आसानी से समझें इलेक्टोरल बॉंड का विवाद (पार्ट - 1)

इलेक्टोरल बॉंड एक बॉंड है पर बाक़ी बॉंड्स से थोड़ा अलग. यहां आसानी से समझें यह है कैसा बॉंड और विवाद में क्यों है?

- मोहित पाठक 


इलेक्टोरल बॉंड जिसे बीजेपी सरकार ने एक बड़े चुनावी सुधार के रूप में 2017 के बजट में पेश किया था, फिर से सुर्ख़ियो में है.


ये इलेक्टोरल बॉंड क्या होता है?


यह एक बॉंड होता है पर बाक़ी बॉंड्स से थोड़ा अलग. कोई भी व्यक्ति या कंपनी कुछ नामित (designated) बैंकों की शाखा से चेक या इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के ज़रिये इसे ख़रीद सकती है. ख़रीदकर इसे किसी भी राजनीतिक दल को दे सकती है जो इसे बैंक में जमा करके बॉंड पर लिखी गयी राशि को अपने अकाउंट में जमा करवा सकती है. इस पर ना ख़रीदने वाले का नाम होता है ना ही भुनाने वाले का. तो इससे एक नज़र में देखा जाए तो दानकर्ता और दान लेने वाले दोनों की पहचान गुप्त रहती है. क्यूंकि इसे सिर्फ़ चेक या इलेक्ट्रानिक भुगतान के माध्यम से ख़रीदा जा सकता है तो इससे काले धन के इस्तेमाल की संभावना बहुत ही कम हो जाती है.


जब सब कुछ सही है तो बवाल कहा है?


हफिंग्टन पोस्ट की ख़बर के हिसाब से बजट के 2-3 दिन पहले एक वरिष्ठ आयकर अधिकारी को वित्तमंत्री के इस प्रस्ताव में एक मूलभूत चूक दिखाई दी. जिसके लिए वित्त मंत्रालय को बताया गया की इलेक्टोरल बॉंड्स को लाने के लिए रिज़र्व बैंक अधिनियम में संशोधन करना पड़ेगा. सूचना मिलते ही वित्त मंत्रालय ने रिज़र्व बैंक को चंद पंक्तियों का एक ई-मेल लिखकर उनका पक्ष जानने का नाटक मात्र किया. जिस पर रिज़र्व बैंक ने आपत्ति जताई थी. इस आपत्ति को दरकिनार कर सरकार ने रिज़र्व बैंक अधिनियम में संशोधन के साथ इलेक्टोरल बॉंड्स स्कीम को प्रस्तावित कर दिया. ख़बरों की मानें तो चुनाव आयोग ने भी इसका कड़ा विरोध किया था पर उसको भी दरकिनार कर दिया गया.


स्कीम के मुताबिक कुल 6000 करोड़ मूल्य के इलेक्टोरल बॉंड्स 10 चरणों में जारी होने थे. रिपोर्ट के मुताबिक़ पहले चरण के कुल 222 करोड़ राशि के बॉंड्स में से करीब 95% चंदा सत्ताधारी पार्टी यानि भाजपा को मिला.


अब सवाल ये है की सिर्फ सत्ताधारी पार्टी को ज्यादातर भाग क्यों हासिल हुआ जबकि देश में कई सारी राजनितिक पार्टियां है. तो इसका जवाब बॉंड्स के गोपनीय होने में छुपा है. दरसल बांड गोपनीय तो है पर पूरी तरह से नहीं पर सिर्फ़ सरकार या यूँ कहें की सत्ताधारी पार्टी जब चाहे तब ये जान सकती है कि किसने कितनी राशि के बांड ख़रीदे और किस राजनितिक पार्टी को दिए. तो ज़ाहिर है की कोई भी धनकुबेर सत्ताधारी पार्टी की नज़रो में नहीं खटकना चाहेगा .


अब शायद ये बात साफ़ हो गयी होगी कि क्यों भारतीय जनता पार्टी को कुल जारी हुए बांड्स का लगभग 95% हिस्सा हांसिल हुआ. कुछ प्रावधानों को डालकर सत्ताधारी पार्टी ने इन बांड्स से होने वाले लाभ को बड़ी चालाकी से अपनी तरफ मोड़ दिया.