कैसे बदला चीन? Ep-3 : 'सोवियत बनाम चीन'

चीन के 'महाशक्ति चीन' बनने की रोचक कहानी पर खिड़की की ख़ास सीरीज़, 'कैसे बदला चीन' का तीसरा एपीसोड - 'सोवियत बनाम चीन'

- सत्येंद्र रंजन


पूर्व सोवियत संघ और चीन की कम्युनिस्ट पार्टियों में 1960 के दशक में हुआ अलगाव विश्व साम्यवादी आंदोलन के लिए ऐसा झटका साबित हुआ, जिससे वह कभी उबर नहीं पाया। उसके साथ ही दुनिया भर की कम्युनिस्ट पार्टियां विभाजन का शिकार होने लगीं. मसलन, भारत में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बंटवारे की पृष्ठभूमि में भी यही घटनाक्रम था, जिसके परिणास्वरूप पहले भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और बाद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) आस्तित्व में आईं.


चीन और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टियों के अलगाव का एक नतीजा यह भी हुआ कि जो देश अपने को कम्युनिस्ट कहते थे, उनके बीच खेमेबंदी हो गई. हालात यहां तक पहुंचे कि 1970 का दशक आते-आते चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ को सामाजिक साम्राज्यवादी घोषित करते हुए उसे दुनिया के लिए मुख्य ख़तरा बता दिया. उसी राजनीतिक लाइन के कारण अमेरिका के साथ चीन के संबंध बेहतर होते गए. वैश्विक शक्ति संतुलन के उस विभाजन के बीच सोवियत संघ को और भी ज्यादा संसाधन हथियारों की होड़ में झोंकने पड़े. उसी दौर में उसने अफगानिस्तान में फौज भेजने जैसे दुस्साहसी कदम उठाए. इन सबकी भी सोवियत संघ के विखंडन में भूमिका रही।


लेकिन मूल प्रश्न यह है कि आखिर वो अलगाव क्यों हुआ? इस बारे में दुनिया भर के कम्युनिस्ट विचारकों की अपने-अपने रूझान के मुताबिक समझ रही है. बहरहाल, अगर हम एक दूरी से वापस उस दौर के घटनाक्रम पर नजर डालें, तो जो ‘ग्रेट डिबेट’ छिड़ी उसकी जड़ें शास्त्रीय मार्क्सवाद (classical Marxism) के भीतर तलाश सकते हैँ. इसलिए यहां सोवियत संघ के अस्तित्व में आने के बाद वहां घटनाएं जिस ढंग से आगे बढ़ीं, उन पर भी एक निगाह डालना वाजिब होगा.


रूस में 1917 में हुई बोल्शेविक क्रांति का फ़ौरी एजेंडा शांति, रोटी और ज़मीन थे. लगातार युद्धों में उलझे देश में शांति, गरीबों के लिए रोटी और सामंती व्यवस्था में जी रहे किसानों के लिए ज़मीन का आकर्षण सहज समझा जा सकता है. जाहिर है, तब घोषित उद्देश्य समाजवाद की स्थापना नहीं था. बोल्शेविक क्रांति के बाद व्लादीमीर लेनिन ने जो ‘नई आर्थिक नीति’ घोषित की थी, वह घोषित एजेंडे के मुताबिक ही तैयार की गई थी. उसके तहत सामंतों की ज़मीन का किसानों में बंटवारा भी किया गया था. लेकिन बाद में सोवियत संघ ने विकास की जो दिशा पकड़ी, उसमें बात बदल गई.


शास्त्रीय मार्क्सवाद की समझ यह है कि समाजवादी क्रांति उस समाज में ही हो सकती है, जहां उत्पादक शक्तियां उन्नत हो गई हों. इसका व्यावहारिक अर्थ है कि ऐसा उसी समाज में हो सकता है, जो सामंतवाद से निकल कर औद्योगिक पूंजीवाद में पहुंच गया हो और जहां अब मुख्य वर्गीय अंतर्विरोध औद्योगिक पूंजी और श्रम के बीच हो. जब रूस में बोल्शेविक क्रांति हुई, तब वह मोटे तौर पर सामंतवादी देश था. पूंजीवाद का उदय अभी प्रारंभिक अवस्था में था. लेकिन सीपीएसयू (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ सोवियत यूनियन) ने नए बनने वाले देश का नाम यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक रखा. जब एक बार क्रांति के बाद बनी व्यवस्था स्थिर हो गई, तो औद्योगिक व्यवस्था के विकास की मुहिम छेड़ दी गई. ऐसी किसी व्यवस्था के लिए अतिरिक्त पूंजी और श्रम की ज़रूरत होती है. एक देश जो साम्राज्यवाद या उपनिवेशवाद के रास्ते पर ना चल रहा हो, उसे ऐसा अतिरिक्त मूल्य देश के अंदर ही जुटाना पड़ता है. सोवियत संघ में कृषि और किसानों से इसे हासिल करने की कोशिश की गई. इस क्रम में किसानों के विरोध का सामना नवोदित व्यवस्था को करना पड़ा. पश्चिमी मीडिया में जिसे सोवियत संघ में दमन की कहानी बताया जाता है, असल में वह इसी नई सोच और विकास नीति से उपजे सामाजिक अंतर्विरोधों परिणाम थी.


चीन में जब सुन यात सेन की मृत्यु के बाद च्यांग काई शेक ने कुओ मिन-तांग सरकार की बागडोर संभाली, तब तक श्रमिक वर्ग में सीपीसी की लोकप्रियता बढ़ने लगी थी. वैसे ही तब सोवियत संघ के उदय के साथ सारी दुनिया में कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति अद्भुत जन आकर्षण देखा जा रहा था. इससे भयभीत कुओ मिन-तांग शासन ने अपने अब तक के सहयोगी कम्युनिस्टों पर हमला बोल दिया. इसमें सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गंवाने के बाद सीपीसी को दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में पनाह लेकर वहां से नई शुरुआत करने के लिए मज़बूर होना पड़ा. उसी दौर में माओ का नेतृत्व पार्टी पर स्थापित हुआ. ग्रामीण इलाकों में आधार क्षेत्र बनने के कारण माओ और सीपीसी को चीन की व्यवस्था के मूलभूत स्वरूप को बेहतर ढंग से समझने का मौका मिला. सीपीसी इस निष्कर्ष पर पहुंची कि चीन एक सामंती व्यवस्था है, जो उपनिवेशवाद के प्रभाव में है. इसलिए सीपीसी ने चीन को ‘अर्ध सामंती-अर्ध औपनिवेशिक’ देश माना. माओ का निष्कर्ष था कि ऐसी व्यवस्था में औद्योगिक श्रमिकों को आधार बना कर सीपीसी कहीं आगे नहीं बढ़ सकती. उनकी समझ बनी कि चीन के कम्युनिस्ट आंदोलन में किसानों की ख़ास भूमिका होगी.


उस दौर में दुनिया में जहां भी कम्युनिस्ट आंदोलन था, उसका वैचारिक केंद्र सोवियत संघ होता था. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने भी शुरुआत में सोवियत नेतृत्व से सलाह और सीख ली. लेकिन अपने समाज की वस्तुगत परिस्थितियों को देखते हुए माओ ने संघर्ष का अलग रास्ता चुनने का फैसला किया. बताया जाता है कि ये बात सोवियत नेतृत्व को रास नहीं आई. हालांकि जब तक बात सिर्फ संघर्ष की थी और क्रांति बहुत दूर थी, तो ये मसला महत्त्वपूर्ण नहीं बना. सीपीएसयू अपना समर्थन सीपीसी को देती रही.


सीपीसी की जो अपनी समझ बनी थी, वह 1949 में चीनी क्रांति के बाद ज्यादा प्रखर ढंग से साफ हुई। ग़ौरतलब है कि सीपीसी ने क्रांति के बाद एक अक्टूबर 1949 को चीन को जो नाम दिया, उसमें समाजवादी शब्द नहीं था. सीपीसी ने नए चीन को पीपुल्स रिपब्लिक कहा. सीपीसी ने चीनी क्रांति को समाजवादी क्रांति भी नहीं बताया. बल्कि उसे नव-जनवादी क्रांति कहा गया. इस समझ के साथ नई व्यवस्था बनाने की जो कोशिश शुरू हुई, उसमें कृषि और किसानों को ख़ास अहमियत देते हुए ग्रामीण व्यवस्था में बदलाव की योजनाएं लागू की गईं. ये सारे वो पहलू थे, जिनकी वजह से सीपीसी के सत्ता में आने के बाद सीपीएसयू के साथ उसके वैचारिक मतभेद तेज़ी से उभरने लगे. फिर भी जब तक स्टालिन सत्ता में रहे, ये एक हद के भीतर ही रहे. स्टालिन के नेतृत्व में जिस तरह सोवियत संघ का तीव्र गति से विकास हुआ और समाजवादी सपने के साकार होने की सूरत उभरी, उससे स्टालिन की कम्युनिस्ट आंदोलन में ऊंची शख्सियत बन गई थी. माओ उनका आदर करते थे.


लेकिन 1953 में स्टालिन की मृत्यु के बाद दोनों देशों के कम्युनिस्ट पार्टियों में संबंध बिगड़ने लगे ख़ासकर निकिता ख्रुश्चेव के जमाने में जिस तरह स्टालिन की आलोचना की गई और उनके प्रभाव को सोवियत संघ में ख़त्म करने की कोशिशें शुरू हुईं, उससे सीपीएसयू और सीपीसी के संबंध औपचारिक रूप से बिगड़ने की शुरुआत हो गई. ख्रुश्चेव के दौर में जब सीपीएसयू ने पूंजीवादी व्यवस्थाओं के साथ सह-अस्तित्व का सिद्धांत अपनाया, तो दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच मतभेद और तीखे हो गए. उसी दौर में सीपीसी और सीपीएसयू के बीच पत्रों के आदान-प्रदान के जरिए वो सैद्धांतिक बहस खड़ी हुई, जिसे दुनिया में ग्रेट डिबेट यानी महान बहस के रूप में जाना गया. कई वर्षों तक चली ये बहस किसी सहमति तक नहीं पहुंच सकी। सीपीएसयू के व्यवस्थाओं के शांतिपूर्ण संक्रमण और पूंजीवाद के साथ सह-अस्तित्व के सिद्धांत को सीपीसी ने कभी स्वीकार नहीं किया। हालांकि ये विडंबना ही है कि जिन माओ ने पूंजीवाद के सह-अस्तित्व की बात को उस समय ‘संशोधनवाद’ करार दिया, उनके नेतृत्व में ही चीन ने 1972 में अमेरिका के साथ दोस्ताना संबंध बना लिए।


इसके पहले 1956 में जब हंगरी के कम्युनिस्ट नेतृत्व ने अपनी स्वतंत्र राह चुनने की कोशिश की, तो सोवियत संघ ने वहां अपनी फौज भेज दी। कहा जाता है कि सीपीसी ने उसे सही कदम नहीं माना। आपसी संवाद में उसने इसकी आलोचना की। 1958 में जब चीन ने ग्रेट लीप फॉरवर्ड की नीति अपनाने का एलान किया, तो सीपीएसयू ने उसे पसंद नहीं किया। इस बीच चीन ने परमाणु हथियार बनाने के प्रयास तेज कर दिए थे। बताया जाता है कि ख्रुश्चेव को ये बात पसंद नहीं आई। वे चाहते थे कि ये हथियार कम्युनिस्ट दुनिया में सिर्फ सोवियत संघ के पास रहें। इन सब मसलों से तनाव और बढ़ा। धीरे-धीरे यह अंतरराष्ट्रीय मामलों में दोनों देशों के रुख में झलकने लगा। 1959 में जब तिब्बत में सरकार विरोधी आंदोलन हुए, तो सोवियत संघ ने वहां के लोगों के आंदोलन करने के अधिकार का समर्थन किया। 1960 में रोमानिया की कम्युनिस्ट पार्टी के महाधिवेशन के दौरान सोवियत और चीनी प्रतिनिधिमंडलों के बीच खुल कर नोंक-झोंक हुई। 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय सोवियत संघ ने चीन को भाई लेकिन भारत को दोस्त बता कर किसी का साफ पक्ष लेने से इनकार कर दिया। बताया जाता है कि यह दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों में पहले से बिगड़ते संबंध की ताबूत में आखिर कील साबित हुआ।


साल 1964 में जब ख्रुश्चेव को सत्ता में हटा कर लियोनिद ब्रेझनेव सीपीएसयू के महासचिव बने, तो उसके बाद पूरी तरह संबंध विच्छेद हो गया। ये तथ्य इतिहास में दर्ज है कि उसके साथ ही जो रूसी इंजीनियर और तकनीशियन चीन के औद्योगिक निर्माण के लिए वहां आकर काम कर रहे थे, सीपीएसयू ने उन्हें अचानक वापस बुला लिया। इससे चीन की कई परियोजनाएं अधर में लटक गईं।


वैसे सतही विश्लेषणों में इस टूट का कारण दोनों देशों के नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं को भी बताया जाता है। कहा जाता है कि माओ को स्टालिन की वरिष्ठता स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन ख्रुश्चेव और बाद में ब्रेझनेव को वे कम्युनिस्ट दुनिया का नेता मानने को तैयार नहीं थे। वे खुद को अधिक वरिष्ठ समझते थे। लेकिन ऐसी बातों का कोई ठोस प्रमाण नहीं होता। वैसे भी कम्युनिस्ट नेताओं के बारे में गैर-कम्युनिस्ट देशों के मीडिया में गपशप, सुनी-सुनाई और कई बार गढ़ी हुई बातों की भरमार होती है। इसलिए ऐसे सतही विश्लेषणों को कभी गंभीर चर्चा का हिस