कोरोना के पीछे एक और ख़तरा चला आ रहा है!

Updated: Mar 27, 2020

हमें खुद से सवाल पूछना होगा, केवल यही सवाल नहीं कि हम इस संकट से कैसे उबरेंगे, बल्कि यह सवाल भी कि इस तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद हम कैसी दुनिया में रहेंगे. तूफ़ान गुज़र जाएगा, ज़रूर गुज़र जाएगा, हममें से ज़्यादातर ज़िंदा बचेंगे लेकिन हम एक बदली हुई दुनिया में रह रहे होंगे.

-युवाल नोह हरारी

हरारी हमारे समय के विद्वान-दार्शनिक हैं, दुनिया को आर-पार देखने का हुनर रखते हैं. उन्होंने Financial Times में एक बेहतरीन लेख लिखा है. कोरोना फैलने के कितने दूरगामी राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक असर दुनिया भर में हो सकते हैं, इस पर इतना अच्छा कुछ और पढ़ने को नहीं मिला. हिंदी अनुवाद कर दिया है. थोड़ा लंबा है, जब मैं घर में बैठकर टाइप कर सकता हूँ, तो आप घर बैठे पढ़ क्यों नहीं सकते?

- राजेश प्रियदर्शी

सम्पादक, बीबीसी हिंदी डिजिटल


दुनिया भर के इंसानों के सामने एक बड़ा संकट है. हमारी पीढ़ी का शायद यह सबसे बड़ा संकट है. आने वाले कुछ दिनों और सप्ताहों में लोग और सरकारें जो फ़ैसले करेंगी, उनके असर से दुनिया का हुलिया आने वाले सालों में बदल जाएगा. ये बदलाव सिर्फ़ स्वास्थ्य सेवा में ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति में भी होंगे. हमें तेज़ी से निर्णायक फ़ैसले करने होंगे. हमें अपने फ़ैसलों के दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सचेत रहना होगा. जब हम विकल्पों के बारे में सोच रहे हों तो हमें खुद से सवाल पूछना होगा, केवल यही सवाल नहीं कि हम इस संकट से कैसे उबरेंगे, बल्कि यह सवाल भी कि इस तूफ़ान के गुज़र जाने के बाद हम कैसी दुनिया में रहेंगे. तूफ़ान गुज़र जाएगा, ज़रूर गुज़र जाएगा, हममें से ज़्यादातर ज़िंदा बचेंगे लेकिन हम एक बदली हुई दुनिया में रह रहे होंगे.


इमरजेंसी में उठाए गए बहुत सारे कदम ज़िंदगी का हिस्सा बन जाएंगे. यह इमरजेंसी की फ़ितरत है, वह ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को फ़ास्ट फॉर्वर्ड कर देती है. ऐसे फ़ैसले जिन पर आम तौर पर वर्षों तक विचार-विमर्श चलता है, इमरजेंसी में वे फ़ैसले कुछ घंटों में हो जाते हैं. अधकचरा और ख़तरनाक टेक्ननोलॉजी को भी काम पर लगा दिया जाता है क्योंकि कुछ न करने के ख़तरे कहीं बड़े हो सकते हैं. पूरे देश के नागरिक विशाल सामाजिक प्रयोगों के चूहों में तब्दील हो जाते हैं. मसलन,क्या होगा जब सब लोग घर से काम करेंगे, और सिर्फ़ दूर से संवाद करेंगे? क्या होगा जब सारे शिक्षण संस्थान ऑनलाइन हो जाएंगे? आम दिनों में सरकारें, व्यवसाय और संस्थान ऐसे प्रयोगों के लिए तैयार नहीं होंगे, लेकिन यह आम समय नहीं है. संकट के इस समय में हमें दो बहुत अहम फ़ैसले करने हैं. पहला तो हमें सर्वअधिकार संपन्न निगरानी व्यवस्था (सर्विलेंस राज) और नागरिक सशक्तीकरण में से एक को चुनना है. दूसरा चुनाव हमें राष्ट्रवादी अलगाव और वैश्विक एकजुटता के बीच करना है.


महामारी को रोकने के लिए पूरी आबादी को तय नियमों का पूरी तरह पालन करना होता है. इसे हासिल करने के दो मुख्य तरीके हैं. पहला तरीका यह है कि सरकार लोगों की निगरानी करे, और जो लोग नियम तोड़े उन्हें दंडित करे. आज की तारीख़ में मानवता के इतिहास में टेक्नोलॉजी ने इसे पहली बार संभव बना दिया है कि हर नागरिक की हर समय निगरानी की जा सके. 50 साल पहले रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी 24 करोड़ सोवियत नागरिकों की 24 घंटे निगरानी नहीं कर पाती थी. केजीबी इंसानी एजेंटों और विश्लेषकों पर निर्भर थी, और हर आदमी के पीछे एक एजेंट लगाना संभव नहीं था. अब इंसानी जासूस की ज़रूरत नहीं, हर जगह मौजूद सेंसरों, एल्गोरिद्म और कैमरों पर सरकारें निर्भर कर सकती हैं.


कोरोना वायरस का मुकाबला करने के लिए बहुत सारी सरकारों ने निगरानी के नए उपकरण और व्यवस्थाएं लागू कर दी हैं. इसमें सबसे खास मामला चीन का है. लोगों के स्मार्टफ़ोन को गहराई से मॉनिटर करके, लाखों-लाख कैमरों के ज़रिए, चेहरे पहचानने वाली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके, लोगों के शरीर का तापमान लेकर, बीमार लोगों की रिपोर्टिंग को सख्त बनाकर संक्रमित लोगों की पहचान की गई. यही नहीं, उनके आने-जाने को ट्रैक किया गया ताकि पता लग सके कि वे किन लोगों से मिले-जुले हैं. ऐसे मोबाइल ऐप भी हैं जो संक्रमण की आशंका वाले लोगों की पहचान करके नागरिकों को आगाह करते रहते हैं कि उनसे दूर रहें.


ऐसी टेक्नोलॉजी चीन तक ही सीमित नहीं है. इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने कोराना संक्रमण रोकने के लिए उस तकनीक को लगाने का आदेश दिया है जिसे अब तक सिर्फ़ आतंकवाद के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा रहा था. जब संसदीय समिति ने इसकी अनुमति देने से इनकार किया तो नेतन्याहू ने उन्हें दरकिनार करते हुए इमरजेंसी पावर के ज़रिए क्लियरेंस दे दी.


आप कह सकते हैं कि इसमें नया कुछ भी नहीं है. हाल के वर्षों में सरकारें और बड़ी कंपनियां लोगों को ट्रैक, मॉनिटर और मैनिप्युलेट करने के लिए अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती रही हैं. लेकिन अगर हम सचेत नहीं हुए तो यह महामारी सरकारी निगरानी के मामले में एक मील का पत्थर साबित होगी. उन देशों में ऐसी व्यापक निगरानी व्यवस्था को लागू करना आसान हो जाएगा जो अब तक इससे इनकार करते रहे हैं. यही नहीं, यह 'ओवर द स्किन' निगरानी की जगह 'अंडर द स्किन' निगरानी में बदल जाएगा.


अब तक तो यह होता है कि जब आपकी ऊँगली स्मार्टफ़ोन से एक लिंक पर क्लिक करती है तो सरकार जानना चाहती है कि आप क्या देख-पढ़ रहे हैं. लेकिन कोरोना वायरस के बाद अब इंटरनेट का फ़ोकस बदल जाएगा. अब सरकार आपकी ऊँगली का तापमान और चमड़ी के नीचे का ब्लड प्रेशर भी जानने लगेगी.


सर्विलेंस के मामले में दिक्कत यही है कि हममें से कोई पक्के तौर पर नहीं जानता कि हम पर किस तरह की निगरानी रखी जा रही है, और आने वाले वर्षों में उसका रूप क्या होगा. सर्विलेंस टेक्नोलॉजी तूफ़ानी रफ़्तार से आगे बढ़ रही है, दस साल पहले तक जो साइंस फ़िक्शन की बात लगती थी, वह आज पुरानी खबर है. सोचने की सुविधा के लिए मान लीजिए कि कोई सरकार अपने नागरिकों से कहे कि सभी लोगों को एक बायोमेट्रिक ब्रेसलेट पहनना अनिवार्य होगा जो शरीर का तापमान और दिल की धड़कन को 24 घंटे मॉनिटर करता रहेगा. ब्रेसलेट से मिलने वाला डेटा सरकारी एल्गोरिद्म में जाता रहेगा और उसका विश्लेषण होता रहेगा. आपको पता लगे कि आप बीमार हैं, इससे पहले सरकार को मालूम होगा कि आपकी तबीयत ठीक नहीं है. सिस्टम को यह भी पता होगा कि आप कहाँ-कहाँ गए, किस-किस से मिले, इस तरह संक्रमण की चेन को छोटा किया जा सकेगा, या कई बार तोड़ा जा सकेगा. इस तरह का सिस्टम किसी संक्रमण को कुछ ही दिनों में खत्म कर सकता है, सुनने में बहुत अच्छा लगता है, है न?


अब इसके ख़तरे को समझिए, यह एक खौफ़नाक सर्विलेंस राज की शुरूआत करेगा. मिसाल के तौर पर, अगर किसी को यह पता हो कि मैंने फ़ॉक्स न्यूज़ की जगह सीएनएन के लिंक पर क्लिक किया है तो वह मेरे राजनीतिक विचारों और यहाँ तक कि कुछ हद तक मेरे व्यक्तित्व को समझ पाएगा. लेकिन अगर आप एक वीडियो क्लिप देखने के दौरान मेरे शरीर के तापमान, ब्लड प्रेशर और हार्ट रेट को मॉनिटर कर रहे हों तो आप जान सकते हैं कि मुझे किन बातों पर गुस्सा, हँसी या रोना आता है.


यह याद रखना चाहिए कि गुस्सा, खुशी, बोरियत और प्रेम एक जैविक प्रक्रिया हैं, ठीक बुख़ार और खांसी की तरह. जो टेक्नोलॉजी खांसी का पता लगा सकती है, वही हँसी का भी. अगर सरकारों और बड़ी कंपनियों को बड़े पैमाने पर हमारा डेटा जुटाने की आज़ादी मिल जाएगी तो वे हमारे बारे में हमसे बेहतर जानने लगेंगे. वे हमारी भावनाओं का अंदाज़ा पहले ही लगा पाएंगे, यही नहीं, वे हमारी भावनाओं से खिलवाड़ भी कर पाएंगे, वे हमें जो चाहें बेच पाएंगे--चाहे वह एक उत्पाद हो या कोई नेता. बायोमेट्रिक डेटा हार्वेस्टिंग के बाद कैम्ब्रिज एनालिटिका पाषाण युग की टेक्नोलॉजी लगने लगेगी. कल्पना कीजिए, उत्तर कोरिया में 2030 तक हर नागरिक को बायोमेट्रिक ब्रेसलेट पहना दिया गया है. महान नेता का भाषण सुनने के बाद जिनका ब्रेसलेट बताएगा कि उन्हें गुस्सा आ रहा था, उनका तो हो गया काम तमाम.


आप कह सकते हैं कि बायोमेट्रिक सर्विलेंस इमरजेंसी से निबटने की एक अस्थायी व्यवस्था होगी. जब इमरजेंसी खत्म हो जाएगी तो इसे हटा दिया जाएगा, लेकिन अस्थायी व्यवस्थाओं की एक गंदी आदत होती है कि वे इमरजेंसी के बाद भी बने रहते हैं, वैसे भी नई इमरजेंसी का ख़तरा बना रहता है. मिसाल के तौर पर मेरे अपने देश इसराइल में 1948 में आज़ादी की लड़ाई के दौरान इमरजेंसी लगाई गई थी, जिसके तहत बहुत सारी अस्थायी व्यवस्थाएँ की गई थीं, प्रेस सेंसरशिप से लेकर पुडिंग बनाने के लिए लोगों की ज़मीन ज़ब्त करने को सही ठहराया गया था. जी, पुडिंग बनाने के लिए, मैं मज़ाक नहीं कर रहा. आज़ादी की लड़ाई कब की जीती जा चुकी है, लेकिन इसराइल ने कभी नहीं कहा कि इमरजेंसी खत्म हो गई है. 1948 के अनेक 'अस्थायी क़दम' अब तक लागू हैं, उन्हें हटाया नहीं गया. शुक्र है कि 2011 में पुडिंग बनाने के लिए ज़मीन छीनने का विधान खत्म किया गया.


जब कोरोना वायरस का संक्रमण पूरी तरह खत्म हो जाएगा तो भी डेटा की भूखी सरकारे