं कर चुका है? और विषाणुओं के इस प्रसार के दौरान भी कौन है जो पक्षियों के गीतों से भर उठे शहरों, चौराहों पर नृत्य करने लगे मयूरों और आकाश की नीरवता पर रोमांचित नहीं है? दुनिया भर में संक्रमित लोगों की संख्या इस सप्ताह 10 लाख तक पहुंच गई जिनमें से 50 हजार लोग मर चुके हैं। (आज यह ताज़ा आंकड़ा 13,47,803 लोगों के संक्रमण और 74,807 लोगों की मौत पर पहुंच गया है।) आशंकाओं के हिसाब से यह संख्या लाखों, या और भी ज्यादा तक जाएगी। यह विषाणु खुद तो व्यापार और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के मार्ग पर मुक्त भ्रमण करता रहा है लेकिन इसके द्वारा लाई गई भयावह बीमारी ने इंसानों को उनके देशों, शहरों और घरों में बंद कर दिया है। परंतु पूंजी के प्रवाह के विपरीत इस विषाणु को प्रसार तो चाहिए, लेकिन मुनाफा नहीं चाहिए, और इसलिए, अनजाने में ही कुछ हद तक इसने इस प्रवाह की दिशा को उलट दिया है। इसने आव्रजन नियंत्रणों, बायोमेट्रिक्स (लोगों की शिनाख्त करने वाली प्रणालियों), डिजिटल निगरानी और अन्य हर तरह के डेटा विश्लेषण करने वाली प्रणालियों का मज़ाक उड़ाया है, और इस तरह से दुनिया के सबसे अमीर, सबसे शक्तिशाली देशों को, जहां पूंजीवाद का इंजन हिचकोले खाते हुए रुक गया है, इसने ज़बर्दस्त चोट पहुंचाई है। शायद अस्थायी रुप से ही, फिर भी इसने हमें यह मौक़ा तो दिया ही है कि हम इसके पुर्जों का निरीक्षण कर सकें और निर्णय ले सकें कि इसे फिर से ठोंक-ठाक कर चलाना है अथवा हमें इससे बेहतर इंजन खोजने की जरूरत है। इस महामारी के प्रबंधन में लगे दिग्गज ‘युद्ध-युद्ध’ चिल्ला रहे हैं। वे युद्ध शब्द का इस्तेमाल जुमले के तौर पर नहीं, बल्कि सचमुच के युद्ध के लिए ही कर रहे हैं। लेकिन अगर वास्तव में यह युद्ध ही होता तो इसके लिए अमरीका से ज़्यादा बेहतर तैयारी किसकी होती? अगर अगले मोर्चे पर लड़ रहे सिपाहियों के लिए मास्कों और दस्तानों की जगह बंदूकों, स्मार्ट बमों, बंकर-ध्वंसकों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों और परमाणु बमों की ज़रूरत होती तो क्या उनका अभाव होता? दुनिया भर में हम में से कुछ लोग रात-दर-रात न्यूयॉर्क के गवर्नर के प्रेस बयानों को ऐसी उत्सुकता के साथ देखते हैं जिसकी व्याख्या करना मुश्किल है। हम आंकड़े देखते हैं और उन अमरीकी अस्पतालों की कहानियां सुन रहे हैं जो रोगियों से पटे हुए हैं, जहां कम वेतन और बहुत ज़्यादा काम से त्रस्त नर्सें कूड़ेदानों में इस्तेमाल होने वाले कपड़ों और पुराने रेनकोटों से मास्क बनाने को मजबूर हैं ताकि हर तरह के जोख़िम उठा कर भी रोगियों को कुछ राहत दे सकें। जहां राज्य वेंटिलेटरों की ख़रीद के लिए एक दूसरे के ख़िलाफ़ बोली लगा रहे हैं, जहां डॉक्टर इस दुविधा में हैं कि किस रोगी की जान बचाएं और किसे मरने के लिए छोड़ दें! और फिर हम सोचने लगते हैं, “हे भगवान! यही अमरीका है!” यह एक तात्कालिक, वास्तविक और विराट त्रासदी है जो हमारी आंखों के सामने घटित हो रही है। लेकिन यह नई नहीं है। यह उसी ट्रेन का मलबा है जो वर्षों से पटरी से उतर चुकी है और घिसट रही है। “रोगियों को बाहर फेंक देने” वाली वे वीडियो क्लिपें किसे याद नहीं हैं जिनमें अस्पताल के गाउन में ही रोगियों को, जिनके नितंब तक उघाड़ थे, अस्पतालों ने चुपके से कूड़े की तरह सड़कों पर फेंक दिया था। कम सौभाग्यशाली अमरीकी नागरिकों के लिए अस्पतालों के दरवाज़े ज़्यादातर बंद ही रहे हैं। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कितने बीमार हैं, या उन्होंने कितना दुःख झेला है। कम से कम अब तक नहीं फ़र्क़ पड़ता रहा है, क्योंकि अब, इस विषाणु के दौर में एक ग़रीब इंसान की बीमारी एक अमीर समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। और अभी भी, सीनेटर बर्नी सैंडर्स, जो सबके लिए स्वास्थ्य के पक्ष में अनवरत अभियान चलाते रहे हैं, उन्हें व्हाइट हाउस के लिए प्रत्याशी बनाने के मामले में उनकी अपनी पार्टी ही पराया मान रही है। और मेरे देश की हालत क्या है? मेरा ग़रीब अमीर देश भारत, जो सामंतवाद और धार्मिक कट्टरवाद, जातिवाद और पूंजीवाद के बीच कहीं झूल रहा है और जिस पर अति दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों का शासन है, उसकी हालत क्या है? दिसंबर में, जब चीन, वुहान में इस विषाणु के विस्फोट से जूझ रहा था, उस समय भारत सरकार अपने उन लाखों नागरिकों के व्यापक विद्रोह से निपट रही थी जो उसके द्वारा हाल ही में संसद में पारित किए गए बेशर्मी पूर्वक भेदभाव करने वाले मुस्लिम-विरोधी नागरिकता क़ानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। भारत में कोविड-19 का पहला मामला 30 जनवरी को आया था, भारतीय गणतंत्र दिवस की परेड के सम्माननीय मुख्य अतिथि, अमेजन के वन-भक्षक और कोविड के अस्तित्व को नकारने वाले जायर बोल्सोनारो के दिल्ली छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद। लेकिन सत्तारूढ़ पार्