'इटली और स्पेन जैसी कोरोना की तबाही से कैसे बच गया जर्मनी?'

क्वांटम कैमेस्ट्री में डॉक्टरेट जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने संकट का सामना शांत रहकर और बग़ैर घबराए किया है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और विदित एवं असहज करने वाले तथ्यों को ईमानदारी से कहने के चलते उन्हें ना सिर्फ़ जर्मनी में बल्कि दुनिया भर में सराहा गया।

- गुत्ता मुरली खिड़की के लिए

बॉन, जर्मनी से

कोरोना महामारी मानवता के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती बनकर आई है। जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल ने तो यहां तक कह दिया कि यह महामारी दूसरे विश्व युद्ध के बाद जर्मनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

उन्होंने अपने बयान में कहा था,

''मुझे पूरा यक़ीन है कि जो चुनौती हमारे सामने आ खड़ी हुई है इससे हम पार पा लेंगे. इसलिए इस देश के सभी नागरिकों को यह समझने की ज़रूरत है कि यह चुनौती उनके सामने है। इसलिए मुझे यह कहना ही होगा कि हालात वाकई बहुत गंभीर हैं. इन्हें गंभीरता से लीजिए. जर्मनी के एकीकरण के बाद से.. नहीं बल्कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ऐसा कोई मौका अब तक नहीं आया है जिसमें इस स्तर पर सार्व​जनिक और साझे तौर पर सहयोग और काम करने की ज़रूरत पड़ी हो.''

उनकी इस बात से जर्मनी में रह रहे मुझ जैसे भारतीयों समेत कई लोगों को अचरज हुआ। लेकिन उनके जैसे क़द की नेता का आंकलन ग़लत नहीं हो सकता था। आख़िर वे हेल्मुल्ट कोह्ल के बाद जर्मनी की सबसे लंबे समय तक शासक रही हैं।

यूरोप में कोरोना

यूरोप में कोरोनावायरस का पहला मामला फ्रांस में मिला था जब दो लोगों के इस वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हुई थी। ये दोनों ही संक्रमित मरीज़ चीन से आए थे जहां से यह संक्रमण फैलना शुरू हुआ था। इटली और स्पेन इस वायरस से सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए। जैसे-जैसे अस्पतालों में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज़ों की संख्या बढ़ने लगी, वैसे-वैसे डॉक्टरों को कड़े निर्णय लेकर यह तय करना पड़ा कि वे पहले किस मरीज़ का इलाज करेंगे। इस तरह 80 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों के बजाय युवा और कम उम्र के मरीज़ों को तरजीह दी गई। बहुत से मरीज़ों ने इसे 'पश्चिम की सुनामी' कहा। जिस अवधि में संक्रमण की दर सबसे ज्यादा थी, उस अवधि में संक्रमण से होने वाली मौतों और शवों को जलाने में मदद करने के लिए सेना को तैनात करना पड़ा।

जर्मनी में कोरोना

जर्मनी में कोरोना का पहला मामला औद्योगिक राज्य बवेरिया में 27 जनवरी, 2020 को सामने आया। जल्द ही जर्मनी कुल संक्रमण के मामले में दुनिया का चौथा और यूरोप का तीसरा सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला देश बन गया। हालांकि बहुत से विशेषज्ञों को इस बात पर अचरज हुआ कि यहां कोरोना वायरस के संक्रमण से होने वाली मृत्यु की दर तुलनात्मक रूप से कम यानी 1.3 फीसदी रही और इस मामले में यह दुनिया भर में 8 वें और यूरोप में 5 वें स्थान पर था। हालांकि इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं कि इस निचली मृत्यु दर के पीछे क्या कारण रहा, लेकिन जर्मन अधिकारी जल्द ही इस बात का श्रेय सरकार को देते नज़र आए। उन्होंने कहा कि ऐसा राज्य प्रशासनों द्वारा बचाव के लिए किए गए त्वरित उपायों के चलते हुआ। पाबंदी लगाने के तीन हफ़्तों के भीतर ही संक्रमण-दर का ग्राफ़ और नीचे आने लगा। लेकिन अन्य पड़ोसी देशों की तरह जर्मनी ने नागरिकों की आवाजाही पर इतने कड़े प्रतिबंध नहीं लगाए। इतना ही नहीं, जर्मनी ने बाक़ी यूरोपीय देशों की ओर मदद का हाथ भी बढ़ाया और कुछ देशों के मरीज़ों को हवाई मार्ग से लाकर बॉन और डसेलडॉर्फ जैसे शहरों में उनका इलाज़ कराया।

पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी का फ़र्क़

यूं तो पुराने पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी में सांस्कृतिक और आर्थिक नज़रिए से कई अंतर हैं लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा था कि संक्रमण दर के मामले में भी यह अंतर दिखाई पड़ेगा। अपेक्षाकृत पिछड़े माने जाने वाले पूर्वी राज्यों की तुलना में अधिक औद्योगीकृत पश्चिमी राज्यों में संक्रमण की दर ज्यादा रही। हो सकता है कि इसके पीछे औद्योगिक राज्य होने के चलते पश्चिमी जर्मनी में हुई अधिक आवाजाही ज़िम्मेदार हो।

एक वैज्ञानिक समझ के हाथों में बाग़डोर

कुछ लोगों का मानना है कि महिला शासकों ने इस संकट का मुक़ाबला पुरुष शासकों की तुलना में ज़्यादा प्रभावी ढंग से किया है। अतीत के अनुभव भी बताते हैं कि लगभग एक दशक पहले मानवता को संकट में डालने वाले SARS-COV2 वायरस का मुक़ाबला महिला शासकों ने ज़्यादा प्रभावी ढंग से किया था। यह भी ग़ौरतलब है कि जर्मनी के राज्य वित्त मन्त्री थॉमस शेफर ने बीती 28 मार्च को आत्महत्या कर ली थी। ख़बरों के मुताबिक, उन्होंने कोरोना के चलते अपने राज्य की गिरती आर्थिक स्थिति और महामारी को ना संभाल पाने के चलते आत्महत्या की। इसके उलट क्वांटम कैमेस्ट्री में डॉक्टरेट जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने संकट का सामना शांत रहकर और बग़ैर घबराए किया है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और विदित एवं असहज करने वाले तथ्यों को ईमानदारी से कहने के चलते उन्हें ना सिर्फ़ जर्मनी में बल्कि दुनिया भर में सराहा गया। मर्कल ने देश को संबोधित अपील करती रहीं,

''हमने इस बात पर चर्चा की है कि सारे प्रयास कैसे चल रहे हैं. ना ही हमारे पास इस बीमारी की कोई वैक्सीन है और ना ही कोई दवा है. हमारे पास सिर्फ़ हमारी स्वास्थ सेवाएं हैं जिन्हें मज़बूती देनी है ख़ासतौर पर हमारे हॉस्पिटल्स जो कि इस संक्रमण के भयावह होने को रोक सकते हैं. इसके अलावा जो दूसरी चीज़ हमारे पास है वह है हमारी अपनी ख़ुद की आदतें. अभी सबसे कारगर जो तरीक़ा है वह अपनी आदतों में एहतियात बरतने का है. यही सबसे अधिक प्रभावी है.''

मर्कल की इस तरह की अपीलों को जर्मनी के लोगों ने काफी गंभीरता से लिया. राज्य के प्रमुख के बजाय एक वैज्ञानिक प्रमुख की तरह कार्य करते हुए उन्होंने विशेषज्ञों से लगातार विचार-विमर्श कर तार्किक निर्णय लिए। दिसंबर 2021 में वह कोह्ल को पीछे छोड़कर चांसलर के रूप में जर्मनी पर सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली महिला बन जाएंगी। हालांकि ऐसा होने नहीं जा रहा क्योंकि वे कह चुकी हैं कि वे अगले कार्यकाल के लिए उम्मीदवारों की दौड़ में शामिल नहीं हैं।