त्रिवेंद्र सरकार का अहं

त्रिवेंद्र सरकार का अहम इतना बड़ा है कि वह पंचायत राज संशोधन एक्ट में उच्च न्यायालय के आंशिक सुधार से ही आहत हो गई है और उच्चतम न्यायालय जाने का राग अलाप रही है. पंचायत चुनाव नियत अवधि में करवाने में सरकार पहले ही नाकाम हो चुकी है और अब वह इन चुनावों को टालने का एक और बहाना बनाती प्रतीत हो रही है.

-इन्द्रेश मैखुरी


उत्तराखंड में पंचायत चुनाव के बारे में कल आए उच्च न्यायालय, नैनीताल के फैसले को लेकर उत्तराखंड सरकार का रुख हैरान करने वाला है. मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमारी मंशा तो जनसंख्या नियंत्रण थी,लेकिन कोर्ट की राय सरकार से भिन्न है. पंचायत राज मंत्री अरविंद पांडेय और पंचायत राज सचिव डा. रंजीत कुमार सिन्हा का बयान अखबारों में छपा है कि उच्च नयायालय के निर्णय के खिलाफ राज्य सरकार उच्चतम न्यायालय जाएगी.


तो क्या वाकई उच्च न्यायालय, नैनीताल ने कोई ऐसा फैसला दिया है, जो सरकार की नीति को उलट देने वाला है? उच्च न्यायालय के फैसले को पढ़ें तो ऐसा तो नहीं लगता.


मामला यूं है कि 2016 में उत्तराखंड का पंचायत राज अधिनियम, पारित हुआ. हरीश रावत सरकार द्वारा पारित करवाए गए, इस अधिनियम के जरिये भी चुनाव लड़ने वालों पर अनिवार्य शौचालय जैसी बन्दिशें थोपी गयी. बहरहाल 26 जून 2019 को 2016 के पंचायत राज अधिनियम में कई संशोधनों के प्रस्ताव के साथ उत्तराखंड सरकार,उत्तराखंड पंचायत राज संशोधन अधिनियम 2019 ले कर आई. इस संशोधन अधिनियम में चुनाव लड़ने वालों के लिए शैक्षिक अर्हता और 2 बच्चों की बंदिश जैसे नियम बना दिये गए.


दो बच्चों वाली बंदिश और यदि ग्राम सभा समय पर उप प्रधान नहीं बना पायी तो नियत प्राधिकारी उप प्रधान नामित कर देगा,जिसे चुना हुआ माना जाएगा, इन दो बिन्दुओं को कई याचिककर्ताओं ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी. उप प्रधान वाले बिन्दु पर की गयी आपत्ति को उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया.


जहां तक दो बच्चों वाली बंदिश को समाप्त करने का मामला है,तो कोर्ट ने कहा कि 25 जुलाई 2019 यानि जिस दिन यह अधिनियम लागू हुआ,उस दिन या उससे पहले यदि किसी की दो से अधिक संताने हों तो वह पंचायत चुनाव लड़ सकता है. क्या ऐसा कहते हुए कोर्ट ने राज्य सरकार के जनसंख्या वृद्धि पर रोकथाम जैसे तर्कों को खारिज कर दिया ? कतई नहीं. उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में तो जनसंख्या वृद्धि हो ही नहीं रही है,अल्मोड़ा और पौड़ी जिलों में तो जनसंख्या वृद्धि की दर नकारात्मक है. लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को भी स्वीकार ही नहीं किया. पूरे फैसले को पढ़ें तो वह याचिककर्ताओं की दलीलों से अप्रभावित दिखता है और सरकार का ही समर्थन करता प्रतीत होता है. यहाँ तक की उक्त अधिनियम के अस्तित्व में आने से पहले जिनकी दो से अधिक संताने हैं, उन्हें चुनाव लड़ने से वंचित करने के प्रावधान को असंवैधानिक करार देने से भी अदालत ने परहेज किया है. अदालत ने अपने फैसले में बस इतना कहा कि 25 जुलाई 2019 यानि जिस दिन से उत्तराखंड पंचायत राज संशोधन अधिनियम 2019 अस्तित्व में आया, उस दिन या उससे पहले यदि किसी की दो से अधिक संताने हैं,वह पंचायत राज संस्थानों के चुनाव लड़ने के लिए अर्ह होगा.


हालांकि इसमें तकनीकि पेंच यह है कि उच्च न्यायालय ने यह तो कहा कि 25 जुलाई 2019 से पहले दो से अधिक संतानों वाले ,पंचायत राज संस्थानों में चुनाव लड़ सकेंगे,लेकिन यह धारा 8(1)(r) का उल्लेख करते हुए कहा है,जबकि धारा 8 तो सिर्फ ग्राम प्रधानों और उप प्रधानों की अर्हता को निर्धारित करती है.ऐसा प्रतीत होता है कि उच्च न्यायालय ने यह समझा कि धारा 8(1)(r) ही सभी पंचायत प्रतिनिधियों का चुनाव लड़ने वालों पर 2 से अधिक संतानों की बंदिश लगाने वाली धारा है और इसलिए अदालत ने उक्त धारा का उल्लेख करते हुए कह दिया कि 25 जुलाई 2019 से पहले दो से अधिक संतानों वाले भी सभी पंचायत राज संस्थानों में चुनाव लड़ सकेंगे !


इस संदर्भ में यह गौरतलब है कि जब उत्तराखंड पंचायत राज संशोधन अधिनियम 2019 विधानसभा में पेश किया गया था तो संतानों वाली बंदिश के मामले में लिखा गया था कि यदि तीसरी संतान इस विधेयक के प्रवृत्त होने के 300 दिन के पश्चात हुई हो तो ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़ने हेतु अनर्ह होगा. वह तो यमनोत्री के विधायक केदार सिंह रावत संशोधन लाये और संतानों वाली बंदिश बैक डेट से लागू हो गयी. इस तरह देखें तो विधानसभा में संशोधन के चलते हुई चूक को उच्च नयायालय ने आंशिक तौर पर ही सुधारा है.


परंतु सरकार का अहम इतना बड़ा है कि वह इस आंशिक सुधार से ही आहत है और उच्चतम न्यायालय जाने का राग अलाप रही है. पंचायत चुनाव नियत अवधि में करवाने में सरकार पहले ही नाकाम हो चुकी है और अब वह इन चुनावों को टालने का एक और बहाना बनाती प्रतीत हो रही है.


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