अपने भीतर के 'अ' को ख़त्म कीजिये
विज्ञान को पढ़ने में समस्या नहीं है , केवल विज्ञान को पढ़ने में बहुत बड़ी समस्या है। अ की तरह जो केवल जिज्ञासु हैं और विस्मयी ब का उपहास कर रहे हैं , वे दरअसल अपनी क्रूरता से अनजाने हैं। विस्मयहीन जिज्ञासा उन्हें नर से निरन्तर नराधम बना रही है :उनके भीतर का बच्चा नष्ट होता जा रहा है। जिज्ञासु जितना पाता जाता है , अहंकारी होता जाता है। विस्मय विनम्र है और भयभीत भी। वह प्रकृति को सम्मान देना जानता है , जिज्ञासा की तरह केवल उसे लूटता-खसोटता नहीं।
-स्कन्द शुक्ल

'अ' इतने जिज्ञासु हो लिये कि उनका विस्मयबोध ही मर गया ! 'ब' इतने विस्मयी हैं कि उनके अन्दर कोई जिज्ञासा ही नहीं पनप न सकी !
'अ' और 'ब' मेरे मुहल्ले में रहने वाले दो लोग हैं। दोनों से व्यक्तिगत परिचय कभी न रहा , बस समाज में उनके कार्यकलापों और विचारों से उन्हें समझ सका। ऐसा जब भी किया , तो 'अ' और 'ब' को ध्रुवीय दूरी पर स्थित पाया। अ के भीतर जिज्ञासा-ही-जिज्ञासा ! ब के भीतर विस्मय-ही-विस्मय !
अ अपनी जिज्ञासाएँ लेकर जीवन जीते। जिज्ञासाएँ उनके मन के पेड़ पर फूलों की तरह रोज़ उग आतीं , वे उन्हें चढ़कर तोड़ लिया करते।
फिर वे उन पुष्प-समूहों की चीरफाड़ करते। रंगीन पत्र-पत्र विलग , पुंकेसर-स्त्रीकेसर तार-तार ! उनके लिए जीवन का अर्थ ही पुष्पित जिज्ञासाओं को चुनते रहना और उनको काटते-छाँटते रहना ही जीवन जीने का एकमात्र तरीक़ा है। अ कुलमिलाकर एक रिडक्शनिस्ट इंसान हैं। सम्पूर्णता-बोध के स्थान पर सूक्ष्म विश्लेषण को तरजीह दिया करते हैं।
ब के मन का पेड़ भी उतना ही पुष्प-आच्छादित हुआ करता। पर ब फूल तोड़ते नहीं , पेड़ के नीचे बैठ जाते। पेड़ों पर फूलों का उगना निहारते : देखते कि किस तरह भिन्न-भिन्न वय के पुष्प एक-साथ सुमन-समाज में उत्फुल्लित हुए जी रहे हैं। कैसे उनपर पक्षी और कीड़े मँडरा रहे हैं , किस तरह वे उम्र जी कर झर रहे हैं।
ब के पास फूलों को लेकर कोई जिज्ञासा नहीं है , केवल विस्मय है। वे उन रंगीन पत्रदेहियों को क्षत-विक्षत करके नहीं , सम्पूर्णता-बोध के साथ घनी दृष्टि से पिया करते हैं।
अ द्वारा जिज्ञासा का चुनाव इस तरह किया जाता है कि जीवन अन्ततः विस्मयशून्य हो जाता है। प्रकृति को जानने की कोशिश करते-करते वह प्रकृति के प्रति सुन्न पड़ता जाता है। वस्तुतः जानने के साथ ही यह समस्या है। वह जानी गयी वस्तु या व्यक्ति के प्रति सुन्नता लाता ही है। अज्ञात के प्रति हम जितना विस्मित और प्रेमिल रहते हैं , उतना ज्ञात के प्रति रह ही नहीं सकते। पर अ इस सुन्नता को भी सगर्व बताता है कि वह कितना जिज्ञासु है। वह ब की विस्मयवृत्ति को बचपना बताता है , उसपर अपमानजनक ठहाके लगाता है।
विज्ञान को पढ़ने में समस्या नहीं है , केवल विज्ञान को पढ़ने में बहुत बड़ी समस्या है। अ की तरह जो केवल जिज्ञासु हैं और विस्मयी ब का उपहास कर रहे हैं , वे दरअसल अपनी क्रूरता से अनजाने हैं। विस्मयहीन जिज्ञासा उन्हें नर से निरन्तर नराधम बना रही है :उनके भीतर का बच्चा नष्ट होता जा रहा है। जिज्ञासु जितना पाता जाता है , अहंकारी होता जाता है। विस्मय विनम्र है और भयभीत भी। वह प्रकृति को सम्मान देना जानता है , जिज्ञासा की तरह केवल उसे लूटता-खसोटता नहीं।
ब को हम-आप मूर्ख कह सकते हैं , लेकिन ऐसे मूर्खों से भरा संसार अ-निर्मित क्रूरकर्माओं की दुनिया से कहीं अधिक सुखी होगा। अगर आप अ और ब दोनों को बदलने की आवश्यकता सोचते हैं , तो अ को पहले बदलिए। उसी का बदलना प्राथमिक और आवश्यक समझा जाना चाहिए। संसार को आज जितनी हानि हो रही है , उसमें मूर्ख-कातर विस्मयी जनों का योगदान कम , कुटिल-क्रूर जिज्ञासुओं का अधिक है।