कोरोना के बाद आप कैसी नई दुनिया चा​हेंगे?

इस महामारी के प्रबंधन में लगे दिग्गज ‘युद्ध-युद्ध’ चिल्ला रहे हैं। वे युद्ध शब्द का इस्तेमाल जुमले के तौर पर नहीं, बल्कि सचमुच के युद्ध के लिए ही कर रहे हैं। लेकिन अगर वास्तव में यह युद्ध ही होता तो इसके लिए अमरीका से ज़्यादा बेहतर तैयारी किसकी होती? अगर अगले मोर्चे पर लड़ रहे सिपाहियों के लिए मास्कों और दस्तानों की जगह बंदूकों, स्मार्ट बमों, बंकर-ध्वंसकों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों और परमाणु बमों की ज़रूरत होती तो क्या उनका अभाव होता?

- अरुंधती राय

अनुवाद: शैलेश

अंग्रेजी में “वायरल होना” (किसी वीडियो, संदेश आदि का फैलना) शब्द को सुनते ही अब किसको थोड़ी सिहरन नहीं होगी? दरवाजे के हैंडल, गत्ते का डिब्बा या सब्जी का थैला देखते ही किसकी कल्पना में उन अदृश्य छींटों के झुंड साकार नहीं हो उठेंगे जो न जीवित ही हैं, न मृत ही हैं और जो अपने चिपकने वाले चूषक पंजों के साथ हमारे फेफड़ों में कब्जा जमाने का इंतज़ार कर रहे हैं। एक अजनबी को चूमने, बस में घुसने या अपने बच्चे को स्कूल भेजने के पहले कौन भयभीत नहीं हो उठेगा? अपनी रोज़मर्रा की खुशियों से पहले उनके जोख़िम का आकलन कौन नहीं करने लगेगा? अब हममें से कौन है, जो एक झोलाछाप महामारी-विशेषज्ञ, विषाणु-विज्ञानी, सांख्यिकी विद् और भविष्यवक्ता नहीं बन चुका है? कौन वैज्ञानिक या डॉक्टर मन ही मन में किसी चमत्कार के लिए प्रार्थना नहीं कर रहा है? कौन पुजारी है जो मन ही मन में विज्ञान के आगे समर्पण नहीं कर चुका है? और विषाणुओं के इस प्रसार के दौरान भी कौन है जो पक्षियों के गीतों से भर उठे शहरों, चौराहों पर नृत्य करने लगे मयूरों और आकाश की नीरवता पर रोमांचित नहीं है? दुनिया भर में संक्रमित लोगों की संख्या इस सप्ताह 10 लाख तक पहुंच गई जिनमें से 50 हजार लोग मर चुके हैं। (आज यह ताज़ा आंकड़ा 13,47,803 लोगों के संक्रमण और 74,807 लोगों की मौत पर पहुंच गया है।) आशंकाओं के हिसाब से यह संख्या लाखों, या और भी ज्यादा तक जाएगी। यह विषाणु खुद तो व्यापार और अंतरराष्ट्रीय पूंजी के मार्ग पर मुक्त भ्रमण करता रहा है लेकिन इसके द्वारा लाई गई भयावह बीमारी ने इंसानों को उनके देशों, शहरों और घरों में बंद कर दिया है। परंतु पूंजी के प्रवाह के विपरीत इस विषाणु को प्रसार तो चाहिए, लेकिन मुनाफा नहीं चाहिए, और इसलिए, अनजाने में ही कुछ हद तक इसने इस प्रवाह की दिशा को उलट दिया है। इसने आव्रजन नियंत्रणों, बायोमेट्रिक्स (लोगों की शिनाख्त करने वाली प्रणालियों), डिजिटल निगरानी और अन्य हर तरह के डेटा विश्लेषण करने वाली प्रणालियों का मज़ाक उड़ाया है, और इस तरह से दुनिया के सबसे अमीर, सबसे शक्तिशाली देशों को, जहां पूंजीवाद का इंजन हिचकोले खाते हुए रुक गया है, इसने ज़बर्दस्त चोट पहुंचाई है। शायद अस्थायी रुप से ही, फिर भी इसने हमें यह मौक़ा तो दिया ही है कि हम इसके पुर्जों का निरीक्षण कर सकें और निर्णय ले सकें कि इसे फिर से ठोंक-ठाक कर चलाना है अथवा हमें इससे बेहतर इंजन खोजने की जरूरत है। इस महामारी के प्रबंधन में लगे दिग्गज ‘युद्ध-युद्ध’ चिल्ला रहे हैं। वे युद्ध शब्द का इस्तेमाल जुमले के तौर पर नहीं, बल्कि सचमुच के युद्ध के लिए ही कर रहे हैं। लेकिन अगर वास्तव में यह युद्ध ही होता तो इसके लिए अमरीका से ज़्यादा बेहतर तैयारी किसकी होती? अगर अगले मोर्चे पर लड़ रहे सिपाहियों के लिए मास्कों और दस्तानों की जगह बंदूकों, स्मार्ट बमों, बंकर-ध्वंसकों, पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों और परमाणु बमों की ज़रूरत होती तो क्या उनका अभाव होता? दुनिया भर में हम में से कुछ लोग रात-दर-रात न्यूयॉर्क के गवर्नर के प्रेस बयानों को ऐसी उत्सुकता के साथ देखते हैं जिसकी व्याख्या करना मुश्किल है। हम आंकड़े देखते हैं और उन अमरीकी अस्पतालों की कहानियां सुन रहे हैं जो रोगियों से पटे हुए हैं, जहां कम वेतन और बहुत ज़्यादा काम से त्रस्त नर्सें कूड़ेदानों में इस्तेमाल होने वाले कपड़ों और पुराने रेनकोटों से मास्क बनाने को मजबूर हैं ताकि हर तरह के जोख़िम उठा कर भी रोगियों को कुछ राहत दे सकें। जहां राज्य वेंटिलेटरों की ख़रीद के लिए एक दूसरे के ख़िलाफ़ बोली लगा रहे हैं, जहां डॉक्टर इस दुविधा में हैं कि किस रोगी की जान बचाएं और किसे मरने के लिए छोड़ दें! और फिर हम सोचने लगते हैं, “हे भगवान! यही अमरीका है!” यह एक तात्कालिक, वास्तविक और विराट त्रासदी है जो हमारी आंखों के सामने घटित हो रही है। लेकिन यह नई नहीं है। यह उसी ट्रेन का मलबा है जो वर्षों से पटरी से उतर चुकी है और घिसट रही है। “रोगियों को बाहर फेंक देने” वाली वे वीडियो क्लिपें किसे याद नहीं हैं जिनमें अस्पताल के गाउन में ही रोगियों को, जिनके नितंब तक उघाड़ थे, अस्पतालों ने चुपके से कूड़े की तरह सड़कों पर फेंक दिया था। कम सौभाग्यशाली अमरीकी नागरिकों के लिए अस्पतालों के दरवाज़े ज़्यादातर बंद ही रहे हैं। इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वे कितने बीमार हैं, या उन्होंने कितना दुःख झेला है। कम से कम अब तक नहीं फ़र्क़ पड़ता रहा है, क्योंकि अब, इस विषाणु के दौर में एक ग़रीब इंसान की बीमारी एक अमीर समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकती है। और अभी भी, सीनेटर बर्नी सैंडर्स, जो सबके लिए स्वास्थ्य के पक्ष में अनवरत अभियान चलाते रहे हैं, उन्हें व्हाइट हाउस के लिए प्रत्याशी बनाने के मामले में उनकी अपनी पार्टी ही पराया मान रही है। और मेरे देश की हालत क्या है? मेरा ग़रीब अमीर देश भारत, जो सामंतवाद और धार्मिक कट्टरवाद, जातिवाद और पूंजीवाद के बीच कहीं झूल रहा है और जिस पर अति दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों का शासन है, उसकी हालत क्या है? दिसंबर में, जब चीन, वुहान में इस विषाणु के विस्फोट से जूझ रहा था, उस समय भारत सरकार अपने उन लाखों नागरिकों के व्यापक विद्रोह से निपट रही थी जो उसके द्वारा हाल ही में संसद में पारित किए गए बेशर्मी पूर्वक भेदभाव करने वाले मुस्लिम-विरोधी नागरिकता क़ानून के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। भारत में कोविड-19 का पहला मामला 30 जनवरी को आया था, भारतीय गणतंत्र दिवस की परेड के सम्माननीय मुख्य अतिथि, अमेजन के वन-भक्षक और कोविड के अस्तित्व को नकारने वाले जायर बोल्सोनारो के दिल्ली छोड़ने के कुछ ही दिनों बाद। लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी की समय-सारिणी में ऐसा बहुत कुछ था जो इस विषाणु से निपटने से ज़्यादा ज़रूरी था। फरवरी के अंतिम सप्ताह में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकारी यात्रा तय थी। उन्हें गुजरात के एक स्टेडियम में एक लाख लोगों को जुटाने का प्रलोभन दिया गया था। इस सब में काफी धन और समय जाया हुआ। फिर दिल्ली विधानसभा चुनाव भी थे, जिसमें भारतीय जनता पार्टी अगर अपना खेल नहीं खेलती तो हारना निश्चित था, अतः उसने खेला। उसने एक बिना किसी रोक-टोक वाला कुटिल हिंदू राष्ट्रवादी अभियान छेड़ दिया, जो शारीरिक हिंसा और “गद्दारों” को गोली मारने की धमकियों से भरा था। ख़ैर! पार्टी वैसे भी चुनाव हार गई। तो फिर इस अपमान के लिए ज़िम्मेदार ठहराए गए दिल्ली के मुसलमानों के लिए एक सज़ा तय की गई थी। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हिंदू उपद्रवियों के हथियारबंद गिरोहों ने पुलिस के संरक्षण में अपने पास-पड़ोस के मुस्लिम-बहुल मजदूर-वर्ग के घरों पर हमला बोल दिया। मकानें, दुकानें, मस्ज़िदें और स्कूल जला दिए गए। जिन मुसलमानों को इस हमले की आशंका थी, उन्होंने मुकाबला किया। 50 से ज़्यादा लोग, मुसलमान और कुछ हिंदू मारे गए। हजारों लोग स्थानीय कब्रिस्तानों में स्थित शरणार्थी शिविरों में चले गए। जिस समय सरकारी अधिकारियों ने कोविड-19 पर अपनी पहली बैठक की और अधिकांश भारतीयों ने जब पहली बार हैंड सैनिटाइज जैसी किसी चीज के अस्तित्व के बारे में सुना तब भी गंदे, बदबूदार नालों से विकृत लाशें निकाली जा रही थीं। मार्च का महीना भी व्यस्तता भरा था। शुरुआती दो हफ्ते तो मध्य प्रदेश में कॉंग्रेस की सरकार गिराने और उसकी जगह भाजपा की सरकार बनाने में समर्पित कर दिए गए। 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने घोषित किया कि कोविड-19 एक वैश्विक महामारी है। इसके दो दिन बाद भी 13 मार्च को स्वास्थ्य मंत्रालय ने कहा कि कोरोना “कोई आपातकालीन स्वास्थ्य खतरा नहीं है।” आखिरकार 19 मार्च को भारतीय प्रधानमंत्री ने राष्ट्र को संबोधित किया। उन्होंने ज्यादा होमवर्क नहीं किया था। उन्होंने फ्रांस और इटली से कार्य योजना को उधार ले लिया था। उन्होंने हमें “सोशल डिस्टेंसिंग” की ज़रूरत के बारे में बताया (जाति-व्यवस्था में इतनी गहराई तक फंसे हुए एक समाज के लिए यह समझना काफी आसान था), और 22 मार्च को एक दिन के “जनता कर्फ्यू” का आह्वान किया। संकट के इस समय में सरकार क्या करने जा रही है इसके बारे में उन्होंने कुछ नहीं बताया। लेकिन उन्होंने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को सलामी देने के लिए लोगों को अपनी बालकनियों में आकर ताली, थाली और घंटी वगैरह बजाने का आह्वान किया। उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया कि भारतीय स्वास्थ्य कर्मचारियों और अस्पतालों के लिए आवश्यक सुरक्षात्मक उपकरण और श्वसन उपकरण बचा कर रखने की जगह भारत उस समय भी इन चीजों का निर्यात कर रहा था। आश्चर्य की बात नहीं कि नरेंद्र मोदी के अनुरोध को बहुत उत्साह के साथ पूरा किया गया। थाली बजाते हुए, जुलूस निकाले गए, सामुदायिक नृत्य और फेरियां निकाली गईं। कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं। बाद के दिनों में लोगों ने गोबर भरी टंकियों में छलांग लगाई और भाजपा समर्थकों ने गोमूत्र पीने की पार्टियां आयोजित कीं। कई मुस्लिम संगठन भी इसमें पीछे नहीं रहे, उन्होंने घोषणा किया कि इस विषाणु का जवाब है सर्वशक्तिमान अल्लाह और उन्होंने आस्थावान लोगों को बड़ी संख्या में मस्ज़िदों में इकट्ठा होने का आह्वान किया। 24 मार्च को रात 8 बजे मोदी टीवी पर फिर से यह घोषणा करने के लिए दिखाई दिए कि आधी रात से पूरे भारत में लॉकडाउन होगा। बाज़ार बंद हो जाएंगे। सार्वजनिक और निजी सभी परिवहन बंद कर दिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि यह फैसला वे सिर्फ एक प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि हमारे परिवार के बुजुर्ग के रूप में ले रहे हैं। राज्य सरकारों से सलाह लिए बिना, जिन्हें इस फ़ैसले के नतीज़ों से निपटना था, दूसरा कौन यह फ़ैसला कर सकता है कि 138 करोड़ लोगों को, बिना किसी तैयारी के, महज चार घंटे के नोटिस के साथ लॉकडाउन कर दिया जाए? उनके तरीक़े निश्चित रूप से यह धारणा देते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री नागरिकों को शत्रुतापूर्ण शक्ति के रूप में देखते हैं, जिन पर घात लगा कर हमला करने, उन्हें हैरत में डाल देने की ज़रूरत है, लेकिन कभी भी उन्हें विश्वास में लेने की ज़रूरत नहीं है। लॉकडाउन में हम थे। अनेक स्वास्थ्य पेशेवरों और महामारी विज्ञानियों ने इस क़दम की सराहना की है। शायद वे सिद्धांततः सही हैं। लेकिन निश्चित रूप से उनमें से कोई भी उस अनर्थकारी योजना-हीनता और किसी तैयारी के अभाव का समर्थन नहीं कर सकता जिसने दुनिया के सबसे बड़े, सबसे दंडात्मक लॉकडाउन को इसके म़कसद के बिल्कुल ख़िलाफ़ बना दिया। जैसा कि दुनिया ने स्तब्ध होकर देखा, भारत ने अपनी सारी शर्म के बीच अपनी क्रूर, संरचनात्मक, सामाजिक और आर्थिक असमानता और पीड़ा के प्रति अपनी निष्ठुर उदासीनता को प्रकट कर दिया। लॉकडाउन ने एक रासायनिक प्रयोग की तरह काम किया जिसने अचानक छिपी चीज़ों को रोशन कर दिया। जैसे ही दुकानें, रेस्तरां, कारखाने और निर्माण उद्योग बंद हुए, जैसे ही धनी और मध्यम वर्गों ने ख़ुद को सुरक्षित कॉलोनियों में बंद कर लिया, हमारे शहरों और महानगरों ने अपने कामकाज़ी वर्ग के नागरिकों – अपने प्रवासी श्रमिकों – को बिल्कुल अवांछित उत्पाद की तरह बाहर निकालना शुरू कर दिया। अपने नियोक्ताओं और मकान मालिकों द्वारा बाहर निकाल दिए गए ढेरों लोग, लाखों गरीब, भूखे, प्यासे लोग, युवा और बूढ़े, पुरुष, महिलाएं, बच्चे, बीमार लोग, अंधे लोग, विकलांग लोग, जिनके पास जाने के लिए कोई ठिकाना नहीं था, कोई सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध नहीं था, उन्होंने सुदूर अपने गाँवों के लिए पैदल ही चलना शुरू कर दिया। वे सैकड़ों किलोमीटर दूर बदायूं, आगरा, आज़मगढ़, अलीगढ़, लखनऊ, गोरखपुर के लिए कई-कई दिनों तक चलते रहे। कुछ ने तो रास्ते में ही दम तोड़ दिया। उन्हें पता था कि वे अपनी भुखमरी की गति को धीमी करने की संभावना में अपने घर की ओर जा रहे हैं। वे यह भी जानते थे कि शायद वे अपने साथ यह विषाणु भी ले जा रहे हों, और घर पर अपने परिवारों, अपने माता-पिता और दादा-दादी को संक्रमित भी कर दें, फिर भी, उन्हें रत्ती भर ही सही, परिचित माहौल, आश्रय और गरिमा के साथ ही प्यार न सही भोजन की सख़्त ज़रूरत थी। जब उन्होंने चलना शुरू किया तो काफी लोगों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा और अपमानित किया क्योंकि पुलिस पर कर्फ्यू को सख़्ती से लागू करने की ज़िम्मेदारी थी। युवकों को राजमार्गों पर झुकने और मेढक की तरह उछल कर चलने को मजबूर किया गया। बरेली शहर के बाहर एक समूह को झुंड में बैठा कर उन पर कीटनाशक का छिड़काव किया गया। कुछ दिनों बाद, इस चिंता में कि पलायन कर रहे लोग गांवों में भी विषाणु फैला देंगे, सरकार ने पैदल चलने वालों के लिए भी राज्यों की सीमाओं को सील करा दिया। कई दिनों से पैदल चल रहे लोगों को रोक कर वापस उन्हीं शहरों के शिविरों में लौटने को मजबूर कर दिया गया जहां से तुरंत ही उन्हें निकलने को मजबूर किया गया था। पुराने लोगों के लिए 1947 के विस्थापन की स्मृतियां ताजा हो गईं जब भारत विभाजित हुआ था और पाकिस्तान का जन्म हुआ था। इतनी तुलना के अलावा यह निष्कासन वर्ग-विभाजन से संचालित था, धर्म से नहीं। इस सबके बावजूद भी ये भारत के सबसे ग़रीब लोग नहीं थे। ये वे लोग थे, जिनके पास (कम से कम अब तक) शहरों में काम था और लौटने के लिए घर थे। बेरोजगार लोग, बेघर लोग और निराश लोग शहरों और देहात में जहाँ थे वहीं पड़े हुए थे, जहां इस त्रासदी से काफी पहले से गहरा संकट बढ़ रहा था। इन भयावह दिनों के दौरान भी गृहमंत्री अमित शाह सार्वजनिक परिदृश्य से अनुपस्थित रहे। जब दिल्ली से पलायन शुरू हुआ तो मैंने एक पत्रिका, जिसके लिए मैं अक्सर लिखती हूं, उसके प्रेस पास का इस्तेमाल करके मैं गाज़ीपुर गई, जो दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा पर है। विराट जन सैलाब था। जैसा कि बाइबिल में वर्णित है। या शायद नहीं, क्योंकि बाइबिल ऐसी संख्याओं को नहीं जान सकती थी। शारीरिक दूरी बनाने के मक़सद से लागू किया गया लॉकडाउन अपने विपरीत में बदल चुका था। अकल्पनीय पैमाने की शारीरिक नज़दीकी थी। भारत के शहरों और क़स्बों का भी सच यही है। मुख्य सड़कें हो सकता है खाली हों लेकिन ग़रीब लोग मलिन बस्तियों और झोपड़पट्टियों की तंग कोठरियों में ठुंसे पड़े हैं। वहां जिससे भी मैंने बात की सभी विषाणु से चिंतित थे। फिर भी उनके जीवन पर मंडरा रही बेरोजगारी, भुखमरी और पुलिस की हिंसा की तुलना में यह कम वास्तविक था, और कम मौजूद था। उस दिन मैंने जितने लोगों से बात की थी, उनमें मुस्लिम दर्जियों का एक समूह भी शामिल था, जो कुछ सप्ताह पहले ही मुस्लिम विरोधी हमलों से बच गया था, उनमें से एक व्यक्ति के शब्दों ने मुझे विशेष रूप से परेशान कर दिया। वह राम जीत नाम का एक बढ़ई था, जिसने नेपाल की सीमा के पास गोरखपुर तक पैदल जाने की योजना बनाई थी। उसने कहा, “शायद जब मोदी जी ने ऐसा करने का फैसला किया, तो किसी ने उन्हें हमारे बारे में नहीं बताया होगा। शायद वह हमारे बारे में न जानते हों।” “हम” का अर्थ है लगभग 46 करोड़ लोग। इस संकट में भारत की राज्य सरकारों ने (अमेरिका की ही तरह) बड़ा दिल और समझ दिखाई है। ट्रेड यूनियनें, निजी तौर पर नागरिक और अन्य समूह भोजन और आपातकालीन राशन वितरित कर रहे हैं। केंद्र सरकार राहत के लिए उनकी बेकरार अपीलों का जवाब देने में धीमी रही है। यह पता चला है कि प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष में कोई नकदी उपलब्ध नहीं है। इसकी बजाय, शुभचिंतकों का पैसा कुछ हद तक रहस्यमय नए पीएम-केयर फंड में डाला जा रहा है। मोदी के चेहरे वाले भोजन के पैकेट दिखने शुरू हो गए हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने अपनी योग-निद्रा की वीडियो क्लिपें शेयर की हैं, जिनमें बदले रूप में ऐनिमेटेड मोदी एक स्वप्न शरीर के साथ योगासन करके दिखा रहे हैं ताकि लोग स्व-अलगाव के दौरान अपने तनावों को कम कर सकें। यह आत्ममोह बहुत परेशान करने वाला है। संभवतः उनमें एक आसन अनुरोध-आसन भी हो सकता था जिसमें मोदी फ्रांस के प्रधानमंत्री से अनुरोध करते कि हमें उस तक़लीफ़ देह राफेल लड़ाकू विमान सौदे से बाहर निकलने की अनुमति दें ताकि 78 लाख यूरो की उस रक़म को हम अति आवश्यक आपातकालीन उपायों में इस्तेमाल कर सकें जिससे कई लाख भूखे लोगों की मदद की जा सके। निश्चित रूप से फ्रांस इसे समझेगा। लॉक डाउन के दूसरे सप्ताह में पहुंचने तक सप्लाई चेनें टूट चुकी हैं, दवाओं और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति कमज़ोर पड़ चुकी है। हजारों ट्रक ड्राइवर राजमार्गों पर अब भी असहाय फंसे हुए हैं, जिनके पास न खाना है न पानी है। कटाई के लिए तैयार खड़ी फसलें धीरे-धीरे ख़राब होने लगी हैं। आर्थिक संकट है ही। राजनीतिक संकट भी जारी है। मुख्यधारा के मीडिया ने अपने 24/7 चलने वाले ज़हरीले मुस्लिम विरोधी अभियान में कोविड की कहानी को भी शामिल कर लिया है। तबलीगी जमात नामक एक संगठन, जिसने लॉक डाउन की घोषणा से पहले दिल्ली में एक बैठक आयोजित की थी, एक “सुपर स्प्रेडर” निकला है। इसका उपयोग मुसलमानों को कलंकित करने और उन्हें बदनाम करने के लिए किया जा रहा है। समग्र स्वर ऐसा है जैसे कि मुसलमानों ने ही इस विषाणु का आविष्कार किया और इसे जानबूझकर ज़ेहाद के रूप में फैलाया है। अभी कोविड का संकट आना बाकी है, या नहीं, हम नहीं जानते। अगर और जब ऐसा होता है, तो हम सुनिश्चित हो सकते हैं कि धर्म, जाति और वर्ग के सभी प्रचलित पूर्वाग्रहों के साथ ही इससे निपटा जा सकेगा। आज 2 अप्रैल तक भारत में लगभग 2000 संक्रमणों की पुष्टि हो चुकी है और 58 मौतें हो चुकी हैं। (ताजा आंकड़ा 4,421 संक्रमणों और 114 मौतों का है.) ख़ेदजनक ढंग से बहुत कम परीक्षणों के कारण इन संख्याओं पर विश्वास नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों की राय में आपस में बहुत अंतर है। कुछ लाखों मामलों की भविष्यवाणी करते हैं। तो दूसरों को लगता है कि इसका असर काफी कम होगा। हम इस संकट के वास्तविक रूप को कभी नहीं जान पाएंगे, भले ही हम भी इसकी चपेट में आ जाएं। हम सभी जानते हैं कि अस्पतालों पर अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है। भारत के सार्वजनिक अस्पतालों और क्लिनिकों में हर साल 10 लाख बच्चों को डायरिया, कुपोषण और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से बचाने की क्षमता नहीं है, जिसके कारण वे मर जाते हैं। यहां लाखों टीबी के मरीज (विश्व का एक चौथाई) हैं। यहां भारी संख्या में लोग रक्ताल्पता और कुपोषण से ग्रस्त हैं जिसके कारण कोई भी मामूली बीमारी उनके लिए प्राणघातक साबित हो जाती है। जिस तरह के विषाणु संकट से अमरीका और यूरोप जूझ रहे हैं, उस पैमाने के संकट को संभालने की कूवत हमारे सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों और क्लिनिकों में नहीं है। चूंकि अस्पताल कोरोना से निपटने में लगा दिए गए हैं, अतः इस समय कमोबेश सभी स्वास्थ्य-सेवाएं स्थगित कर दी गई हैं। दिल्ली में एम्स (AIIMS) का प्रसिद्ध ट्रॉमा सेंटर बंद कर दिया गया है। सैकड़ों कैंसर रोगी, जिन्हें कैंसर शरणार्थी कहा जाता है, और जो उस विशाल अस्पताल के बाहर की सड़कों पर ही रहते हैं, उन्हें मवेशियों की तरह खदेड़ दिया गया है। लोग बीमार पड़ जाएंगे और घर पर ही मर जाएंगे। हम उनकी कहानियों को कभी जान भी नहीं पाएंगे। हो सकता है कि वे आंकड़ों में भी कभी न आ पाएं। हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि इस विषाणु को ठंडा मौसम पसंद है, ऐसे अध्ययन सही हों (हालांकि अन्य शोधकर्ताओं ने इस पर संदेह व्यक्त किया है)। भारतीय लोगों ने इससे पहले कभी इतने अतार्किक ढंग से और इतनी तीव्र लालसा के साथ भारत के जला डालने वाले और परेशान कर देने वाले गर्मी के मौसम का इंतजार नहीं किया है। हमारे साथ यह क्या घटित हुआ है? यह एक विषाणु है। हां है, तो? इतनी सी बात में तो कोई नैतिक ज्ञान नहीं निहित है। लेकिन निश्चित रूप से यह विषाणु से कुछ ज्यादा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह हमें होश में लाने का ईश्वर का तरीक़ा है। दूसरों का कहना है कि यह दुनिया पर क़ब्जा करने का चीन का षड्यंत्र है। चाहे जो हो, कोरोना विषाणु ने शक्तिशाली को घुटने टेकने को मजबूर कर दिया है और दुनिया को एक ऐसे ठहराव पर ला खड़ा किया है जैसा इससे पहले कोई चीज नहीं कर सकी थी। हमारे मस्तिष्क अभी भी आगे-पीछे दौड़ लगा रहे हैं और “सामान्य स्थिति” में आने के लिए लालायित हैं, और भविष्य को अतीत के साथ रफू करने की कोशिश में लगे हैं ताकि बीच की दरार का संज्ञान लेने से अस्वीकार कर दें। लेकिन यह दरार अस्तित्वमान है। और इस घोर हताशा के बीच ही यह हमें एक अवसर मुहैय्या कराती है कि हमने अपने लिए जो यह विनाशकारी मशीन बनाई है, उस पर पुनर्विचार कर सकें। सामान्य स्थिति में लौटने से ज्यादा बुरा कुछ और नहीं हो सकता। ऐतिहासिक रूप से, वैश्विक महामारियों ने इंसानों को हमेशा अतीत से विच्छेद करने और अपने लिए एक बिल्कुल नई दुनिया की कल्पना करने को बाध्य किया है। यह महामारी भी वैसी ही है। यह एक दुनिया और अगली दुनिया के बीच का मार्ग है, प्रवेश-द्वार है। हम चाहें तो अपने पूर्वाग्रहों और नफ़रतों, अपनी लोलुपता, अपने डेटा बैंकों और मृत विचारों, अपनी मृत नदियों और धुंआ-भरे आसमानों की लाशों को अपने पीछे-पीछे घसीटते हुए इसमें प्रवेश कर सकते हैं। या हम हल्के-फुल्के अंदाज से बिना अतीत का कोई बोझ ढोए एक नई दुनिया की कल्पना और उसके लिए संघर्ष की तैयारी कर सकते हैं।

(मशहूर लेखिका और बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय के इस लेख का अनुवाद शैलेश ने किया है। आलेख मूल रूप से Financial Times के लिए लिखा गया था।)

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