फांसियों का फ़र्क़

22 मार्च 1931 की रात से जेल में फांसी की तैयारी जोरों सोरों से चल रही थी. क्योंकि 24 मार्च की सुबह फांसी होनी थी. लेकिन, अंग्रेजों ने तय किया कि 23 मार्च की शाम पांच बजे ही फांसी दे दी जाए. ऐसे वक्त में भगत सिंह क्या कर रहे थे ?

- मनमीत


आज से तक़रीबन एक साल पहले निर्भया मामले में चारों दोषियों को फांसी हुई थी. फांसी पर जल्लाद की क़िस्सागोई सुन रहा था. बता रहा था कि चारों थर-थर कांप रहे थे. एक ने कपड़ों पर सूसू भी कर दी, तो दूसरा बेहोशी की हालत में था. चारों बदहवास थे. किसी तरह पुलिस के हट्टे-कट्टे सिपाई उन्हें काबू में कर के तख्ते तक ले गए और फिर जल्लाद ने उन्हें अंजाम तक पहुंचाया.


ये तो हुई अपराधी, दरिंदो और बुजदिलों को फांसी. जिनमें कुरुरता की सभी हद पार करने के बाद जब अपनी बारी आई, तो रोने लगे. हवा टाइट हो गयी. कमोबेश, ये ही हाल अजमल कसाब, रंगा बिल्ला और नाथूराम गोडसे का भी था.


लेकिन, फांसी के फंदे तक पहुंचने की कहानी केवल बुज़दिलों की ही नही होती. 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी सिद्ध किया.


सात अक्तूबर, 1930 को अदालत ने 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई. सजा सुनते ही तीनों मुस्कुराये और ज़ोर से नारा लगाया 'इंकलाब जिंदाबाद'.


22 मार्च 1931 की रात से जेल में फांसी की तैयारी ज़ोरों-सोरों से चल रही थी. क्योंकि 24 मार्च की सुबह फांसी होनी थी. लेकिन, अंग्रेजों ने तय किया कि 23 मार्च की शाम 7 बजे ही फांसी दे दी जाए. ऐसे वक्त में भगत सिंह क्या कर रहे थे?

भगत सिंह फांसी से कुछ ही घंटों पहले एक बेहद ज़रूरी काम निपटा रहे थे. वे अपने बैरक में लेनिन की जीवनी 'रिवोल्युश्नरी लेनिन' पढ़ रहे थे जो कि उन्हें उनके वकील प्राण नाथ मेहता ने लाकर महज दो घंटे पहले लाकर दी थी.


जब फांसी का समय हुवा तो उन्हें लेने जेलर, डिप्टी जेलर और दूसरा स्टाफ़ आया. भगत सिंह ने उन्हें देखा और कहा क्या आप मुझे इस किताब का एक भी अध्याय पूरा नहीं करने देंगे?


इसके बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को उनके अंतिम स्नान के लिए कहा गया. ​उन्हें काले कपड़े पहनाए गए, लेकिन उनके कहने पर उनके मुंह को ढका नहीं गया.


फांसी के तख्ते पर चढ़ने के बाद, गले में फंदा डालने से ऐन पहले भगत सिंह ने डिप्टी कमिश्नर की और देखा और मुस्कुराते हुए कहा, ‘मिस्टर मजिस्ट्रेट, आप बेहद भाग्यशाली हैं कि आपको यह देखने को मिल रहा है कि भारत के क्रांतिकारी किस तरह अपने आदर्शों के लिए फांसी पर भी झूल जाते हैं.'


भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को क्रांतिकारी सलाम!

रेहान फ़ज़ल की विवेचना BBC हिंदी से साभार

SUPPORT US TO MAKE PRO-PEOPLE MEDIA WITH PEOPLE FUNDING.

Subscribe to Our Newsletter

© Sabhaar Media Foundation

  • White Facebook Icon

Nainital, India