नेहरू की ज़ुबानी उस इमारत की कहानी, जिसे फिर मस्ज़िद बना दिया गया है

तुर्की के राष्ट्रपति रेसप तैयप अर्दोगान ने इंस्तानबुल की तक़रीबन 1500 साल पुरानी मशहूर इमारत हागिया सोफ़िया को फिर से मस्ज़िद में बदलने की घोषणा की है. इस्लाम के वजूद में आने से भी पहले की यह इमारत इतिहास में कई अनुभवों से गुजरी है. यह ग्रीक इ​मारत, चर्च भी रही और मस्ज़िद भी. इसी क्रम में विवादित भी. लेकिन पहले विश्व युद्ध में तुर्की की हार के बाद जब आधुनिक तुर्की के निर्माता माने जाने वाले मुस्तफ़ा कमाल पाशा ने तुर्की की कमान सम्हाली तो उन्होंने 1934 में इस विवादित इमारत को मस्ज़िद से बदल कर एक म्यूज़ियम बनाने का फ़ैसला लिया. इस मशहूर ​इमारत की कहानी और उसके इर्द गिर्द धर्मों और राजनीति की पड़ताल करते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री और लेखक जवाहरलाल नेहरू ने एक बहुत महत्वपूर्ण आलेख लिखा था. खिड़की में इस आलेख को इस इमारत के इतिहास और उसके इर्द गिर्द की राज​नीति को समझने के लिए साझा किया जा रहा है —

- संपादक

Hagia Sophia
दो ​मस्ज़िदें

- जवाहरलाल नेहरू


आजकल अख़बारों में लाहौर की शहीदगंज मस्ज़िद की प्रतिदिन कुछ न कुछ चर्चा होती है. शहर में क़ाफ़ी ख़लबली मची हुई है. दोनों तरफ़ मज़हबी जोश दिखता है. एक दूसरे पर हमले होते हैं, एक दूसरे की बदनीयती की शिकायतें होती हैं और बीच में एक पंच की तरह अंग्रेज़ हुकूमत अपनी ताक़त दिखलाती है. मुझे न तो बाक़यात ही ठीक ठीक मालूम है कि किसने पहले यह सिलसिला छेड़ा था, या किसकी ग़लती थी, और न इसकी जांच करने की ही मेरी कोई इच्छा है. इस तरह के धार्मिक उन्माद में मुझे बहुत दिलचस्पी भी नहीं है. लेकिन दिलचस्पी हो या ना हो वह दुर्भाग्य से पैदा हो जाए, तो उसका सामना करना ही पड़ता है. मैं सोचता था कि हम लोग इस देश में कितने पिछड़े हुए हैं कि अदना-अदना सी बातों पर जान देने को उतारू हो जाते हैं, पर अपनी ग़ुलामी और फ़ाक़ेमस्ती सहने को तैयार रहते हैं.


इस मस्ज़िद से मेरा ध्यान भटककर एक दूसरी मस्ज़िद की तरफ़ जा पहुंचा. वह एक बहुत प्रसिद्ध ऐतिहासिक मस्ज़िद है और क़रीब चौदह सौ सालों से उसकी तरफ़ लाखों करोड़ों निगाहें देखती आई हैं. वह इस्लाम से भी पुरानी है और उसने अपनी इस लंबी ज़िंदगी में न जाने कितनी बातें देखीं. उसके सामने बड़े—बड़े साम्राज्य गिरे, पुरानी सल्तनतों का नाश हुआ धार्मिक परिवर्तन हुए. ख़ामोशी से उसने यह सब देखा और हर क्रांति और तबादले पर उसने अपनी भी पोशाक बदली. चौदह सौ वर्ष के तूफ़ानों को इस आलीशान इमारत ने बर्दाश्त किया. बारिश ने उसको धोया, हवा ने अपने बाजुओं से उसको रगड़ा. मिट्टी ने उसके बाज हिस्सों को ढका. बुज़ुर्गी और शान उसके एक—एक पत्थर से टपकती है. मालूम होता है, उसकी रग—रग और रेशे—रेशे में दुनिया भर का तजुरबा इस डेढ़ हज़ार वर्ष ने भर दिया है. इतने लंबे ज़माने तक प्रकृति के खेलों और तूफ़ानों को बर्दाश्त करना कठिन था, लेकिन उससे भी अधिक कठिन था मनुष्यों की हिमाक़तों और वहशतों को सहना. पर उसने यह सहा. उसके पत्थरों की ख़ामोश निगाहों के सामने साम्राज्य खड़े हुए और गिरे, मजहब उठे और बैठे, बड़े से बड़े बादशाह, ख़ूबसूरत औरतें, लायक से लायक आदमी चमके और फिर अपना रास्ता नापकर ग़ायब हो गए. हर तरह की वीरता उन पत्थरों ने देखी और देखी हर प्रकार की नीचता और क़मीनापन. बड़े और छोटे, अच्छे और बुरे सब आए और चल बसे, लेकिन वे पत्थर अभी क़ायम हैं. क्या सोचते होंगे वे पत्थर, जब वे आज भी अपनी ऊँचाई से मनुष्यों की भीड़ों को देखते होंगे — उनके बच्चों का खेल, उनके बड़ों की लड़ाई, फ़रेब और बेवकूफ़ी? हज़ारों वर्षों में इन्होंने कितना कम सीखा! कितने दिन और लगेंगे कि इनको अक़्ल और समझ आए?


समुद्र की एक पतली सी बांह एशिया और यूरोप को वहां अलग करती है. एक चौड़ी नदी की भांति बासफ़ोरस बहता है और दो दुनियाओं को ​ज़ुदा करता है. उसके यूरोपियन किनारे की छोटी छोटी पहाड़ियों पर बाइजेंटियम की पुरानी बस्ती थी. बहुत दिनों से वह रोमन साम्राज्य में थी,​ जिसकी पूर्वी सरहद ईसा की शुरू की शताब्दियों में ईराक तक थी, लेकिन पूरब की ओर से इस साम्राज्य पर अक्सर हमले होते थे. राम की शुक्ति कुछ कम हो रही थी, और वह अपनी दूर-दूर की सरहदों की ठीक तरह रक्षा नहीं कर सकता था. कभी पश्चिम और उत्तर में जर्मन वहशी- जैसा कि रोमन लोग उन्हें कहते थे- चढ़ जाते थे और उनका हटाना मुश्किल हो जाता तो कभी पूरब में ईराक़ की तरफ़ से या अरब से एशियाई लोग हमले करते और रोमन फ़ौजों को हरा देते थे.


रोम के सम्राट कांस्टेंटाइन ने यह फ़ैसला किया कि अपनी राजधानी पूरब की ओर ले जाए, ताकि वह पूर्वी हमलों से साम्राज्य की रक्षा कर सके. उसने बासफोरस के सुंदर तट को चुना और बाइजेंटियम की छोटी पहाड़ियों पर एक विशाल नगर की स्थापना की. ईसा की चौथी सदी ख़त्म होने वाली थी, जब कांस्टेटिनोपल (उर्फ़ कुस्तुंतुनिया) का जन्म हुआ.


इस नवीन व्यवस्था से रोमन साम्राज्य पूरब में जाकर मजबूत हो गया,