भारत की बेटियों पर भार

क्या आपको नहीं लगता कि आज भी भारत की बहुत सी बेटियाँ कुरीतियों और दुराग्रहों के भार तले दबी हुई हैं। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम उन पर वह भार न डालें जिससे उनका मनोबल टूट जाए, बल्कि उन्हें वह भार उठाने दें जिससे वो हमारे घर सोना-चांदी-कांसा लेकर आयें।

- रंगनाथ सिंह

मेरी बहन जी चाहती हैं कि मैं मीराबाई चानू पर कुछ लिखूँ। मैं समझ नहीं पा रहा कि क्या लिखूँ! सुना है कि मीराबाई दूसरी भारतीय हैं जिसने भारत को भार उठाने की प्रतियोगिता में ओलिंपिक पदक दिलाया है। इसके पहले भी इस प्रतियोगिता से भारत को ओलिंपिक पदक एक बेटी मल्लेश्वरी ने दिलाया था।


इस रिकॉर्ड को देखते हुए क्या कहा जाए? क्या यह कहना अतिश्योक्ति होगी कि भारत की बेटियाँ ज्यादा भार उठा सकती हैं। बशर्ते आप उन्हें बाहर निकलने दें। उनको उनके मनपसन्द कपड़े पहनने दें। उनको उनका मनपसन्द पेशा चुनने दें। उनकी प्रतिभा और पसन्द का सम्मान करें।


दीपिका, मीराबाई, साइना, सिन्धू जैसी बेटियों की प्रतिभा को अगर हम सामने आने का मौका नहीं देते तो वैश्विक समुदाय में कितने दीन-हीन होते। क्या आपको नहीं लगता कि आज भी भारत की बहुत सी बेटियाँ कुरीतियों और दुराग्रहों के भार तले दबी हुई हैं। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम उन पर वह भार न डालें जिससे उनका मनोबल टूट जाए, बल्कि उन्हें वह भार उठाने दें जिससे वो हमारे घर सोना-चांदी-कांसा लेकर आयें।


मीराबाई मणिपुर की हैं तो शायद यह भी कहना चाहिए कि उत्तर भारतीयों को पूर्वोत्तर भारत के प्रति अपने नस्ली और सौतेले बरताव में बदलाव लाने की जरूरत है। मणिपुर की मैरी कॉम भी आपको याद होंगी। इन महिलाओं ने देश के लिए जैसी उपलब्धियाँ हासिल कीं उन्हे वैसा प्रतिदान नहीं मिलता। सरकार तो फिर भी इनकी कद्र करती है, कार्पोरेट को न जाने किसने बोल दिया है कि शैम्पू से लेकर कार तक पूरा देश कोहली और सचिन के कहने पर खरीदता है। कार्पोरेट वालों को इसपर सोचना चाहिए कि वो बेटियों को सेलेब समझना सीखें। उनसे केवल सैनेटरी पैड, गृहणी वाले सामान या जेंडर स्टीरियोटाइप वाले सामान बिकवाने की आदत में बदलाव लायें।


मीराबाई महज 26 साल की हैं। इतनी सी उम्र में वो गरीबी, चोट और हार से उबर कर इस ऐतिहासिक उपलब्ध तक पहुँची हैं। एक ऐसे खेल में जिसमें ओलिंपिक जीतकर भी वो शायद किसी आईपीएल खिलाड़ी जितना पैसा न कमा सकें। तो क्या मुझे यह लिखना चाहिए कि सटोरियों की तरह क्रिकेट के पीछे पागल राष्ट्र को चीन से सबक लेते हुए ओलिंपिक खेलों पर ध्यान देना चाहिए। हमें दुनिया के अन्य अग्रणी देशों की तरह ओलिंपियन को विशेष सम्मान देने की परम्परा को विकसित करना चाहिए।


सच पूछिए तो मीराबाई के पदक जीतने की खबर से मुझे अपने अन्दर कुछ बेहद सकारात्मक महसूस हुआ लेकिन मैं इस घटना को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं देख पा रहा था। इसलिए बहनजी की कहने पर ये कुछ फुटकर विचार आपके सामने रख दिये हैं। इसे लेकर समझ थोड़ी और साफ होगी तो कुछ और कहा जाएगा।


रंगनाथ चर्चित लेखक और पत्रकार हैं.

आलेख उनके फ़ेसबुक पोस्ट से साभार.