नक्सली हमले के आगे-पीछे

परम्परागत तौर पर अप्रैल से जून तक नक्सली टैक्टिकल काउंटर ऑफन्सिव कैंपेन या TCOC चलाते हैं. साल की सबसे बड़ी वारदात इस वक़्त होती है. सूखी घास और पत्ते ऑपरेशन के मददगार साबित होते हैं. हालांकि हाल के दौर में इसमें बदलाव देखे गए हैं. TCOC को अब दो फ़ेज़ में बांटकर देखा जाता है. पहला फ़ेज़ जनवरी से मार्च और दूसरा अप्रैल से जून तक.

Vinay Sultan

नक्सली हमले के बाद कई लोग प्रशांत और राहुल कंवल का इंटरव्यू चलाकर PK को नास्त्रेदमस साबित करने में लगे हुए हैं.


गलत संदर्भ के साथ पेश किए तथ्य भ्रामक नतीजों की तरफ ले जाते हैं.


इस नक्सल हमले को समझना चाहें तो इस आलेख को पढ़ सकते हैं.


परम्परागत तौर पर अप्रैल से जून तक नक्सली टैक्टिकल काउंटर ऑफन्सिव कैंपेन या TCOC चलाते हैं. साल की सबसे बड़ी वारदात इस वक़्त होती है. सूखी घास और पत्ते ऑपरेशन के मददगार साबित होते हैं. हालांकि हाल के दौर में इसमें बदलाव देखे गए हैं. TCOC को अब दो फ़ेज़ में बांटकर देखा जाता है. पहला फ़ेज़ जनवरी से मार्च और दूसरा अप्रैल से जून तक.



गर्मियों में ज्यादातर आदिवासी रोजगार के अभाव में घर पर ही होते हैं. माओवादी इसी समय सबसे ज्यादा रिक्रूटमेंट भी करते हैं. मई दिवस, लेनिन जयंती भी इसी समय पड़ती है. कुल जमा यह समय जनसंपर्क और ऑपरेशन दोनों लिहाज से महत्वपूर्ण है.


बस्तर में माओवादी मिलिशिया पीपल्स लिब्रेशन गुरिल्ला आर्मी की दो बटालियन हैं. बटालियन नम्बर-1 लगभग 180 लोगों की एलीट फोर्स है. इसका कमांडर है माड़वी हिड़मा.


हिड़मा एक घोस्ट कमांडर है. उसके बारे में बेहद सीमित जानकारी हैं. पुलिस अब तक उसके गांव में नहीं घुस पाई है. हिड़मा के परिवार, पढ़ाई और नक्सली बनने की वजह पर कायदे का इनपुट नहीं है. हिड़मा मुरिया आदिवासी समुदाय से आता है. इस समुदाय की छवि लड़ाका के तौर पर रही है.

2017 में बीजापुर में हुई मीटिंग के बाद हिड़मा को केंद्रीय समिति का सदस्य बनाया गया था. हिड़मा केंद्रीय समिति का सबसे जवान, सबसे कम पढ़ा लिखा और बस्तर का पहला आदिवासी सदस्य है.


उस समय उसको बटालियन नम्बर 1 का कमांडर बनाया गया था. बस्तर में PLGA की दूसरी बटालियन खड़ी करने का श्रेय भी उसी को है. सरकार ने उस पर 35 लाख का इनाम घोषित कर रखा है.


25 मार्च तारीख को सुरक्षा बलों को इनपुट मिला कि बटालियन-1 बीजापुर-सुकमा सीमा पर मूवमेंट कर रही थी.


ड्रोन कैमरे में देखा गया कि तर्रेम से सिलगेर जाने वाली रोड जोकि दशकों बाद खुली थी, उसे 9 जगहों से काटा जा रहा था.


इससे दो दिन पहले 23 मार्च को नारायणपुर जिले में में सुरक्षा बलों की बस IED की चपेट में आ गई थी. 5 जवान इस हमले में मारे गए थे.


हिड़मा की खोज में कॉम्बिंग ऑपरेशन चलाया गया. इससे पहले 3 मौकों पर उसके मारे जाने की खबर आ चुकी थी. कई लोगों का मानना है कि हिड़मा अब व्यक्ति नहीं पद का नाम हो गया है. गुडसा उसेंडी की तरह.


इस ऑपरेशन में सुकमा-बीजपुर पुलिस, DRG, CRPF और एलीट कोबरा बटालियन के कुल 2000 से ज्यादा जवान भाग ले रहे थे. लेकिन इन लोगों के हाथ कुछ नहीं लगा. ऑपरेशन खत्म कर के सुकमा से आई टीम सुकमा की तरफ लौट गई. बीजापुर से आए करीब 1500 जवान बीजपुर की तरफ से लौट रहे थे.


सिलगेर के पास टेकुलगुड़म गांव से 200 मीटर पहले सुरक्षाबल नक्सलियों के पहले एम्बुश का शिकार हुए।

माओवादियों ने बड़ी चालाकी से V शेप का एम्बुश लगाया था. जवानों के पास पेड़ अलावा आड़ लेने के लिए कुछ नहीं था. यहां 7 जवानों के शव बरामद हुए हैं.

यहां घिरने के बाद जवान गांव तरफ जाने लगे ताकि घरों की आड़ ली जा सके. लेकिन यहां वो दूसरे एम्बुश का शिकार हुए. नक्सलियों गांव पहले ही खाली करवा रखा था. दूसरे एम्बुश के बाद जवान सुरक्षा के लिहाज से आगे खाली मैदान की तरफ निकल गए. यहां पांडुनेट्टा पहाड़ी पर मौजूद तीसरे नक्सल दस्ते ने उन पर एम्बुश कर दिया.


हमला इतना तेज़ था कि सम्भलने का मौका तक नहीं मिला. सुकमा से आई टीम क़ाफ़ी आगे निकल चुकी थी. ऐसे में जवानों के लिए कोई बैकअप नहीं था और वो डक हंट का शिकार हो गए. वहीं माओवादी बेहतर तैयारी के साथ आए थे.


मुठभेड़ एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि माओवादियों ने पीछे की तरफ ट्रक खड़े किए हुए थे जहां वो अपने घायलों का इलाज कर रहे थे. हमले में LMG,BGL,UBGL, RCL का इस्तेमाल हुआ है.

10 दिन में दो बड़े हमलों ने सुरक्षा बलों की कमजोरियों को उघाड़कर रख दिया है. सन्देह जताया जा रहा है कि हिड़मा ने तर्रेम में होने की खबर देकर सुरक्षा बलों को जाल में फंसा लिया.


इस हमले के केंद्र में रहा हिड़मा 2010 के ताड़मेटला हमले में शामिल रहा। इस हमले।में CRPF के 76 जवान मारे गए थे।2013 में झीरम घाटी, 2017 बुरकापाल, 2020 मीनपा का हमला उसके नेतृत्व में हुआ था.


हिड़मा माओवादी कैडर के बीच जिंदा मिथक है. कहा जाता है कि वो फ्रंटलाइन से हमले को लीड करने वाला कमांडर है. पुलिस के पास हिड़मा की पहचान के नाम पर फोटोग्राफ्स का एक गट्ठर है जिसमें वो उन संदिग्धों की तस्वीरें हैं जो हिड़मा हो सकते हैं. उसकी उम्र कभी 32 तो कभी 52 बताई जाती है. उसके बारे में कई मिथक स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित हैं.


माओवादियों का इस इलाके में इतना आक्रामक होना अप्रत्याशित नहीं था. इसके पीछे 3 बड़ी वजह हैं. पहली वजह तर्रेम-सिलगेर सड़क का खुलना. दूसरी चीज 2019 में तर्रेम CRPF बेस कैंप और तीसरी 2020 में तर्रेम में पुलिस थाना खुलना.

यह माओवादियों को खुली चुनौती थी. माओवादी OGW इसके ख़िलाफ़ पहले से अभियान छेड़े हुए थे. बीजपुर में दो. महीने पहले 1500 ग्रामीणों ने तर्रेम में थाना खुलने के खिलाफ प्रदर्शन किया था. इस प्रदर्शन ने इस किस्म के संघर्ष के बारे में पहला इशारा दे दिया था.


अगर 1500 जवान महज 300 नक्सलियों के सामने घुटने टेकने पर मजबूर हैं और अगर तमाम दावों के बावजूद सुरक्षा बल मुठभेड़ के 24 घण्टे बाद तक अपने ही साथियों के शव नहीं उठा पा रहे हों तो नक्सलियों की ज़मीन ख़िसक गई है जैसे दावों पर सवाल उठाया जाना चाहिए.


आखिर में प्रशांत किशोर के बयान और इस नक्सल हमले में कोई कनेक्शन है? जवाब है नहीं.


साल का यह वक़्त नक्सली वारदात का समय है. हर साल ये हमले होते हैं. इस साल 23, 25,26 मार्च को नक्सली हिंसा की वारदात हो चुकी हैं. इस हमले के जरिए नक्सल अपने आखिरी गढ़ में अपनी पकड़ की गवाही दे रहे हैं.