कोरोना से गहराती शरणार्थियों की त्रासदी

UNHCR की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल के अंत तक दुनिया भरमें 8 करोड़ लोग युद्घ, हिंसा, दमन और मानवाधिकारों के उल्लंघन के चलते जबरन अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे.

- अभिनव श्रीवास्तव



आज से क़रीब पांच साल पहले तुर्की के समुद्र तट मिली तीन साल के मासूम अयलान कुर्दी की लाश ने दुनिया को झिंझोड़ दिया था. समुद्र तट पर औंधे मुंह गिरे इस सीरियाई बच्चे के माता-पिता युद्धग्रस्त सीरिया को छोड़कर ग्रीस में शरण लेने जा रहे थे, जब रास्ते में उनकी नाव डूब गई.


अयलान की इस बेहद मार्मिक तस्वीर ने शरणार्थियों की विडंबना के कई स्याह पहलुओं की ओर दुनिया का ध्यान खींचा था.


लेकिन मध्य-पूर्व से लेकर अफ़्रीका और एशिया तक में दर-ब-दर होकर दो वक़्त की रोटी और बुनियादी सुरक्षा की आस में भटक रहे शरणार्थियों के हालात आज हर लिहाज़ कहीं ज़्यादा ख़राब हैं. दुनिया के विकसित हिस्सों तक को लील चुके कोरोना संक्रमण ने जैसे इन समूहों की बची-खुची उम्मीद भी ख़त्म कर दी है.


संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने कुछ दिन पहले जारी की गई अपनी सालाना रिपोर्ट में चेताया था कि कोविड-19 के चलते दुनिया भर में शरणार्थियों और विस्थापित समूहों पर अतिरिक्त ख़तरा मंडरा रहा है.

यूनएएचसीआर की इस रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल के अंत तक दुनिया भरमें 8 करोड़ लोग युद्घ, हिंसा, दमन और मानवाधिकारों के उल्लंघन के चलते जबरन अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे.


इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2019 में इसी तरह तक़रीबन 1 करोड़ 10 लाख लोगों को विस्थापन करना पड़ा था.


आश्चर्य नहीं कि विश्व शरणार्थी दिवस के मौके पर संयुक्त राष्ट्र ने कोरोना संक्रमण की भी सबसे ज़्यादा मार दुनिया भर में शरणार्थियों और विस्थापितों पर पड़ने की बात दोहराई.


इस ख़तरे का जिक्र शुक्रवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन के महासचिव टेड्रोस गेब्रेयेसस ने भी किया. उन्होंने शरणार्थियों को बचाने की साझा जिम्मेदारी लेने की बात करते हुए कहा:


"दुनिया भर के अस्सी फीसदी से भी ज्यादा शरणार्थी और दुनिया में आंतरिक रूप से विस्थापित लगभग सभी लोग मध्य निम्न आय वर्ग वाले देशों में रहते हैं. डब्ल्यूएचओ वर्तमान में और आने वाले वक्त में इन शरणार्थी शिविरों में कोरोना संक्रमण के बड़े पैमाने पर फ़ैलने को लेकर बहुत चिंतित है."

कोरोना संक्रमण के दौरान शरणार्थियों के सामने आए संकट पर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के उच्चायुक्त फिलिपो ग्रैंडी ने भी चिंता जाहिर की. ग्रैंडी ने भावी चुनौतियों पर रोशनी डालते हुए कहा:


"मौजूदा वक़्त में कुल 8 करोड़ लोग या तो शरणार्थी या अपने ही घर में विस्थापित हैं. और सामान्य रूप से इसका मतलब है कि दुनिया की कुल आबादी का एक फीसदी हिस्सा जबरन निर्वासन झेल रहा है. हालांकि जिन जगहों जैसे बड़े शरणार्थी शिविरों में हमनें संक्रमण के बड़े पैमाने पर फ़ैलने का अनुमान लगाया था, वहां अब तक ऐसा नहीं हुआ है. और मेरे ख़याल से ऐसा इसलिए है क्योंकि हमें हालातों से निपटने के लिए तैयारी का वक़्त मिला."

ज़ाहिर है कि कोरोना संक्रमण ने इन वैश्विक संस्थाओं के सामने शरणार्थी और विस्थापित समूहों की चिंताओं को पहले से भी अधिक तैयारी के साथ निपटने की चुनौती बढ़ा दी है. क्योंकि संक्रमण के दौरान इन समूहों को लेकर यूरोप समेत एशिया के विभिन्न देशों की सरकारों ने भी बेरुख़ी दिखाई है, इसलिए वैश्विक एजेंसियों की ज़िम्मेदारी बेहद अहम हो गई है.

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