यूरोप में 'आवारा हूं..'

दफ़्तर में दाख़िल होते ही पुरानी यूरोपियन फ़िल्मों का एक सेट मेरे सामने था जिसमें बेतरतीब किताबों, मैग्ज़ीनों, अख़बारों और फ़ाइलों के ज़खीरे के बीच एक भारी मेज़ के पीछे लगी गद्देदार कुर्सी में एक उम्र दराज़ शख़्स धंसा हुआ था..

- रोहित जोशी


'आवारा हूं..' दुनिया में भारतीय सिनेमा का संभवतः सबसे मशहूर गाना है.. जो 'इंडिया' कहते ही कई विदेशियों के जेहन में भी उभर उठता है.. आमतौर पर उम्रदराज़ यूरोपियों का इससे ख़ासा जुड़ाव है..


यह स्मृति थोड़ा धुॅंधली है इसलिए बारिकियॉं बता पाना मुश्किल होगा.. लेकिन बॉन शहर (जर्मनी) के वसंत का वह कोई आम दिन ही था.. और शाम का वक़्त.. लेकिन मेरे लिए यह आम दिन तब ख़ास बन गया जब दफ़्तर से निकलते हुए Ritika मुझे अपने साथ अपने एक वक़ील साहब के दफ़्तर ले गईं.. (उन्हें अपने टेक्स से रिलेटेड या किसी दूसरे मसले पर म​शविरा करना था..)


दफ़्तर में दाख़िल होते ही पुरानी यूरोपियन फ़िल्मों का एक सेट मेरे सामने था जिसमें बेतरतीब किताबों, मैग्ज़ीनों, अख़बारों और फ़ाइलों के ज़खीरे के बीच एक भारी मेज़ के पीछे लगी गद्देदार कुर्सी में एक उम्र दराज़ शख़्स धंसा हुआ था..


रितिका मुझे बता चु​कीं थी कि ये सज्जन बॉन शहर के सबसे उम्रदराज़ लॉयर हैं और किसी भी जटिल क़ानूनी पैंच को सुलझाने के लिए लोग इनकी सलाह पर बेहद यक़ीन करते हैं..


रितिका ने जब इन सज्जन से मेरा परिचय कराया, ''ये हमारे नए कुलीग़ हैं, रोहित! कुछ ही दिन हुए इंडिया से आए हैं.''

अनुभव से भरे झुर्रीदार बूढ़े चेहरे में स्वागत भरी मुस्कुराहट तैर आई और उन्होंने अपने जर्मन लहज़े में हिंदी को बरतने की कोशिश करते हुए गुनगुनाना शुरू किया, ''अव्वारा हून्.. अव्वारा हून्.. या ग़र्रदिश में हूं अस्समान का तर्रा हूं..''


कुर्सी पर धंसी उनकी देह, अपनी निगाहों, चेहरे के भाव और हाथों की भंगिमाओं से राजकपूर साहब को दोहराने की भरपूर कोशिश कर रहीं थी. इन जनाब के स्वागत् में इतनी गर्मजो​शी थी कि अगर वे पैरों से लाचार नहीं होते तो संभवत: राजकपूर साहब की तरह नाचने लगते..


यह स्वागत् मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित् था और दिल को छू लेने वाला भी.. रितिका ने मेरे बारे में बताते हुए वक़ील साहब को कहा कि मैं भी गाता हूं.. तो उन्होंने मेरी तमाम झिझक के बावजूद भी वह गाना गवाकर ही छोड़ा..

यह विडियो देख आज वो क़िस्सा याद हो आया..


इसी गाने से जुड़ा एक क़िस्सा स्विट्ज़रलैंड में ज़्यूरिख़ झील के किनारे अकॉर्डियन बजाते एक शख़्स का भी है..

सराबोर कर देने वाली बारिश के बाद धूप बिखेरते उस सर्द दिन इस विशाल झील के किनारे एक बबल आर्टिस्ट करतब दिखा रहा था..


जो काम हम बचपन में साबुन का झाग बनाकर पुरानी स्कैच पैन के इस्तेमाल से किया करते थे.. उसके लिए इसके पास कई उपकरण थे और इसके बबल्स का आकार इतना विशाल था कि दूर से भी ये आपको अपने पास खींच ले..


वह अपने फ़्रेम को झाग में डुबोकर झील की लहरों के विपरीत उसे लहराता और इस शहर की ठंडी हवा का एक झोंका अपने इस क़रतब के लिए चुपके से चुरा लेता.. लेकिन अभी-अभी तक साथ बह रही दूसरी हवाओं को इस चोरी की भनक लग जाती.. वे इस ताज़ा बने बुलबुले को फ़्रेंम से छुड़ाती और धकेल कर दूर... ऊपर, नीचे, दाएँ, बाएँ.. जहाँ मन करता, ले चलतीं और उसके भीतर क़ैद अपनी सहेली हवा के झौंके को आज़ाद करातीं..


बबल्स के भीतर बबल्स या एक में दूसरा बबल जोड़ कर यह फ़नकार कई अजूबी आकृतियॉं बनाता जा रहा था.. तभी पीछे कुछ दूरी पर बजते अकॉर्डियन पर मेरा ध्यान गया.. मैं उस तरफ़ बढ़ा तो मेरा चेहरा पढ़ अकॉर्डियन आर्टिस्ट ने अपनी बज रही धुन को रोक एक दूसरी धुन छेड़ दी.. जिसे सुनते ही मेरे भीतर एक ही गाना तैर सकता था..


''आवारा हूं.. आवारा हूं.. या गर्दिश में हूं आसमान का तारा हूं.. आवारा हूं..''