इलेक्टोरल बांड्स - राजनीति में कॉर्पोरेट दख़ल बढ़ाने का औज़ार (पार्ट - 2)

Updated: Dec 1, 2019

कोई भी कंपनी कितना भी राजनितिक चंदा दे सकती हैं और शैल कंपनियां, यहाँ तक की विदेशी कंपनियां भी चंदा दे सकती हैं.
सरकार ने इन बांड्स को RTI कानून के दायरे से बाहर रखा है.

- मोहित पाठक


रिज़र्व बैंक और चुनाव आयोग की आपत्ति के बावजूद इलेक्टोरल बॉंड्स जारी करने पर आमादा सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने उस प्रावधान को भी बदल दिया जिसमें एक कंपनी अधिकतम अपने तीन वर्ष के मुनाफ़े का 7.5% तक ही चंदा दे सकती थी, साथ ही विदेशी कम्पनियाँ राजनैतिक दलों को चंदा नहीं दे सकती थी.

अब नए कानून के हिसाब से ऐसी कोई सीमा नहीं है. मतलब कोई भी कंपनी कितना भी राजनितिक चंदा दे सकती हैं और शैल कंपनियां, जो कोई काम काज नहीं करती हैं और ज्यादातर बस पैसा घूमाने या टैक्स बचाने के लिए बनाई जाती हैं, भी चंदा दे सकती हैं. यहाँ तक की विदेशी कंपनियां भी चंदा दे सकती हैं. इससे राजनीति में कॉर्पोरेट जगत का हस्तक्षेप बढ़ जाता है और सरकार की नीतियां भी उनको मद्देनज़र रख कर बनाई जाती हैं.


इस क़ानून से पहले कंपनियों को यह बताना पड़ता था की किस राजनितिक पार्टी को कितना चंदा दिया गया है. पर नए क़ानून में इस प्रावधान को भी हटा दिया गया है. पहले राजनितिक पार्टियों को भी 20,000 रुपये से ज्यादा के गुमनाम चंदे का रिकॉर्ड रखना पड़ता था जो कि अब हटा दिया गया है. बहरहाल सरकार का कहना है कि ये सब पारदर्शिता बढ़ाने के लिए किया गया है. लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो इस प्रावधान से अब भ्रष्टाचार को वैध तरीक़े से किया जा सकता है.


शुरुआत में इलेक्टोरल बॉंड्स को बिना सीरियल नंबर पर जारी करने का प्रस्ताव था जिस पर स्टेट बैंक ने एतराज़ जताया था. स्टेट बैंक का तर्क यह था की इससे जाली बॉंड्स की पहचान करना मुश्किल है और अगर कोई जाली बांड से रकम हस्तांतरित हो जाती है तो पता लगाना बहुत मुश्किल है कि किस खाते से किस खाते में ये रकम गयी. जिसके बाद बॉंड्स को सीरियल नंबर के साथ जारी किया गया जो की नग्न आखों से नहीं देखे जा सकते और अल्ट्रावॉइलेट या पराबैंगनी रोशिनी में ही दिखाई देते हैं.


सरकार ने इन बांड्स को RTI कानून के दायरे से बाहर रखा है, जिससे गोपनीयता बनाई जा सके. पर ध्यान रहे सरकारी संस्थाएं जैसे सीबीआई / इडी या यूँ कहें कि सरकार ख़ुद ये जानकारी हासिल कर सकती हैं.