दुनिया को भयानक ग़रीबी में धकेल रहा कोरोना

कोरोना महामारी के चलते आई आर्थिक गिरावट के कारण दुनियाभर में 39 करोड़ 50 लाख अतिरिक्त लोग बेहद ग़रीबी की चपेट में आने वाले हैं. इससे विश्व में हर रोज़ 1.90 डॉलर यानि तक़रीबन 130 रूपये पर गुजारा करने वाले यानी गरीबी की गंभीर श्रेणी में आने वालों की तादाद 1 अरब पार कर जाने का अनुमान है.

- शादाब हसन ख़ान





इस समय पूरी दुनिया कोविड-19 की महामारी से जूझ रही है. जहां एक तरफ इसके चलते लाखों लोगों को जान तो गवांनी ही पड़ी है, वहीं वायरस के डर से लगाए गए लॉकडाउन से पूरी दुनिया में आर्थिक गतिविधियों को काफी बड़ा झटका लगा है.


चाहे विश्व की महाशक्ति अमेरिका हो, यूरोप के समृद्ध देश हों या लैटिन अमेरिकी व एशिया की मध्यम आकार वाली अर्थव्यवस्थाएं, इसने हर जगह नुक़सान पहुंचाया है. अफ़्रीका के ग़रीब मुल्कों की हालत का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं.


अभी हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना महामारी के चलते आई आर्थिक गिरावट के कारण दुनियाभर में 39 करोड़ 50 लाख अतिरिक्त लोग बेहद ग़रीबी की चपेट में आने वाले हैं. इससे विश्व में हर रोज़ 1.90 डॉलर यानि तक़रीबन 130 रूपये पर गुजारा करने वाले यानी गरीबी की गंभीर श्रेणी में आने वालों की तादाद 1 अरब पार कर जाने का अनुमान है.


यह अध्ययन रिपोर्ट विकास अर्थशास्त्र पर शोध करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था युनिवर्सिटी वर्ल्ड इंस्टीट्यूट ने जारी की है. संस्था ने अध्ययन के लिए पूरी दुनिया में कोरोना संकट के बाद पैदा हुए कई तरह के हालात का विश्लेषण किया. इसमें विश्व बैंक द्वारा तय किए गए ग़रीबी के कई मानकों को शामिल किया, जिसमें 1.90 डॉलर प्रतिदिन पर गुजारा करने वाले अत्यंत गरीब से लेकर प्रतिदिन 5.50 डॉलर पर रहने वाले सामान्य ग़रीब तक को ध्यान में रखा जाता है.


सबसे बुरे हालात को ध्यान में रखकर अनुमान लगाया है कि प्रति व्यक्ति आय या उपभोग में बीस प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. इससे घोर ग़रीबी में रहने वालों की संख्या 1.12 बिलियन पहुंचने का ख़तरा है, वहीं उच्च-मध्यम आय वाले देशों में भी इतनी ही गिरावट का अनुमान लगाया है, जहां कि प्रतिदिन 5.50 डॉलर पर रहने वाले सामान्य गरीबों की संख्या 3.7 बिलियन हो जाएगी. बता दें कि यह संख्या दुनिया की आबादी के आधे से भी अधिक है.


अध्ययन रिपोर्ट लिखने वालों में से एक एंडी समनर का कहना है, ‘दुनियाभर में घोर गरीबी में रहने वालों की दशा भविष्य में और दयनीय दिखाई दे रही है. अगर हालात इतने खराब हुए तो दुनियाभर में गरीबी से लड़ने के लिए किए जा रहे प्रयासों को तगड़ा झटका लगेगा और हम बीस से तीस वर्ष पहले वाली स्थिति में पहुंच जाएंगे. संयुक्त राष्ट्र का ग़रीबी खत्म करने का लक्ष्य महज स्वप्न ही रह जाएगा. इससे निपटने के लिए सरकारों को जल्द और बड़े कदम उठाने होंगे ताकि इन अत्यंत गरीबों को मंडरा रहे खतरे से बचाया जा सके.


लॉकडाउन में सभी फैक्ट्री, ऑफिस, मॉल्स, व्यवसाय बंद होने से घरेलू आपूर्ति और मांग प्रभावित होने के चलते आर्थिक वृद्धि दर प्रभावित हुई है. विश्व बैंक ने आगाह किया है कि इस महामारी की वजह से भारत ही नहीं बल्कि समूचा दक्षिण एशिया ग़रीबी उन्मूलन से मिले फ़ायदे को गवां सकता है. इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन ने कहा था कि कोरोना वायरस सिर्फ एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट नहीं रहा, बल्कि ये एक बड़ा लेबर मार्केट और आर्थिक संकट भी बन गया है जो लोगों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा. उत्पादन स्थगित होने के कारण मजदूरों का पलायन बढ़ा है.


लॉकडाउन से भारत की बेरोज़गारी दर में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है. इसको लेकर सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपने रिपोट्र्स में चेतावनी जारी की है. आईएलओ के अनुसार भारत के असंगठित क्षेत्र के 40 करोड़ से अधिक श्रमिक प्रभावित हो सकते हैं, जिससे उनका रोज़गार और कमाई प्रभावित होगा. इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत, नाइजीरिया और ब्राजील के साथ उन देशों में शामिल है, जो इस महामारी से होने वाली स्थितियों से निपटने के लिए अपेक्षाकृत सबसे कम तैयार थे. इस वजह से इसका असर देश के अंसगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ेगा और वे बेरोजगारी और गरीबी के गहरे दुष्चक्र में फंसते चले जाएंगे.

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