'फ़ैमिली मैन' होने का कम्पल्शन

"किशोरावस्था में मैंने बलराज साहनी की फिल्म ’भाभी' में देखा कि बड़ा भाई अपने सारे भाइयों, बहनों को इस्टेब्लिस्ड करते बर्बाद हो जाता है. मैंने भी ऐसा ही बर्बाद होना चाहा. पर वह सिच्यूवेशन ही न आई. पर बहुत सी दीदियां रियल जीवन में देखी थी जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी अपने परिवार के लिए लगा दी."

- Prabhat Upreti

हमारे एक रिश्तेदार ने हमें धोने की कोशिश में राजनीति वाला कीचड़ उछाला, होली कर गये. वकीली होशियारी से मुझे यह एहसास, रिग्रेट करा गये, तोहमत लगा गये कि मैं कभी 'श्रवण कुमार ऑफ द ईयर' या 'फैमिली मैन' नहीं रहा.


लोग कहते हैं, बनते बड़े समाजसेवी हैं पर अपने परिवार को नहीं देखते... ब्ला-ब्ला-ब्ला... वह मुझे अपने ही ख़िलाफ़ गवाही दिला कर मुज़रिम बना गए.

सब कह कर उन्हें रिग्रेट हुआ कि कुछ ज्यादा कह गये तो बोले, ''दिल पे न लेना, मज़ाक कर रहा था!''


ओह! यह फ़ारसी शब्द ’मज़ाक’ कितना हमारे सिस्टम में छाया है. अच्छी अदा है..! जूता मार के कह दो, बुरा न मानो होली है.. सा कुछ!


सरकार भी चुनाव के समय अपने पांच साला रोज़नामचे के लिए, 'बुरा न मानो होली है' कहते हुए कह सकती है, ''ये मजाक था, बुरा न मानना.''


मैंने फिर अपनी ज़िंदगी की गाड़ी का रिवर्स गेयर लगाया.


पिता दिवंगत, आराम से एक भरपूर ईमानदार जिंदगी जीते हुए, एक इस्टेब्लिस्ड परिवार छोड़ गए. उनके मरने पर मैंने बहुत दुःखी होने की कोशिश की पर मैं दुःखी नही हो पाया. उनके मरने से ज्यादा मुझे उस नौजवान पर दुःख हुआ जो लड़ाई में मारा गया, या दुर्घटना में मारा गया था.


मैंने इस ख़ास 'मज़ाक' पर अपनी मां, अपने भाई बहन के संबंधों को टटोला तो पाया कभी ऐसा फ़िल्मी एहसास न हुआ कि गले लगाते फिरूं. जो किया, न किया... उसका एहसास न हुआ. वैसे भी गले लगना/पड़ना, होली या चुनाव के लिए फ़िक्स है. अपने बच्चों से भी मेरे रोआरोट वाले संबंध नहीं हैं! अब पता नहीं प्रेम क्या है! रोमांटिक हारमोनिक फीलिंग या एक प्यारी ज़िम्मेदारी!

शादी हुई तो मेरे इस अनगढ़ बजरे में गजरे लेकर पत्नी ने प्रवेश किया तो उसने पाया, घर में एक बाल्टी थी, एक होटल से आया गिलास. कभी इसी बाल्टी से मैं मुंह लगा कर पानी भी पी लेता था। क्या मेरी पत्नी को भी लगता होगा, किस 'अनफ़ैमली-मैन' से शादी हुई! उसने मोर्चा सम्भाला.. गाते हुए सा, इस तमाशे का गीत...


''तुम साथ हो या न हो.. ढल जाती हूं मैं तेरी आदतों में.''

बीमारी, देखभाल, अल्ला-पल्ला, लोकतान्त्रिक लड़ाई, अपने परिवार की जिन्दगी की. सब उसने ही अपने कोमल पर मजबूत हाथों से, तब से लेकर अब तक संभाल लिया है.


अभाव था, पर छिहत्तर साल होने को आये, पर मुझे पता ही न चला, बाज़ार की क़ीमत, मंहगाईं... कुछ यह उसका हूनर था.


आज भी मुझे है, कि वह इतनी मालामाल है कि वह बेचे देश को भी ख़रीद सकती है. मुझे बस बच्चों के नाम भर याद रहे, यही गनीमत है.

मैं तो बाहर डोलने, हाथ लटकाये जाता और आता था और हड़ी, यानी सो जाता था. पढ़ाने के सिवा, कुछ न आया. प्रेस करना आज भी मेरे लिए असम्भव महान तक़नीकी काम है. हां! तनख्वाह पत्नी के हाथ में जरूर रखता था, पूरी खुशी से. पांच सौ तनख्वाह में तीन सौ घर भेजता था. क्या मैं 'फ़ैमली मैन' न था!


कोविड ने भी 'फ़ैमिली मैन' बनने को कहा. सिखाया कि बाहर के रिलेशन घातक हैं. घर पर रहो, डोलो मत, घर भी कोई चीज होती है यार!


किशोरावस्था में मैंने बलराज साहनी की फिल्म ’भाभी' में देखा कि बड़ा भाई अपने सारे भाइयों, बहनों को इस्टेब्लिस्ड करते बर्बाद हो जाता है. मैंने भी ऐसा ही बर्बाद होना चाहा. पर वह सिच्यूवेशन ही न आई. पर बहुत सी दीदियां रियल जीवन में देखी थी जिन्होंने अपनी सारी जिंदगी अपने परिवार के लिए लगा दी, शादी भी न की और जब बीमार हुई उसके साथ कोई न था. अपनी सी जिंदगी तो उन्होंने जीयी ही नहीं.


अति आदर्शवाद का यथार्थ, कभी सब तबाह कर जिंदगी के मज़े को ख़ल्लास कर देता है.

मुझे कभी अपने सारे सामाजिक संबंधों के रोल पर बहुत से जमा अफसोसों पर यही रिग्रेट है कि कुछ बेहतर कर सकता था, अपने डर को काबू कर के.


मैंने बहुत से रिग्रेटों पर अपने को जस्टिफाई किया. हो सकता है हर निख़द्द नेता, बदमाश भी अपने को डाॅन, रॉबिनहुड कह कर जस्टिफ़ाई करता हो. जैसे ख़राब हैंड राइटिंग को गांधी जी से जोड़ कर और आज 'फैमिली मैन' न होने की तोहमत को भी मैंने गांधी जी के भी 'फैमिली मैन' न होने से जोड़ दिया.

कभी क़द्र न हुई तो मैंने बुल्लैया दादा (बुल्ले शाह) का सहारा ले, पछताना छोड़ा.

''बेकदरा नाल यारी लाके तू बुल्लैया के पछताया किक्कर ते अंगूर चढ़ाये हर गुच्छा जख्माया''

कभी मैंने अपने स्वार्थी मन कहें, या लापरवाही या नासमझी, आरोपों को जस्टिफ़ाई करते हुए रहीम का भी सहारा लिया !

कह रहीम कैसे निभे बेर केर को संग वो डोलत रस आपने उनके फाटत अंग

अब कहने वाले कह सकते हैं कि अपने को बेर, जमाने को कांटे मान कर जस्टिफ़ाई किया.


आज इस फ़ैमिलीमैन न होने के रिग्रेट पर मलहम लगाने के लिए नेपाली गीत मैंने चुना.

हाथ काट्यो बराई ज़रा सी चुराई ले मन फाट्यो बराई गांव घर को कुराय लै..

(हाथ मेरा जरा सी चूड़ी से कट गया. मन मेरा गांव घर की बातों से फट गया है.)


कभी कुछ बेहतर न कर पाने की अपनी लाचारी से मैंने अपने को ही अजीब शक्ल की तक़लीफ दी!

अब क्या करूं अपने ’ऐसे ही’ को.


प्रिय रिश्तेदार! आपने ऐसा रंग पोता कि बहुत बहुत रगड़ के बाद ही निकला.


ब्लैक होल, युद्ध, महामारी से भी ज्यादा बबाले की चीज है, अपना पोस्टमॉर्टम जीते जी करना. समझना... समझाना... भटकना और भड़क जाना.


बुरा न मानना, सरकार जी मुझे रासुका न लगाना, भांग की झोंक में कहा सब.

अअअ... दोस्तों अब ये न कहिए कि आप महान हैं आपने कमज़ोरी स्वीकारी. रंजिश ही सही.. कॉमेंट करें.


नदियां किनारे मेरा गांव है, न हो तो हमें डुबो ही दें कि किस्सा ही ख़त्म हो जाये.



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