ऑस्ट्रेलिया ने कैसे सम्हाला कोरोना प्रकोप?

जीने के अपने उन्मुक्त अंदाज पर ऑस्ट्रेलिया के लोगों ने जिस तरह एकदम नियंत्रण किया, वह देखने लायक था. यह कितना मुश्किल हो सकता था, इसका अंदाज़ा मार्च के दूसरे हफ्ते में लॉकडाउन लागू होने के बाद के पहले वीकेंड पर हुआ था. जब मशहूर बोन्डाई बीच पर हज़ारों की भीड़ पहुंच गई थी. खिली धूप में समुद्र की ठंडी रेत पर लेटने की चाह को ये युवा दबा नहीं पाए और नतीजा यह हुआ ...

- अनीता, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया


पहली फरवरी को ऑस्ट्रेलिया ने चीन से किसी के भी आने जाने पर रोक लगा दी थी. इसके एक हफ्ता पहले ही ऑस्ट्रेलिया में करोनावायरस का पहला मामला मिला था. उसके बाद से देश में संक्रमण के मामले लगातार बढ़ते रहे और यह सवाल भी सरकार से पूछा जाता रहा कि संक्रमण मिलने के बाद भी एक हफ्ते की देरी क्यों की.

अगर ऑस्ट्रेलिया में करोनावायरस ने तबाही मचाई होती तो यह सवाल सरकार के राजनीतिक पतन का कारण हो सकता था. लेकिन चार महीने बाद सात हजार से कम मामलों और 102 मौतों के बाद अब जबकि ऑस्ट्रेलिया लॉकडाउन खोलने की प्रक्रियामें है तो सवाल यह पूछा जा रहा है कि करोनावायरस के खिलाफ लड़ाई में जीत का राज़ क्या है.


ऑस्ट्रेलिया की कोविड-19 के ख़िलाफ़ लड़ाई आक्रामक और रणनीतिक रही जिसे कई स्तरों पर लड़ा गया. केंद्र और राज्य सरकारों के कड़े और वक्ती फैसले, स्वास्थ्य सेवाओं की त्वरित और समुचित उपलब्धता. और ज़रूरी इन्फ्रास्ट्रक्‌चर का पहले से मौजूद होना तो बेशक इस लड़ाई में अहम साबित हुआ लेकिन एक बात जिसकी हर ओर तारीफ है, वह था आम लोगों का अनुशासन.



जीने के अपने उन्मुक्त अंदाज पर ऑस्ट्रेलिया के लोगों ने जिस तरह एकदम नियंत्रण किया, वह देखने लायक था. यह कितना मुश्किल हो सकता था, इसका अंदाज़ा मार्च के दूसरे हफ्ते में लॉकडाउन लागू होने के बाद के पहले वीकेंड पर हुआ था. जब मशहूर बोन्डाई बीच पर हज़ारों की भीड़ पहुंच गई थी. खिली धूप में समुद्र की ठंडी रेत पर लेटने की चाह को ये युवा दबा नहीं पाए और नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने इन लोगों को ज़बरन वहां से भगाया.


चार महीने में अनुशासनहीनता का यह पहला और आख़िरी मामला था. और सरकार ने ही नहीं, लोगों ने भी इस घटना की ऐसी लानत-मलामत की कि अब बीच खुलने के बाद भी लोग वहां भीड़ नहीं लगा रहे हैं.



लोगों का एक दूसरे के घर आना जाना भी बंद था. हर वीकेंड पर पार्टी करने वाले ऑस्ट्रेलियाइयों के लिए यह कोई आसान काम नहीं था. लेकिन जान से बढ़कर कुछ नहीं, सेहत से बढ़कर कुछ नहीं, अपनी ही नहीं, दूसरों की भी जान बचानी है जैसे नारे घर-घर में और बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर थे. पूरा देश असल में चिंतित था. बाज़ार खुले थे लेकिन ग्राहक बाज़ार नहीं जा रहे थे. सिर्फ़ ज़रूरी सामान ख़रीदे जा रहे थे. ज्यादातर लोग घर से काम कर रहे थे. इसमें दफ़्तर कर्मचारियों की हरसंभव मदद कर रहे थे. सरकार हर संभव मदद कर रही थी.


ऐसा माहौल था मानो राष्ट्रीय संकट के समय सबने एक दूसरे का हाथ थाम लिया है. जिन लोगों की नौकरियां चली गई थीं, उनकी मदद के लिए लोग ही आगे आ रहे थे. रेस्तरां खाना मुफ्त दे रहे थे तो मकान मालिकों ने किराये माफ़ कर दिए थे. दुकानदार घर का सामान बांट रहे थे तो सरकारों ने भी कई राहत पैकेज जारी कर दिए.


चीन ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और वहां से आने-जाने पर पूरी तरह पाबंदी ने देश की अर्थव्यस्था को गंभीर आघात पहुंचाया है. इसके अलावा लॉकडाउन के कारण काम-धंधे बंद रहे और बेरोज़गारी अपने चरम पर पहुंच गई. यह क़ीमत लोगों की जानें बचाने के लिए चुकाई गई है और देश में एक बार भी इस बारे में बहस नहीं हुई यह कीमत, लोगों की जान से बढ़कर है या नहीं.


हालांकि सरकार ने आर्थिक मदद और राहत पैकेजों के ज़रिए अर्थव्यवस्था को ज़िंदा रखन की कोशिश की. और यह कोशिश जारी है. लेकिन करोनावायरस ऑस्ट्रेलियो को जिस तरह जोड़कर गया है, उसे आने वाली नस्लें भी याद रखने वाली हैं.

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