कोरोना वैक्सीन ट्रायल से अच्छे संकेत

''यह बेहद उत्साहजनक बात है कि ये सारी ही वैक्सीनें लोगों में एंटीबॉडीज़ बनाती दिख रही हैं. यह साबित करता है कि विज्ञान तेज़ी के साथ आगे बढ़ रहा है और यह बेहद अच्छे संकेत हैं.''

कोरोना के प्रकोप से जूझ रही दुनिया की निगाहें उन प्रयोगों पर टिकी हैं जो COVID-19 Vaccine इजाद कर लेने की जद्दोजेहद में हैं. सोमवार को इन्हीं प्रयोगों में से तीन सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगों के ​Clinical Trials से जुड़े आंकड़ों को साझा किया गया. हालांकि अब भी स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि कोरोना का टीका कब तक बन पाएगा लेकिन इन ट्रायल्स ने क़ाफ़ी उम्मीद बढ़ाई है.


ब्रिटेन की ड्रगमेकर अस्ट्राज़ेनेका के सहयोग से Oxford University में जिस Vaccine का ​Clinical Trial किया गया है उसके परिणामों के मुताबिक, जिन पार्टिसिपेंट्स में इस वैक्सीन की दो डोज़ इस्तेमाल की गई उनमें बिना किसी गंभीर साइडइ​फ़ैक्ट के प्रभावी प्रतिरोधक क्षमता विकसित होते देखी गई है. इसे कोरोनावायरस का टीका बनने की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है.


वहीं दूसरी ओर चीन के मिलिट्री रिसर्च यूनिट और कैन सिनो बायोलॉजिक्स् की ओर से जिस Vaccine का Clinical Trial किया गया है, वह भी ठीक इसी तरह सुरक्षित पाई गई है और जिन 508 स्वस्थ वॉलेंटियर्स को इस वैक्सीन की एक डोज़ दी गई थी उनमें प्रतिरोधक क्षमता विकसित होते देखी गई है. इस अध्ययन के 77 प्रतिशल वॉलेंटियर्स में बुख़ार या इंजैक्शन वाली जगह में दर्द जैसे कुछ साइड इफ़ैक्ट्स ज़रूर देखे गए लेकिन यह गंभीर या चिंताजनक नहीं थे.

इन दोनों ही वैक्सीन्स में एक नुक़सान ना पहुंचाने वाले कोल्ड वायरस, एडेनोवायरस का इस्तेमाल किया गया है. दोनों ही वैक्सीन्स से जुड़े अध्ययनों को मेडिकल जर्नल दि लैंसेट में प्रकाशित किया गया है.


जॉन हॉपकिंसन ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ़ पब्लिक हैल्थ के दो वैक्सीन एक्सपर्ट नाऔर बार-ज़ीव और विलियम मौस ने दि लैंसेट में लिखे एक आलेख में इन दोनों ही वैक्सीन के बारे में लिखा है-

''कुल मिलाकर, इन दोनों ही परीक्षणों के परिणाम मोटेतौर एक से हैं और उम्मीद दर्शाते हैं.''

इसके अलावा जर्मन बायोटैक, बायो एन टैक और अमेरिकी ड्रगमेकर फ़िज़र इंक ने भी जर्मनी में एक छोटे स्तर पर किए गए, एक दूसरी तरह के अपने प्रयोग की जानकारी साझा की है. इस वैक्सीन में आरएनए का इस्तेमाल किया जाता है. यह वैक्सीन कोशिकाओं को प्रोटीन बनाने के निर्देश देती है जो कोरोनावायर के बाहरी सरफ़ेस की नक़ल करता है. इससे शरीर वायरस जैसे प्रोटीन्स को किसी बाहरी हमले की तरह पहचानने लगता है और इसी क्रम में असली वायरस के ख़िलाफ़ भी प्रतिरोध की क्षमता पैदा कर लेता है.


60 स्वस्थ वयस्कों पर किए गए इस अध्ययन के शुरूआती ​रूझानों में देखा गया है कि जिन लोगों को इस वैक्सीन की दो डोज़ दी गई उनमें वायरस को न्यूट्रलाइज़ करने वाली एंटीबॉडीज़ पैदा होने लगी. इसी तरह आरएनए के इस्तेमाल वाली वैक्सीन का का एक क्लीनिकल ट्रायल मोडर्ना इंक ने भी किया है.


WHO के पूर्व ADG मैरी-पाउले कीनी ने इन परिणामों पर ​प्रतिक्रिया देते हुए कहा है,

''यह बेहद उत्साहजनक बात है कि ये सारी ही वैक्सीनें लोगों में एंटीबॉडीज़ बनाती दिख रही हैं. यह साबित करता है कि विज्ञान तेज़ी के साथ आगे बढ़ रहा है और यह बेहद अच्छे संकेत हैं.''

हालांकि अब भी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इन सकारात्मक संकेतों के बाद भी, क्या इनमें से कोई भी वैक्सीन कोरोनावायरस से निपटने में पूरी तरह कारगर हो पाएगी. इसके लिए अभी और विस्तृत अध्ययन की ज़रूरत होगी. लेकिन इन सकारात्मक संकेतों ने उम्मीद क़ाफ़ी बढ़ा दी है.

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