झूमते कोलोन का कार्निवाल
जर्मनी के कोलोन शहर में कार्निवाल का रंग अद्भुत् है. इसका हिस्सा बनना अलग अनुभव है. 2016 के फ़रवरी महीने के शुरूआती हफ़्ते में मुझे यह मौका मिला. वहीं के अनुभवों पर यह ब्लॉग है.
- रोहित जोशी

इन अनुभवों के लिए अगर ब्लॉग लिखने के बज़ाय मुझे एक रेडियो प्रोग्राम बनाना होता तो मैं उसकी शुरूआत अमरीकी लोकगायक वुडी गुथरी के लिखे गीत, '..दिस लैंड इज योर लैंड, दिस लैंड इज माय लैंड..' से करता, जिसे अमरीकी लोकगायकी के पितामह 'पीट सीगर' की ख़नकती आवाज़ ने, अपने 'बैंजो' के तारों में पिरोकर अमर कर दिया है. ये गाना मेरे ज़ेहन में, बॉन से कोलोन की ओर बढ़ रही ट्रेन में उस वक़्त उतरा, जब ट्रेन की खिड़की के बाहर रिमझिम बारिश में भींग रहे हरे-मटमैले खेतों का विस्तार दूर तक पसरा नज़र आ रहा था और उस पर बह रही तेज़ हवाओं को आप अपनी नज़रों से छू सकते थे. राइन नदी के साथ-साथ पसरे ये खेत, गंगा-यमुना के उपजाऊ दोआब के बीच गुज़रती हमारी किसी भी खड़बड़ाती ट्रेन से दिखने वाले नज़ारों से मेल खाते थे, हालांकि यूरोप और भारत का बुनियादी फ़र्क़ वहां भी माज़ूद था. मेरे इर्द-गिर्द की सीटों में अज़ब—ग़ज़ब तरह की पोशाकें पहने और अपने चेहरे पर मज़ाकिया क़िस्म से रंग-रोगन किए, तक़रीबन हर कोई शख़्स झूम रहा था. अगर मुझे जर्मनी पहुंचे एक हफ़्ता नहीं हो गया होता और शुक्रवार को डॉयचे वेले के दफ़्तर में कार्निवाल के एक मज़ेदार आयोजन में मैंने शिरकत नहीं कर ली होती, तो ये अज़ीब कपड़े पहने लोग मुझे ज़रूर चकरा देते. लेकिन मुझे मालूम था जर्मनी इन दिनों कार्निवाल के उल्लास में है और ट्रेन में मेरे साथ मौजूद तकरीबन हर शख़्स कोलोन में होने वाली ऐतिहासिक परेड देखने जा रहा है. कोलोन की परेड की गिनती रियो के कार्निवाल के बाद दुनिया की महत्वपूर्ण परेडों में होती है. ट्रेन मुझे कोलोन के सेंट्रल स्टेशन यानि 'कोएल्न बानहोफ़' ले आई. किसी रेलवे स्टेशन का ऐसा दृश्य आपको और कहीं देखने को शायद ही मिले. हर तरफ़ उमंग से लहराते लोग और उत्सव का माहौल. मुझे मालूम नहीं था कि मुझे कोलोन में जाना कहां है? परेड कहां होगी और कैसी होगी? लेकिन कोलोन स्टेशन के ठीक बाहर निकलते ही रंग-बिरंगे परिधानों में लिपटी भीड़, 'कोएल्नर डोम' यानि कोलोन के मुख्य गिरजाघर की बेहद ऊंची इमारत के सामने से होते, गलियों में घुमाते-फिराते मुझे खुद-ब-खुद उन सड़कों तक ले आई जहां से होकर परेड को गुजरना था. सड़कों के दोनों ओर खाने-पीने की अस्थाई दुकानें सजी हुईं थी. जिनमें बीयर, वाइन और अलग-अलग क़िस्म की कई शराबें भी मिल रही थी. खाने और पीने के शौकीन, दोनों कामों में मशगूल थे और अलग-अलग जगहों से आती संगीत की आवाज़ों में झूम रहे थे. ट्रेन में बैठे-बैठे ही मैं कार्निवाल का मोटा-मोटा इतिहास अपने फ़ोन पर गूगल में ख़ंगाल चुका था. मुझे पता चला कि जर्मनी में लोग एक तरह से मध्यकाल से कार्निवाल मनाते आए हैं. लेकिन इससे पहले भी लोग सर्दियों के ख़त्म होने के इस मौसम में कुछ पारंपरिक आयोजन के साथ जश्न मनाया करते थे. रोमन काल में लोग बसंत का स्वागत करते हुए ये उत्सव मनाया करते थे. इस उत्सव को 'वाइन' के देवता 'डायनॉयसॉस' के सम्मान में मनाया जाता था और इस दौरान ख़ूब शराब पीने और हंसने-गाने का रिवाज़ था. फिर जब राइन नदी से जुड़े इलाक़े का ईसाईकरण हुआ तो इस उत्सव को भी आधिकारिक तौर पर चर्च के कैलेंडर में शामिल कर लिया गया और बाद में इसे ही कार्निवाल का नाम मिला. पर असल में 19वीं सदी की शुरूआत में, जब प्रशिया के शासकों ने राइन नदी के इलाक़े पर शासन करना शुरू किया उसी दौर में कार्निवाल इस तरह संस्थागत हुआ. जर्मनी पहुंचने के बाद मुझे घर दिलाने में मदद करने वाले रिलोकेशन टीम के फ़ेलिक्स ने भी मुझे प्रशियन सेना और कार्निवाल से जुड़ा इतिहास बताया था. प्रशियन सेना को उसके कड़े अनुशासन और क्रूरता के लिए जाना जाता था. लेकिन कार्निवाल के दिनों में लोग प्रशियन सैनिकों की तरह का ड्रेस पहनकर, प्रशियन शासकों का विरोध जताते और मज़ाक उड़ाया करते थे. ये ही परंपरा आजकल की उन झांकियों में दिखाई देती है जो प्रशियन सेना की टुकड़ी का अभिनय करती हैं. कोलोन में सड़कों के दोनों ओर किलोमीटरों जुटी लाखों लोगों की भीड़ यही झांकियां देखने आई थी. कोलोन भर की सड़कों की बैरिकेडिंग की गई थी जिसके बीच से होकर झांकियों को गुजरना था. धीरे-धीरे इन रोचक झांकियों का सिलसिला शुरू हुआ. प्रशियन सैनिकों की तरह कपड़े पहने और उसकी नकल उतारते लोगों की अधिकतर झांकियों को पानी के जहाज़ की शक्ल दी गई थी. लेकिन इसके अलावा ट्रेन के इंजन, हवा में उड़ते से दिखते घोड़ों से बंधे विशाल रथ, और भी कई क़िस्म की झांकियां इस परेड में शामिल थीं. इन झांकियों के साथ ही ख़ूबसूरत परिधानों में सजे, संगीत बजाते और नाचते लोग भी शामिल थे. झांकियों के साथ चल रहे ये लोग झांकियां देखने आए लोगों पर टॉफियां-चॉकलेट्स और फूलों की बरसात कर रहे थे. जिन्हें बटोरने की लोगों में होड़ लगी हुई थी. मैं भी कुछ चॉकलेट्स और टॉफियां बटोरता रहा. जर्मन लोगों के नामों को याद करना भी मेरे लिए मुश्किल है. इसलिए उस ज़हीन शख्स का नाम भी मैं आपको नहीं बता पाउंगा जो शुरूआत में परेड देखते हुए ठीक मेरे बगल में अपनी पत्नी के साथ खड़े थे. उन्होंने मुझसे परेड के बारे में अपनी कई यादें साझा की और उत्सव की बारीक़ियों को मुझे समझाया. मसलन कि भीड़ झांकियों की ओर हाथ हिलाते हुए जो गुनगुना रही है उसका मतलब 'चाकलेट और फूल' मांगना है. किलोमीटरों लंबी इस क़तार के साथ मैं देर तक पैदल ही यहां-वहां घूमता रहा. अब तक भूख लग आई थी और मैं ये राय नहीं बना पा रहा था कि खाया क्या जाए. बेशक यहां पश्चिमी खाने का कोई विकल्प नहीं है. लेकिन मुझे सड़क के किनारे के एक स्टॉल में एक बड़े कंटेनर में खौलते तेल में कुछ तलता दिखाई दिया. मैं कुछ देर स्टॉल के बाहर खड़ा रहा तो भीतर से दुकानदार ने स्वागत कर बुलाया ''आलू की टिक्की है भाई साहब.. आइए!'' मैं चौंका ये तो हिंदुस्तानी आवाज थी. क़रीब गया तो दुकानदार ने लहराकर ताज़ा तली आलू की एक टिक्की मेरी तरफ बढ़ा दी. बताया कि उनका नाम आमिर है और वे पाकिस्तान से हैं. साथ में तेज़ी से टिक्कियां तल कर ग्राहकों की ओर बढ़ाती जर्मन महिला की ओर इशारा करते हुए आमिर ने बताया, ''ये मेरी वाइफ़ हैं. मैं पिछले 14 साल से जर्मनी में हूं और अब यहीं सैटल हो गया हूं.'' इसके बाद आमिर ने मुझसे मेरे बारे में पूछा और मेरी ओर एक कोक की बोतल और एक प्लेट में रख कुछ और टिक्कियां बढ़ा दी. साथ में सेव की मीठी चटनी भी थी. आमिर कार्निवाल के मेरे अनुभव पूछने लगे. लोगों की इतनी भीड़ के बीच आमिर ही थे जिनसे में अपनी भाषा में अपने अनुभव साझा कर पा रहा था. आमिर को टिक्की और कोक के पैसे देने चाहे तो उन्होंने एकदम मना कर दिया. अपना नंबर दिया और कहा, ''कभी भी कोलोन की तरफ आना हो तो ज़रूर कॉल कीजिए.'' आमिर के साथ इस छोटी मुल़ाकात ने मुझे आत्मीयता से भर दिया. उनकी पत्नी ने भी गर्मजोशी से मुझे विदा किया और मैं फिर कार्निवाल के उत्सव में शरीक़ हो गया. धीरे-धीरे शाम ढलने लगी थी. और झांकियों को समेटने की शुरूआत होने लगी. जहां से आख़िरी झांकी आगे बढ़ जाती लोग बैरिकैडिंग के भीतर आकर तेज़ बजते म्यूजिक की धुन में नाचने लगते. धीरे-धीरे कोलोन की सड़कें नाचते लोगों के झुंड से भर गई. खूबसूरत संगीत की आवाज़ें फिज़ाओं में तैर रही थी और सारा शहर इन आवाजों में बेसुध नाच रहा था. धीरे-धीरे शाम ढलती गई और छोटे-छोटे झुंड में लोग अपने घरों की ओर बढ़ने लगे. मैं भी जिंदगी के एकदम नए अनुभव बटोरे कोलोन बानहोफ़ की तरफ़ बढ़ने लगा. यहां फिर लोगों का फिर वही हुज़ूम था. लेकिन कुछ ही देर में मैं बॉन की तरफ बढ़ रही एक ट्रेन की किसी सीट में बैठा, बाहर दूर-दूर के घरों में दिख रही रोशनी की तरफ झांक रहा था. और पीट सीगर की आवाज़ मेरे ज़ेहन में बरक़रार थी.. ''..दिस लैंड इज योर लैंड, दिस लैंड इज माइ लैंड.''