आज फ़ैज़ जेएनयू आएं तो कौन सी नज़म पढ़ेंगे?

ज़रा कल्पना कीजिए कि आज फ़ैज़ साहब 1978 की तरह हिंदुस्तान दौरे पर हों. जेएनयू में शायरी पढ़ें. वैसे ही जैसे उन्होंने उस साल के किसी एक दिन पढ़ी थी. अपना भारी भरकम डील डौल लिए, सफ़ारी सूट पहने, अपने मद्धम लहज़े में वो आज आपसे मुख़ातिब हों, तो वो कौन सी नज़्म दोहराएंगे? यक़ीनन वो होगी, 'हम देखेंगे! लाजिम है, कि हम भी देखेंगे!’

- अल्प्यू सिंह



वो सेना में कैप्टन थे. वो अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर थे. वो अरबी, फ़ारसी, पंजाबी, ऊर्दू जानते थे. उन्हें तो फांसी पर चढ़ाया जाना था. उन्होंने जेल को भी अपनी हसीं कल्पना से ख़ूबसूरत बना दिया था. उन्हें वतन निकाला मिला था. वो इंकलाब और मुहब्बत दोनों का राग एक सुर में गाते थे.


वो शायर थे. यक़ीनन वो फ़ैज़ ही थे. एक ज़िंदगी जो कविता की तरह पढ़ी गई. एक कविता जो ज़िंदगी की तरह जी गई.


अब ज़रा कल्पना कीजिए कि आज फ़ैज़ साहब 1978 की तरह हिंदुस्तान दौरे पर हों, जेएनयू में शायरी पढ़ें, ऐसे ही जैसे उन्होंने उस साल के किसी एक दिन पढ़ी थी. अपना भारी भरकम डील डौल लिए सफ़ारी सूट पहने अपने मद्धम लहज़े में वो आज आपसे मुख़ातिब हों, तो वो कौन सी नज़्म दोहराएंगे? यक़ीनन वो होगी, 'हम देखेंगे! लाजिम है, कि हम भी देखेंगे!’


क्योंकि जिस दुनिया की कल्पना उन्होंने की थी वो अभी बहुत दूर है, इसलिए आज भी ग़र ग़ालिब की ही तरह फ़ैज़ भी ज्यादा सुने, सुनाये और गुनगुनाए जाते हैं, तो वजह साफ़ है, इनकी रचनाओं में इंसान की बुनियादी हालातों पर पकड़. इसलिए इनके लफ़्ज़ों की मार जब तब वक़्त के गाल पर झन्नाटे से पड़ती ही रहती है.


70 के दशक में दक्षिण एशिया की तरुणाई जब दुनिया को बदलते देख रही थी, उस वक़्त शीत युद्ध की धुंध में जो आवाज़ें साफ़ दिखाई और सुनाई पड़ती थीं, वो बर्तोल्त ब्रेख्त, नाज़िम हिक़मत और फ़ैज़ की आवाज़ें थीं. फ़ैज़ की शायरी की गूंज तो आज और साफ़ हो गई है.


90 के बाद आर्थिक साम्राज्यवाद की जकड़न उसी दौर के हालात की आज भी याद दिलाती है, जब भंसाली जैसे फ़िल्म कलाकार की अभिव्यक्ति पर थप्पड़ की गूंज भारी पड़ती है. जब गुलज़ार सरीख़े कलाकारों को कहना पड़ता है कि हालात ठीक नहीं हैं. जब बोलने, कहने, गाने से पहले सोचना पड़े और डरना भी. तो... फ़ैज़ के लिखे ये शब्द, ज़हनी काग़ज़ पर और उभर के आते हैं.


बोल के लब आजा़द हैं तेरे! बोल... जबां अब तक तेरी है!

ख़ुद फ़ैज़ की ज़ुबानी उनकी ज़िंदगी की कहानी किसी सांप-सीढ़ी के खेल से कम न रही. पंजाब के एक भूमिहीन किसान के घर जन्म लिया, लेकिन पिता किसी चमत्कार की तरह अफ़गानिस्तान के एक बादशाह के यहां नौकरशाह बने. जब ज़िंदगी को लेकर समझ पैदा हो रही थी, तब ग्रेट डिप्रेशन ने समझाया कि भूख़ और ग़रीबी क्या होती है? कैसे इन हालातों ने दुनिया में फ़ासीवाद को जन्म दिया.


इन ख़तरों को वो पहचानते थे और इसका असर उनकी कलम पर पढ़ना ही था. जनवादी सोच की जड़ में यही ज़हनीयत थी.


मता-ए लौह-ओ कलम छिन गई तो क्या कि खूने दिल में डूबो ली हैं उंगलियां मैंने.

किसी ने ख़ूब कहा है कि फ़ैज़ की शायरी ज़िंदा इशारों का पर्याय है, जो दर्द की चीख़ और क़राह को कसकर अंदर दबाए और छुपाए है. मगर दरअस्ल जो दबाए दबती नहीं, छुपाए छुपती नहीं. 40 और 50 के दशक में लिखी नज़्मों की इंकलाबी तासीर इसलिए ऐसी थी. लेकिन इंक़लाबी सफ़र के बाद मंजिल की निराशा ने कलम को और तीखा और गहरा किया. वो 47 में पाकिस्तान टाइम्स का संपादन कर रहे थे और 47 में ही लिख रहे थे-


ये दाग़-दाग़ उजाला.. ये शबगज़ीदा सहर वो इंतज़ार था जिसका.. ये वो सहर तो नहीं.

लेकिन फैज़ की कलम की सबसे ख़ूबसूरत बात है फिर से जीने की स्वप्नशील रचनाशीलता. जो जीने... हारने.... फिर से लड़ने के लिए, जज़्बा देती है. यही वजह है कि रावलपिंडी षडयंत्र केस में धर लिए जाने के बाद सालों जेल में रहे तो संघर्ष धूप बनकर ख़ूबसूरत कलम को सींचता रहा. जो आज के हालातों में भी जीने, सपने देखने की हिम्मत देता है.

चलो फिर से मुस्कुराएं, चलो फिर से दिल जलाएं.

पाकिस्तानी गायिका नूरजहां ने एक दफ़ा फ़ैज़ के बारे में कहा था, ''मुझे मालूम नहीं कि मेरा फ़ैज़ से क्या रिश्ता है, कभी वो मुझे शौहर तो कभी आशिक़ नज़र आते हैं.. कभी महबूब, तो कभी बाप नजर आते हैं, तो कभी बेटा.''


फ़ैज़ इंक़लाबी रुमानियत का शायद आख़िरी दस्तावेज़ थे. 1981 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फ़ैज़ ने मशहूर सीनेट हॉल में उनको सुनने आए लोगों से कहा था, "मेरा दुनिया को सिर्फ़ यही संदेश है, इश्क करिए."


'इश्क' यानि फ़ैज़ की ज़बान में वो इश्क जो इंकलाब जो एक ख़ूबसूरत दुनिया का ख़्वाब दिखाता है. यक़ीन मानिए फ़ैज़ अब भी दुनिया से कह रहे हैं,

वो इंतजार था जिसका.. ये वो सहर तो नहीं!

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