उत्तराखंड: ज़िंदगी लीलने लगा है ज़िला स्तरीय विकास प्राधिकरण

एक पखवाड़े के ​भीतर ही दो आत्महत्याओं के चलते उत्तराखंड के बागेश्वर ज़िले में ज़िला विकास प्राधिकरण के ख़िलाफ़ लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह दोनों आत्महत्याएं, ज़िला विकास प्राधिकरण के ​कड़े नियमों के चलते हुई हैं जो कि पहाड़ी भौगोलिक स्थितियों के बिल्कुल प्रतिकूल हैं.

- विशेष संवाददाता


बीते सोमवार को स्थानीय व्यापारियों और नागरिकों ने प्राधिकरण का विरोध दर्ज करते हुए एक दिवसीय बाज़ार बंद का आयोजन किया था.


​प्राधिकरण का विरोध कर रहे प्राधिकरण हटाओ मोर्चा का आरोप है कि मैदानी क्षेत्रों के अनुरूप बने विकास प्राधिकरण के नियमों को पहाड़ी ​इलाकों में भी हू-ब-हू थोप दिया गया है जिसके चलते आम नागरिकों के लिए भवन बनाना असंभव हो गया है.


प्राधिकरण हटाओ मोर्चा बागेश्वर के सचिव पंकज पांडे कहते हैं, ''प्राधिकरण के नियम पहाड़ों की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के प्रतिकूल हैं. इन नियमों के साथ यहां निर्माणकार्य कराना असंभव है. उत्तराखंड के लिए एक अलग पहाड़ी राज्य का सपना इसी मक़सद से देखा गया था कि यहां की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के अनुरूप विकास का एक मॉडल विकसित किया जा सके. लेकिन प्राधिकरण की परिकल्पना ही इसके विपरीत है. प्राधिकरण के अधिकारियों का रवैया ब्रिटिश दौर की तरह कठोर जन विरो​धी है. अपनी ज़िंदगी भर की कमाई को बर्बाद होता देख लोग इतना मजबूर हो जा रहे हैं कि वे आत्महत्या कर ले रहे हैं.'' वे आगे कहते हैं, ''हम नियोजित विकास के ख़िलाफ़ नहीं हैं. लेकिन नियोजन वैज्ञानिकता भरा हो तर्कसंगत हो. पहांड़ों की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति को अनदेखा कर मैदानों के नियमों को पहाड़ों में थोप देना नियोजित विकास नहीं है.''


बागेश्वर शहर के लोगों में प्राधिकरण के साथ ही बागेश्वर महायोजना/ मास्टर प्लान के ख़िलाफ़ भी रोष है जिससे जुड़े मामलों को विकास प्राधिकरण को ही सौपा गया है. इसके तहत शहर की भूमि को बिना स्थानीय लोगों की राय जाने अलग अलग श्रेणियों में बांट दिया गया था. इसमें लोगों की नाप भूमि भी शामिल थी.


प्राधिकरण हटाओ मोर्चा के अध्यक्ष प्रमोद मेहता कहते हैं, ''प्राधिकरण के अलावा बागेश्वर शहर 'महायोजना' का भी शिकार हुआ. यहां की भूमि को अलग अलग श्रेणी में बांट दिया गया था. यह आत्महत्याएं दरअसल महायोजना की ही देन हैं. कल्याण सिंह रावत की भूमि का भूउपयोग महायोजना के तहत केवल कार्यालयों के निर्माण के लिए कर दिया गया था. बाद में जब उन्होंने वहां एक भवन बनाना चाहा तो पहले तो उन्हें रोका गया. उन पर 10000 का फाइन लगाया गया और बाद में उनसे कोर्ट के चक्कर लगवाए. आख़िर में उनके निर्माणाधीन भवन के ध्वस्तीकरण के आदेश जारी कर दिए गए.''


​बीते 4 सितंबर को, बागेश्वर के निवासी कल्याण सिंह रावत ने आत्महत्या कर ली थी. उन्होंने अपने सुसाइड नोट में लिखा है,

"एक साल से बीमार चल रहा हूँ. प्राधिकरण वालों ने मुझे परेशान कर दिया है. ..... मैंने मकान बनाना सुरु (शुरू) किया रोक लगा दी. 10000 रु का जुर्माना लगा दिया. मैं ग़रीब किसान हूँ मज़दूर हूँ मैं कुछ नहीं कर सकता...

कल्याण सिंह रावत के भतीजे दिनेश सिंह कहते हैं, ''कई सालों से प्राधिकरण और कोर्ट के चक्कर लगाने से वे तंग आ चुके थे. 29 अगस्त को उन्हें एडीएम कोर्ट से मकान के ध्वस्तीकरण का नोटिस मिला इससे वे टूट गए. उन्हें अपनी ही नाप ज़मीन में मकान बनाने के लिए 10 हज़ार का जुर्माना भरना पड़ रहा था और मेहनत की कमाई से बनाया उनका निर्माणाधीन मकान तोड़ दिया जाना था. हताश हो कर उन्होंने आत्महत्या कर ली.''


इससे तकरीबन एक पखवाड़े पहले शहर के एक अन्य रहवासी देवी दत्त भट्ट ने भी इसी तरह के एक मामले में प्राधिकरण की ओर से मिले नोटिस के चलते आत्महत्या कर ली थी.


हालांकि, ज़िला प्राधिकरण के अधिकारियों ने कहा है कि उन्होंने नियमों के अनुसार ही कार्रवाई की है. प्राधिकरण के सचिव और बागेश्वर के एडीएम राहुल गोएल कहते हैं, ''हमने नियमों से परे जाकर कोई कार्रवाई नहीं की है. हम लोगों ने उन्हीं को नोटिस भेजे या अन्या कार्रवाई की जिन्होंने नियमों का उल्लंघन किया था. अगर किसी को प्राधिकरण या कोर्ट की कार्रवाई पर कोई एतराज़ है तो वह आत्महत्या जैसा क़दम उठाने के बजाय उपरी अदालतों में अपील कर सकता है.'' गोएल यह ​भी कहते हैं कि प्राधिकरण हटाओ मोर्चा के एक्टिविस्ट जो मांगें उठा रहे हैं वह पॉलिसी मैटर है और प्रशासन के दायरे से बाहर है. वे कहते हैं, ''नीतियों के निर्माण का कार्यक्षेत्र सरकार का है और हमारा काम सिर्फ उन पर अमल लाने का है.''

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