• Rohit Joshi

संपादकीय: हिम्मत यह पूछने की कि 'तुमने हिमाक़त कैसे की?'

ग्रेटा थुन्बर्ग इसलिए अहम हैं क्योंकि एक तो वह मौजूदा पर्यावरण संकट की गहराई को समझने वाली एक किशोर हैं, साथ ही महत्वपूर्ण यह है कि वह इसके लिए एकदम सटीक लोगों से एकदम सटीक अंदाज़ में एकदम सटीक सवाल पूछ रही हैं. अब भी पृथ्वी का मौजूदा पर्यावरण संकट वहां नहीं पहुंचा है जहां से वापस ना लौटा जा सके. लेकिन इसकी एक ही शर्त है कि दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों से मुनाफ़ा कमाने की सत्ता पोषित कॉरपोरेट लूट को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाए.


गले में हरा पट्टा लटकाए, उत्तराखंड के अल्मोड़ा शहर में एक कॉंफ्रेंस हॉल में बैठे यूसो (उत्तराखंड स्टूडेंट यूनियन) के कुछ युवा, स्वीडन की चर्चित पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थुन्बर्ग को समर्थन देने और उत्तराखंड और भारत सरकार का ठीक उन्हीं नीतियों के लिए विरोध करने की योजना बना रहे हैं, जिनके लिए थन्बर्ग दुनिया भर के हुक्मरानों पर सवाल उठा रही हैं. सबसे रचनात्मक तरीक़ा क्या होगा? कार्यक्रम क्या होगा? युवा कैसे इसके लिए मोबलाइज़ हो पाएंगे? इन सारे सवालों पर इन युवाओं की चर्चा जारी है.


अपने एक रचनात्मक विरोध के तरीक़े से पिछले दिनों 16 साल की ग्रेटा थन्बर्ग ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा. ग्लोबल वॉर्मिंग से बढ़ते ख़तरों से चिंतित यह स्कूली छात्र स्वीडन के राष्ट्रीय चुनावों से ठीक पहले अपने स्कूली समय से वक़्त निकालकर स्वीडन की पार्लियामेंट के बाहर तख़्तियां लेकर धरने पर बैठ गई. इन तख़्तियों में इस दुनिया के सबसे बड़े ख़तरे के लिए अपने देश के साथ ही दुनिया भर के हुक़्मरानों से उनकी उन पॉलिसीज़ के बारे में सीधे सीधे सवाल किए गए थे जो इस दुनिया को तेज़ी से पर्यावरण के सबसे गंभीर ख़तरों की ओर धकेल रहे हैं.


इस 'एकला चलो रे!' लड़की के पीछे स्कूल के दूसरे छात्र और फिर धीरे धीरे पूरी दुनिया से कई लोग चलने लगे और थुन्बर्ग के आंदोलन को वैश्विक मान्यता मिलने लगी. अब उनका नाम सबसे कम उम्र की नोबल पुरस्कार विजेता बनने के लिए प्रस्तावित किया गया है.


शायद हमारे लिए नोबल अहम नहीं है, थुन्बर्ग अहम है. एक ऐसी बच्ची जो संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट समिट में हुक्मरानों से सीधे यह पूछने की हिम्मत कर रही है कि ''तुमने हिमाक़त कैसे की'', इस दुनिया को ग्लोबल वॉर्मिंग के इतने भयानक संकट में धकेल देने की? गुस्से और स्पष्ट समझदारी से भरी यह किशोर लड़की, ​जिसने अपने आंदोलन के लिए स्कूल से एक साल की छुट्टी ली है, कहती है, ''सब कुछ ग़लत हो रहा है. असल में मुझे यहां नहीं होना चाहिए था. मुझे समंदर पार मेरे स्कूल में होना चाहिए था.'' दुनिया भर के नेताओं को संबोधित करते हुए वह आगे कहती है, ''आपने अपने खोखले वादों से मेरे सपने चुरा लिए हैं, मेरा बचपन चुरा लिया है. हालांकि मैं फिर भी ख़ुशनसीब हूं. कई लोग जूझ रहे हैं, वे मर रहे हैं, पूरा पारिस्थतिकी तंत्र ढह रहा है.. '' यूएन क्लाइमेट समिट में वे हुक़्मरानों से ग़रजते हुए पूछती हैं, ''हम सामूहिक विनाश की शुरूआत देख रहे हैं, और आप सभी लोग सिर्फ पैसे और आर्थिक उन्नति की हवाई बातें करते हैं. आपकी हिमाक़त कैसे होती है यह सब करने की?''


थुन्बर्ग इसलिए अहम हैं क्योंकि एक तो वह मौजूदा पर्यावरण संकट की गहराई को समझने वाली एक किशोर लड़की है, साथ ही महत्वपूर्ण यह है कि वह इसके लिए एकदम सटीक लोगों से एकदम सटीक अंदाज़ में एकदम सटीक सवाल पूछ रही हैं. अब भी पृथ्वी का मौजूदा पर्यावरण संकट वहां नहीं पहुंचा है जहां से वापस ना लौटा जा सके. लेकिन इसकी एक ही शर्त है कि दुनिया भर में प्राकृतिक संसाधनों से मुनाफ़ा कमाने की सत्ता पोषित कॉरपोरेट लूट को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया जाए. मौजूदा दुनिया का वैश्विक नेतृत्व और कॉरपोरेट के साथ उनका गठजोड़ प्राकृतिक संसाधनों को केवल मुनाफ़ा कमाने के औज़ार के बतौर देखता है.


स्वीडन की एक 16 साल की लड़की के सवाल अल्मोड़ा के ​युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं कि वे भी ठीक यही सवाल अपनी और वैश्विक सरकारों से पूछें. असल में युवाओं के पास और चारा क्या है. अगर आज यह सवाल इसी तरही सीधे और सपाट शब्दों में चेतावनी देते हुए वैश्विक नेताओं से नहीं पूछे गए और प्राकृतिक संसाधनों की कॉरपोरेटी लूट जारी रही तो ये युवा अपने भविष्य को क्या जवाब दे पाएंगे, जब वह पूछेगा कि जब 'रोम जल रहा था, तो आप नीरो की भव्य पार्टी में मेहमान क्यों बन गए?'

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