सोशल मीडिया के जाल में

विज्ञान में ‘वि’ उपसर्ग है , विक्रय में भी है। क्रय में ‘वि’ लगने से उसका अर्थ पलट जाता है। क्रय खरीदने को कहते हैं , विक्रय बेचना हो जाता है। ज्ञान में ‘वि’ लगने से उसका अर्थ पलटना नहीं चाहिए, लेकिन पलट रहा है। लोग विज्ञान पढ़कर भी अज्ञानी हो रहे हैं। उन्होंने विज्ञान की तमाम सूचनाओं को शब्द-समूह-सा रट लिया है, उसका मूल तत्त्व लेना ही भूल गये। 

- डॉ स्कन्द शुक्ल



सर्वभोजी होने से सर्वदा पुष्टि नहीं मिलती. जब होशियार भीड़ बहुत होगी, तो रास्ते खाली मिलेंगे।


आदमी अकेला है और सेलफ़ोन में गड़ा है। चूँकि वह गड़कर भी सबसे जुड़ा हुआ है, इसलिए वह पहले के लोगों से एकदम अलग है। पहले के मनुष्य गड़कर नहीं जुड़े होते थे। वे या तो गड़कर अकेले हो जाते थे और या फिर उखड़ कर संसार-भर के हो जाते थे।

 

तकनीकी ने यह द्विवर्गीय विभेद भंग कर दिया। उसने पुरानी परिभाषाएँ मेट दीं। उसने हर व्यक्ति के अकेले रहने पर पहरा लगा दिया। यह सर्वथा विचित्र बात है। पहले पहरे अकेले रखने के लिए लगते थे। अब यह नया पहरा भीड़ में बनाये रखने के लिए लगाया जाता है। पहले का कारागार भी अन्धकारमय था, उसमें अलग-थलग रहकर आदमी सब से कट जाता था। आज का नया कारागार इतना प्रकाशवान् है कि जुड़े-जकड़े हुए व्यक्ति की आँखें चुँधिया जाती हैं। पहले विच्युति दण्ड थी, आज उसकी भूमिका संलग्नता निभा रही है। 


हम जुड़े हुए हैं। हम जोड़ दिये गये हैं। हमें एक बड़े जाल में फाँस लिया गया है। जाल को अँगरेज़ी में ‘नेट’ कहते हैं। उसमें 'इण्टर' उपसर्ग बन्धन-बोध कम करने के लिए लगाया गया है। ‘नेट’ की परतन्त्रता हर वस्तु-व्यक्ति के लिए एक ही है। लेकिन 'इण्टर' से उसे ढाँप देने से स्वेच्छा की चादर पड़ जाती है।


हम-आप इण्टरनेट में फँसे सुख से झूल रहे हैं। नेट को बन्धन न दिखने के लिए झूला बनना पड़ता है। इतने ढीले रहो कि व्यक्ति को जकड़न न जान पड़े। उसे हिलाओ-डुलाओ, उठाओ-गिराओ, गति का मद्धिम प्रबोध कराओ। वह प्रसन्न रहेगा। आँखें खुली रखकर भी चेतना बन्द झपकी लेने लगेगी और सम्भवतः सो भी जाए।


समाज से जुड़े रहने के लिए चेतना का न सोना परम आवश्यक शर्त है। इण्टरनेट में लोरी-थपकी का अजब इन्द्रजाल है : वह आँखें इतनी फाड़ देता है कि आदमी जागता रहता है, उसके भीतर बहुत-कुछ सुप्त हो जाता है। 


सोना और जगना साधारण क्रियाएँ-भर नहीं हैं। लोग आँखें बन्द करके तो सोते ही हैं, आँखें खोलकर सोने वालों की तादाद तकनीकी-युग में बहुत बढ़ी है। इसी तरह जागृति जगने और काम करने को तो कहा ही जाता है , लेकिन केवल इतनी मूल जैविक क्रियाओं-भर से जागरण नहीं माना जा सकता।


प्राचीन और मध्यकाल में लोग जितना बहिर्गमन करते थे, उससे कहीं अधिक उनका अन्तर्गमन होता था। वे जंगल में जाते थे और वहाँ पहुँच कर अपने ही भीतर पहुँच जाते थे।अब लोग बहिर्गमन बहुत करते हैं : पहले से अधिक, बेहतर और दूर-दूर तक। यह इतना बड़ा उद्यम हो चुका है कि अन्तर्गमन का समय ही अब नहीं मिलता। 


फिर यह बहिर्गमन भी अब पहले जैसा नहीं रहा। पहले बाहर जाना बाहर उठकर जाना होता था। वह प्रत्यक्ष था , उसमें अपने अच्छे-बुरे अनुभव थे। अब बहिर्गमन प्रत्यक्ष-परोक्ष दोनों होता है। फ़्रांस या मिस्र का अनुभव आपको दोनों प्रकार से , दो अलग-अलग रूपों में मिल सकता है। ख़तरे और जोख़िम पहले से कम हो गये हैं , लेकिन उनका प्रकार बदल भी गया है।


तकनीकी हर मनुष्य पर सूचना की अनवरत मूसलधार वृष्टि करती है। यह उसके सबसे महत्त्वपूर्ण गुणों में शामिल है। मशीन में उपजी गति प्रकृति से ही होड़ लगाने के लिए है। हर वह वस्तु जो प्राकृतिक है, उससे बेहतर मानवनिर्मित कैसे बनाया जाए। हर सर्जना, हर वर्जना में आदमी के हाथ में नियन्त्रण हो। हर सुघटना, हर दुर्घटना यों ही न हो : उसमें व्यक्ति की संस्तुति का समावेश हो। 


लेकिन हर मनुष्य एक-सा कहाँ है ? हर मनुष्य का चिन्तन और मनन एक समान कैसे हो सकते हैं ? अलग-अलग ध्येय , अलग-अलग धारणा। अलग-अलग साध्य , अलग-अलग साधन। अलग-अलग गतियाँ , अलग-अलग गन्तव्य। अलग-अलग मतियाँ, अलग-अलग मन्तव्य। 


तकनीकी विज्ञान की सक्षमा पुत्री है। यूनानी भाषा में ‘टेखने’ का अर्थ कला-हुनर ही होता है। लेकिन ऐसे