कोरोना वायरस पर क्या वैज्ञानिक सलाहों की अनदेखी करता रहा अमेरिका?

अमेरिका की सं​क्रमण रोगों की ऐजेंसी के प्रमुख डॉ. एनथॉनी फ़ौसी के एक बयान के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ उनका विवाद छिड़ गया है. कोरोनावायरस के संकट के दौर में इस विवाद ने कोरोना वायरस से लड़ने में अमेरिकी राज्य की लापरवाहियों की पोल खोल दी है. पढ़ें पूरा मामला क्या है?

- रोहित जोशी



वही अमेरिका में भी हो रहा है जो कि दुनिया भर में. मौजूदा कोरोना संकट से निपटने के लिए सरकारों ने एहतियातन क़दम बेशक उठाए हैं लेकिन कई बार उनमें दूरदर्शिता की क़मी है और भरपूर लापरवाही भी. कई महत्वपूर्ण लोग उन कमियों की तरफ़ इशारा कर रहे हैं और इसके लिए सरकार की आलोचना भी कर रहे हैं. लेकिन महामारी के इस संकटकाल में सरकारें, जो कि अप्रत्याशित रूप से शक्तिशाली हो गई हैं, आलोचनाओं को तक़रीबन राष्ट्रद्रोह बना देने पर तुली हैं. उन देशों में यह संकट और बड़ा है जहां किसी नेता के ऐसे कट्टर समर्थकों की जमात बहुतायत में है जिनकी सपाट दृष्टि कोई आलोचना सुनने की आ​दी नहीं. अमेरिका में कोरोना वायरस की महामारी के बीच तब यही स्थिति पैदा हो गई जब वहां के एक वरिष्ठ और लोकप्रिय वैज्ञानिक डॉ. एनथॉनी फ़ौसी (Dr Anthony Fauci) ने एक बयान दिया. बयान के बारे में जानने से पहले यह संक्षिप्त में यह जान लेते हैं कि डॉ. फ़ौसी हैं कौन? 79 साल के फ़ौसी, 1984 से फ़ैड्रल इंफ़ैक्सियस डिज़ीज़ एजेंसी के प्रमुख हैं. एक लोकप्रिय वैज्ञानिक हैं, जन स्वास्थ संकट के दौर में हुए कुछ पोल्स में अमेरिकियों ने उन पर राष्ट्रपति ट्रंप से ज़्यादा भरोसा जताया है. उन्हें, 2008 में अमेरिका के प्रतिष्ठित पुरस्कार प्रैज़िडेंसियल मेडल ऑफ़ फ्रीडम से नवाजा जा चुका है. अब मुद्दे पर आएं, अमेरिकी समाचार चैनल सीएनएन के एक कार्यक्रम ''स्टेट ऑफ़ दि यूनियन'' में फ़ौसी से न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के हवाले से पूछा गया था कि क्या व्हॉइट हाउस को नोवल कोरोना वायरस से जुड़ी चेतावनी जारी कर दी गई थी?

इसका जवाब देते हुए फ़ौसी ने कहा था कि हां अगर उस चेतावनी के मद्देनज़र देश में लॉकडाउन पहले किया होता तो हालात ​इतने बुरे नहीं होते. हालांकि उन्होंने इस साक्षात्कार में एक बात और जोड़ी. उन्होंने कहा था, ''बेशक, यही ठीक होता कि हमने शुरू में ही बेहतर शुरूआत की होती, लेकिन मैं समझता हूं कि आप यह नहीं कह सकते कि जहां हम आज हैं वह किसी एक कारण की वजह से हैं. यह बहुत कॉंप्लिकेटेड है.'' हालांकि इस बयान में विवाद होने लायक कुछ नहीं था, एक ज़िम्मेदारी भरा बयान था. लेकिन क्योंकि ट्रम्प और उनके समर्थकों को आलोचना का लेश मात्र नहीं पसंद तो यह विवाद का विषय बन ​गया. इसके बाद रविवार को राष्ट्रपति ट्रम्प ने एक ट्वीट को रीट्वीट किया जिसमें डॉ. फ़ौसी की उनके बयान के लिए आलोचना की गई थी और "time to #FireFauci" के हैश टैग के साथ अपील थी, कि फ़ौसी को फ़ायर करने का समय आ गया है. ट्रंप ने ख़ुद एक पूर्व रिपब्लिकन कॉंग्रेस प्रत्याशी के इस ट्वीट को रिट्वीट किया था जिसमें स्पष्ट​ अपील थी कि फ़ौसी को फ़ायर करने का समय आ गया है. ऐसे में मीडिया और पूरे देश में चर्चा होना स्वाभाविक ही था कि संकट की इस घड़ी में देश के सबसे अनुभवी वैज्ञानिक को उसके दायित्वों से केवल इसलिए हटा देना क्योंकि उसने सरकार की लापरवाही पर सवाल उठाया हो, कितना ग़ैर ज़िम्मेदारी भरा है. हालांकि अब व्हॉइट हाउस की ओर से एक बयान आया है कि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप अमेरिका के संक्रमण रोगों के सबसे वरिष्ठ एक्सपर्ट को नहीं उनके पद से नहीं निकालेंगे. व्हाइट हाउस के प्रवक्ता होगन गिडले ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा, ''मीडिया में जो कयास बाज़ी हो रही है वह बेहुदी है. राष्ट्रपति ट्रंप डॉ. फ़ौसी को नहीं फायर (निकाल) कर रहे हैं. डॉ. फ़ौसी राष्ट्र​पति डोनल्ड ट्रंप के विश्वासपात्र सलाहकार बने रहेंगे.''

इधर न्यू यॉर्क टाइम्स की इस रिपोर्ट पर भी अमेरिका में काफ़ी विवाद छिड़ा हुआ है जिसमें कहा गया है कि वैज्ञानिकों ने व्हाइट हाउस को फ़रवरी के तीसरे हफ़्ते में ही ज़रूरी क़दम उठाने की सलाह दी थी. लेकिन ट्रंप सरकार ने लापरवाही दिखाई. इसी दौरान वे भारत के एक दौरे पर भी गए/आए. यहां उन्होंने गुजरात में प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक विशाल जन समूह को संबोधित भी किया. हांलाकि ट्रंप ने कहा है ​कि न्यू यॉर्क टाइम्स की यह रिपोर्ट 'फ़ेक न्यूज़' है. उन्होंने चीन से आने वाले यात्रियों पर ​प्रतिबंध लगा दिया था.

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