मीडिया के 'मुनाफ़े' पर कोरोना की सेंध

भारतीय मीडिया बालू के ढेर में खड़ा चमकता हुआ बुर्ज है. कोरोना की आंधी ने इसके नीचे की रेत को उड़ाकर इसे ज़मींदोज कर दिया है. यह रेत बनी थी विज्ञापनों से. मंदी (जो कि दरअसल महामंदी ही थी, मगर कोई बोल नहीं रहा था) और महामारी के दुर्योग ने विश्व की सबसे बड़ी मीडिया इंडस्ट्री का दंभ भरने वाले उद्योग का खोखलापन सामने ला दिया है.

-भास्कर उप्रेती



जिस दौर में अर्णव गोस्वामी, सुधीर चौधरी, रजत शर्मा, दीपक चौरसिया, अंजना ओम कश्यप, शशि शेखर जैसे पत्रकार मीडिया का मुखपृष्ठ हो गए हों, ऐसे समय में मीडिया के सशक्त और दीर्घायु होने की कामना करना एक दुविधापूर्ण स्थिति है! गणेश शंकर विद्यार्थी, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी से लेकर गौरी लंकेश तक ने जिस भारतीय मीडिया को गढ़ा-बुना-बनाया उसकी साख का किसी को लाभ मिल रहा है तो वो इन्हीं को मिल रहा है. आखिरकार इनकी आवाज टीवी के पर्दों, सोशल मीडिया के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुँचती है. करोड़ों लोगों में से अधिकांश इसे न्यूज़ ही मानते हैं. इनकी बात पर भरोसा करते हैं और उसी के आधार पर अपनी राय बनाते हैं. मगर, यह भी मान लीजिए कि विश्व की सबसे बड़ी मीडिया इंडस्ट्री के डूबने का प्रभाव इस तरह के पत्रकारों पर नहीं पड़ना है. ये लोग अपने समूहों में शीर्ष पदों पर हैं और कई बार मालिकों की सी हैसियत रखते हैं. इन्हें बड़े पैकेज मिलते हैं. इन्होंने वैध-अवैध स्रोतों से पीढ़ियों के लिए कमा लिया है. मंदी और कोरोना की आंधी के बाद यदि किसी के सर्वाइव करने की गुंजाईश है तो वह भी यही जमात है. डूबने-उतराने के इस खेल में बौद्धिक श्रम से पत्रकारिता और आजीविका करने वाले हज़ारों पत्रकार और उनके परिवार गंभीर संकट में आ गए हैं. 25 मार्च को शुरू हुए राष्ट्रीय लॉक डाउन की वजह से अधिकतर पत्रकार घरों में बंद हो गए. प्रिंट पत्रकारों में से बहुत थोड़े पत्रकार दफ्तरों में पहुँच सके. इलेक्ट्रोनिक में भी बहुत कम लोग फील्ड में दिखे. मुंबई जैसे मीडिया-केन्द्रित महानगरों में जहाँ कुछ पत्रकार फ़ील्ड में गए, वहां कोरोना ने उन्हें पकड़ लिया. मुंबई में 53 पत्रकारों के पॉजिटिव मिलने की ख़बरें आईं हैं, वहीं दिल्ली-लखनऊ जैसे नगरों से भी पत्रकारों के पॉजिटिव मिलने की ख़बरें आने लगी हैं. पत्रकारों का काम है सूचनाएं एकत्र करना. इसके लिए बाहर निकलना एक अनिवार्यता है. मगर, कोरोना इसकी इजाजत नहीं देता. वह पत्रकारों को नहीं पहचानता. जो पत्रकार जितना साहसी होगा, उसे ये उतनी ही जल्दी पकड़ लेगा. आधुनिक इतिहास में यह पहली बार है कि पत्रकार न सिर्फ फ़ील्ड में नहीं जा पा रहे हैं, बल्कि घरों में बैठे रहने पर अधिक असुरक्षित हो उठे हैं. दो विश्व युद्धों, हिरोशिमा-नागासाकी, तमाम गृह युद्धों, प्राकृतिक आपदाओं, महामारियों के वक़्त ऐसा कभी नहीं हुआ कि पत्रकार असहाय होकर घर बैठ गए हों. घर में बैठे रहने के साथ मानसिक यंत्रणा और अपराधबोध हो ही रहा है, आगे भी हमेशा के लिए घर बैठे रहने की आशंकाएं प्रबल हो उठी हैं. भारतीय मीडिया बालू के ढेर में खड़ा चमकता हुआ बुर्ज है. कोरोना की आंधी ने इसके नीचे की रेत को उड़ाकर इसे ज़मींदोज कर दिया है. यह रेत बनी थी विज्ञापनों से. मंदी (जो कि दरअसल महामंदी ही थी, मगर कोई बोल नहीं रहा था) और महामारी के दुर्योग ने विश्व की सबसे बड़ी मीडिया इंडस्ट्री का दंभ भरने वाले उद्योग का खोखलापन सामने ला दिया है. आरएनआई के मुताबिक इस समय भारत में 1,18,239 पंजीकृत प्रकाशक हैं. इनमें से 17,573 दैनिक समाचार पत्र हैं, 1,00,666 पीरियोडिकल्स और 900 टीवी चैनल हैं. न्यूज़ चैनल्स में से लगभग 50 प्रतिशत समाचार चैनल्स हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप विश्व का सबसे बड़ा मीडिया घराना है और ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ अख़बार विश्व का सबसे अधिक प्रसार वाला अंग्रेजी दैनिक. भाषाओं में विश्व में सबसे अधिक प्रसार वाला ‘दैनिक जागरण’ है. उसी के आस-पास खड़ा है ‘दैनिक भास्कर’. चंद समूहों जैसे टाइम्स ग्रुप, एचटी ग्रुप, एक्सप्रेस ग्रुप, दि हिन्दू ग्रुप, टेलीग्राफ आदि को छोड़ दें तो भारतीय मीडिया का बड़ा समूह नव-उदारवाद की आंधी से ही जन्मा है. यानी यह जन्मना ही बाजारू और भ्रष्ट रहा है. यहाँ शराब, खनन, कोयला और प्रॉपर्टी व्यवसाय करने वालों ने मुनाफा और प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए निवेश किया है या खुद के मीडिया संस्थान खोल लिए हैं. कई मीडिया संस्थानों के मालिक या शेयरधारकों में राजनेता भी शामिल हैं. मगर, इतने बड़े घराने कोरोना के पहले ही प्रहार में ढह गए. ये खुद के लिए पूँजी का निर्माण करने वाले पत्रकारों की हिफ़ाज़त नहीं कर सके. जिन बड़े घरानों से उम्मीद थी कि वे अपने कर्मचारियों के साथ खड़े होने की स्थिति में हैं उन्होंने ही सबसे पहले अपने कर्मचारियों से किनारा करना शुरू कर दिया. टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप (‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘आज तक’, ‘रेडिओ मिर्ची’ आदि) ने पहले ‘टाइम्स लाइफ’ सप्लीमेंट को मर्ज करते हुए उसके कर्मचारियों की छुट्टी की. फिर ‘संडे मैगज़ीन’ भी बंद कर दी. स्टाफ को संस्थान छोड़ने के मेल कर दिए. बचे हुए कर्मचारियों के वेतन में 5 से 10 फ़ीसदी कटौती की घोषणा कर दी. दूसरी खबर ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड से आई’. यहाँ सैलरी कट हुआ. हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप (‘हिंदुस्तान’, ‘हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘कादम्बनी’, ‘नंदन’, ‘रेडिओ फीवर’, ‘दि मिंट’ आदि) ने गजब का खेल किया. सैलरी स्ट्रक्चर में घपला करते हुए फिक्स्ड पे का बड़ा हिस्सा वेरिएबल कंपोनेंट में डाल दिया. साथ ही अपने कर्मचारियों से 25 प्रतिशत तक सैलरी कटौती की अपील कर डाली. जो कहने को वोलंटरी थी लेकिन जिसे असल में सबके लिए लागू ही होना है. पुणे से निकलने वाले ‘साकेत टाइम्स’ ने 15 कर्मचारियों को निकाल दिया. ‘हमारा महानगर’ ने अपने मुंबई, पुणे और नासिक के एडिशन ही बंद कर दिए. 43 साल पुराने अंग्रेजी दैनिक ‘स्टार ऑफ़ मैसूर’ ने बंदी कर ली. ‘न्यूज़ नेशन’ ने 10 पत्रकारों को बाहर कर दिया. बड़े जोशो-ख़रोस से शुरू हुए ‘क्विंट न्यूज़’ ने अपने टीवी चैनल को बंद कर दिया, साथ ही 50 प्रतिशत कर्मचारियों को बिना तनख़्वाह के काम करने के लिए कहा. सुभाष चंद्रा (जी ग्रुप) का अख़बार ‘डी.एन.ए.’ बंद कर दिया गया. ‘डेक्क्न क्रोनिकल’ ने केरल संस्करण को बंद कर दिया. ‘दि एशियन एज़’ ने मुंबई और कोलकाता संस्करण बंद कर दिए हैं. एनडीटीवी ने 50 हज़ार मासिक से अधिक पाने वालों के लिए 50 प्रतिशत तक पे-कट का एलान किया है. पे-कट तो बाकी प्रिंट और टी.वी. मीडिया ने भी कर दी है, लेकिन सबसे ख़तरनाक है नौकरी का ही चला जाना. मीडिया घरानों ने सन्देश दिया कि उनके लिए उनकी कंपनी में सबसे अनुत्पादक कोई चीज है तो वो हैं पत्रकार. सबसे पहले किसी पर गाज गिरेगी तो वह है पत्रकार. उद्योगों में बंदी और मंदी की वजह से पहले से ही विज्ञापन दरें कम थीं, जब संस्थानों के विज्ञापन विभाग कोरोना से लड़खड़ा गए तो कई संस्थानों ने पत्रकारों पर ही विज्ञापन लाने का दवाब बनाना शुरू कर दिया. मतलब साफ़ है, नौकरी बचानी है तो विज्ञापन जुटाओ. ‘प्रभात खबर’ ने तो पत्रकारों से 25 हज़ार का विज्ञापन लाने या 25 हज़ार जमा करने के लिए कहा. ऐसे में पत्रकार विज्ञापन जुटाने लगे. मगर, छिटपुट विज्ञापनों से इतने विशाल संस्थान कब तक चलेंगे? और विज्ञापन आएंगे कहाँ से? जब विदेशी पूँजी भाग खड़ी हुई है, जब शेयर बाज़ार ब्लड बाथ कर रहे हों, जब सभी बड़े उद्योग बंद हों, छोटे उद्योग अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हों, कौन विज्ञापन देगा? कोई कंपनी विज्ञापन तब देती है जब सामान्य रूप से उसका उत्पाद न बिक पा रहा हो, उत्पाद गोदामों में डंप पड़े हों. कंपनियों की बैलेंस शीट में विज्ञापन देने की गुंजाईश दिख रही हो. ‘दि फाइनेंसियल टाइम्स’ के मुताबिक एतिहासिक रूप से उपभोक्ता बाज़ार की खपत 50 प्रतिशत से अधिक गिर चुकी है. गर्मी शुरू होते ही कोल्ड ड्रिंक्स और आइसक्रीम का जो बाज़ार आसमान छूने लगता था वह लॉक डाउन के बाद भी संभल पाएगा कहना मुश्किल है. कम से कम मई और जून में इनका वही माल बाज़ार में आएगा जो पहले से गोदामों में इंतजार कर रहा है. ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री भारतीय मीडिया के लिए एक बड़ा विज्ञापनदाता है, लेकिन उसकी कमर कोरोना के पहले ही टूट चुकी थी, जब 40 प्रतिशत तक सेल गिर गई थीं. नाज़ुक हालातों से गुजर रहे लोग आगे भी कारें खरीदेंगे, ऐसा मुमकिन नहीं लगता. वही हाल एक बड़े विज्ञापनदाता प्रॉपर्टी सेक्टर का है. यह और भी बुरी हालत में है. यह मीडिया इंडस्ट्री को सहारा देगा या खुद को संभालेगा. हाल के दिनों में उभर रहे टूरिज्म सेक्टर को भी कोरोना ने बड़ा झटका दिया है. ल