'चिपको' : हरी भरी उम्मीदों का जन आंदोलन

Updated: Jan 27

इस किताब में यह दिखाने का काम बख़ूबी किया गया है कि, गंगा की कई सहधाराएं जिस तरह एक में मिल जाती हैं, उसी तरह उत्तराखंड में कई क़िस्म के आंदोलन, एक साथ मिल गए.

- स्टेफ़न ऑल्टर

अनुवाद- रोहित जोशी


अधिकतर लोग जब चिपको आंदोलन के बारे में सोचते हैं, तो जो पहली छवि दिमाग़ में तैरती है वह है हिमालय की ग्रामीण महिलाओं का एक समूह, जो जंगलों के ठेकेदारों से उन्हें बचाने के लिए पेड़ों से लिपटा हुआ है. हालांकि यह वह महत्वपूर्ण पल था जब चिपको की चिंगारी फूटी, लेकिन प्रख्यात इतिहासकार शेखर पाठक ने इस जटिल कहानी के, कई उलझे हुए धागों को सफलता के साथ सुलझाया है, जिसके उत्तराखंड के लोगों और जंगलों के साथ ही साथ दुनिया भर के संरक्षण आंदोलनों के लिए दूरगामी परिणाम हैं. सावधानी के साथ शोध किया गया यह इतिहास, आधिकारिक दस्तावेज़ों, प्रकाशित सामग्री, प्रेस रिपोर्टों, आंदोलनों/प्रदर्शनों के गीतों के काव्य, और आंदोलन में शामिल महत्वपूर्ण लोगों के सैकड़ों व्यक्तिगत् साक्षात्कारों पर आधारित है. मूल रूप से 2019 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित शेखर पाठक की किताब ‘हरी भरी उम्मीद’ को अंग्रेज़ी में ‘The Chipko Movement: A People’s History’ नाम से लाया गया है. अनुवाद मनीषा चौधरी ने किया है और रामचंद्र गुहा ने इसे संपादित किया गया है.

पर्यावरण संरक्षण की यह महत्वपूर्ण घटना रेणी गांव से जुड़ी है जहां 26 मार्च 1973 को, गौरा देवी के साथ महिलाओं के एक समूह ने खेल की सामग्री बनाने वाली साइमंड्स कंपनी के खि़लाफ़ मोर्चा खोल दिया था जिसे चमखड़िक के एक जंगल के कटान का परमिट दिया गया था. कंपनी इस जंगल को काट कर उसकी लकड़ी का इस्तेमाल हाॅकी स्टिक्स बनाने के लिए करने वाली थी. चिपको की जड़ें 19 वीं शताब्दी के मध्य तक फैली हुईं हैं, जब लकड़ी का व्यवसाई फ्रैड्रिक ‘‘पहाड़ी’’ विल्सन, भागीरथी घाटी के अछूते जंगलों का कटान कर, उसके लट्ठों को गंगा में बहाकर नीचे उतार रहा था. औपनिवेशिक दौर की जंगलात की नीतियों में देवदार और चीड़ के साथ ही निचले इलाक़ों में होने वाले साल और शीषम के हिमालयी वृक्षों की प्रजातियों की व्यावसायिक क़ीमत क़ाफ़ी थी. 19 वीं और 20 वीं सदी के दौरान हुए जंगलों के कटान की मुख्य वजहों में से एक था भारतीय रेलवे का विस्तार, जिसे हज़ारों मील के नए ट्रैक्स की ज़रूरत थी और ये सारे ट्रैक्स लकड़ी के स्लिपर्स पर बिछ रहे थे. इतिहास के अब तक के सबसे बड़े भूमि अधिग्रहणों में से एक, भारतीय वन अधिनियम 1878 में समूचे उपमहाद्वीप में बगै़र खेती वाले ज़मीन के विशाल टुकड़ों को हड़प लिया गया. अचानक से, वनवासी लोगों को उनके पैत्रक अधिकारों और आजीविका से वंचित कर दिया गया जबकि ग्रामीण और खेतीहर समुदायों को जलावन की लकड़ियां और चारे को इकट्ठा करने के साथ ही खेती के औजा़र और घरों के निर्माण के लिए पेड़ों के कटान पर भी प्रतिबंध से जूझना पड़ा.


क्योंकि पहाड़ों में भू-क्षरण को रोकने और जल स्रोतों और नमीदार ज़मीनों के पोषण के लिहाज़ से पेड़ बेहद महत्वपूर्ण हैं ऐसे में उत्तराखंड में, जंगलों की कटाई के बेहद गंभीर परिणाम हैं. हिमालयी जंगलों के कटान से होने वाले त्वरित लाभ को महसूस करते हुए टिहरी के महाराजा ने अपने राज्य के जंगलों पर क़ब्ज़ा करना शुरू किया. इसके ख़िलाफ़ कई प्रदर्शन या 'ढंडक' उभरे, जिनका अंत हिंसक विद्रोह में हुआ. शायद, इनमें से सबसे मशहूर और दमनपूर्ण प्रदर्शन 1930 में रवाईं गांव में हुआ, जिसके बारे में शेखर पाठक अनुमान लगाते हैं कि 100 से अधिक गांव वालों को टिहरी की सेनाओं ने गोली मार दी. इसका परिणाम यह हुआ कि गांधीवादी नेता श्रीदेव सुमन और दूसरे राजनतिक कार्यकर्ताओं के संचालन में और अधिक विरोध प्रदर्शन उभरे.


भारत की आज़ादी और टिहरी जैसी रियासतों के विलय के बाद उत्तर प्रदेश के वन विभाग ने वन संसाधनों के प्रबंधन का औपनिवेशिक तरीक़ा जारी रखा, जिसमें इन संसाधनों से राज्य के लिए राजस्व जुटाने का नज़रिया था. हिमालय की तलहटी में पेड़ों के सबसे बड़े इलाक़ों थे और उन्हें लकड़ी, राल और साथ ही काग़ज़ बनाने के लिए लुगदी निकाले जाने के लिए नीलाम कर दिया गया था.


अपनी इस किताब में पाठक जिस एक बिंदु पर ज़ोर डालते हैं वह है कि जंगल उन लोगों के लिए बेहद ज़रूरी संसाधन हैं जो जंगल में या उसके आसपास रहते हैं. खेती, पशुपालन और जंगलों पर आधारित शिल्प, यह सभी चीज़ें पूरी तरह पेड़ों, या पौंधों और घास-फूस की मौजूदगी पर ही निर्भर हैं.


जिस तरह शेखर पाठक रेणी में हुए निर्णायक प्रदर्शन की पृष्ठभूमि के वन अधिकार आंदोलनों के दशकों की विस्तृत तस्वीर उतारते हैं, वहीं वे उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में उभरे कई घटनाक्रमों को याद करते हैं और उनका विश्लेषण करते हैं. सर्वोदई कार्यकर्ता ‘चंडी प्रसाद भट्ट’ के नेतृत्व में ‘दशौली ग्राम स्वराज्य संघ’ जैसे संगठनों ने चिपको की शुरूआती सफलता से ऊर्जा पाई थी और आंदोलनों को आगे ले कर गए. गांधीवादी पर्यावरणविद्, सुंदरलाल और विमला बहुगुणा ने भी पारस्थितिकी के मुद्दों को सबसे आगे रखने के लिए संघर्ष किया. ये प्रतिष्ठित नेता ऐसे रहे जिन्हें पाठक चिपको आंदोलन की ‘दो धाराएं’ कहते हैं, लेकिन इनके साथ ही कई दूसरे नेता भी थे. उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में महिलाओं ने, जंगलों की कटाई की सरकारी अनुमतियों के ख़िलाफ़ कई प्रदर्शन आयोजित किए, जिसमें बद्रीनाथ मंदिर के लिए कोयला बनाने के लिए भ्यूंडार घाटी से लकड़ी के कटान का विरोध जैसे प्रदर्शन शामिल थे.


इस किताब में यह दिखाने का काम बख़ूबी किया गया है कि, गंगा की कई सहधाराएं जिस तरह एक में मिल जाती हैं, उसी तरह उत्तराखंड में कई क़िस्म के आंदोलन, एक साथ मिल गए. सरला बहन जैसी सम्मानित गांधीवादी कार्यकर्ता जहां एक ओर शराब ब