मासूम मन और वीभत्स बलि

एक बार फिर अपनी माई यानी कुल देवी को रिझाने के लिए सुअर को मारने की तैयारी थी, लेकिन वो सुअर किसी के हाथ नही लग रहा था. इस बार मेरे सामने जैसे कोई सुअर नही बल्कि कोई नटखट बच्चा था, जो घर के बड़ों की मार से बचने के लिए यहाँ वहां दौड़ रहा था.

- श्वेता सिंह

'Cayman Wood Ceremony' by Ulrick Jean-Pierre

फ़र्श पर सुअरों का बिखरा ख़ून आज भी मेरे दिमाग में तैरता है. कई लोग यानी घर के सब मर्द मिलकर अपनी कमीज़ और कुर्ते की बाजू कुहनियों से ऊपर चढ़ाकर सुअर को पकड़ने की कोशिश करते. वह सुअर खुद को बचाने की कोशिश में घर के अलग-अलग कोनों में जहां जगह पाता घुस जाता. लेकिन मर्द कहाँ हार मानने वाले थे! जब सुअर उनकी पकड़ से बाहर निकल जाता तो गालियों की बौछार शुरू हो जाती. एक लाइन तो मुझे आज भी याद है, "साले बहन के दल्ले कहाँ भागता है..? हमसे बचकर कहाँ भागेगा...?"


और सुअर पकड़ में आ जाता. उसको तो पकड़ा ही जाना था और फिर घर का दरवाज़ा बंद कर दिया जाता! आख़िर वो कहाँ तक भागता. फिर तेज़ धार वाला कोई चाकू उसकी गर्दन पर चला दिया जाता या कोई बड़ी छुरी. क्योंकि सुअर की चमड़ी बहुत मोटी होती है! आसान नहीं होता उसकी मोटी चमड़ी को काटना. लेकिन घर के मर्द अपनी कुल देवी को ख़ुश करने के लिए बलि देने के जोश में सुअर की गर्दन पर बार-बार वार करते और अपना पूरा ज़ोर लगाकर उसकी गर्दन में छुरी घुसा देते.


जब उस सुअर की गर्दन से ख़ून निकलता तो सब लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती. कोई दौड़कर मिट्टी का दिया ले आता और सुअर की गर्दन से टपकती ख़ून की बूंदे उस दिए में भर ली जातीं! कुल देवी की पूजा करते वक़्त इसी ख़ून से भरे दिए को इस्तेमाल किया जाता था. सुअर को अपने काबू में करने और उसे मारने वाले लड़के की तारीफ़ की जाती. मैं छत की सीढ़ियों से छिपकर ये सब देखती थी.


सुअर की बलि के साथ ही घर के मर्द और औरतें कुल देवी के सामने अपनी अपनी मन्नतें मांगने के लिए तैयार हो जाते. ये सब देख कर मुझे रोना आता था और गुस्सा भी! ये हिंसा देख कर वहां मेरा दम घुटता था लेकिन अक्सर कुछ कह नही पाती थी. बार-बार ये सब देख कर मेरे मन में विरोध की चिंगारी भड़कती थी लेकिन मैं शांत हो जाती.


जब भी घर में कोई बीमार हो जाता या किसी भी तरह की दिक्कतें आती तो घर के लोग अपनी कुल देवी को सुअर की बलि देने का वचन देते, 'हे माई! सब ठीक कर दे तुझे एक सुअर की बलि चढ़ाएंगे', और जब माई उनकी नहीं सुनती तो वो उसे गालियां भी बकते.


हालांकि उस वक़्त मैं बहुत छोटी थी लेकिन घर मे होने वाली हर घटना का मेरे दिमाग पर गहरा असर होता. हर हिंसक घटना के बाद उस घर से भाग निकलने की मेरी ज़िद्द और मज़बूत हो जाती. लेकिन धीरे धीरे मैं उन लोगों से आज़ाद तो नहीं हो पाई लेकिन आवाज़ उठाना सीख गई.


एक बार फिर अपनी माई यानी कुल देवी को रिझाने के लिए सुअर को मारने की तैयारी थी, लेकिन वो सुअर किसी के हाथ नही लग रहा था. मैंने अक्सर सुअरों को अपने सामने मरते हुए देखा था लेकिन इस बार मेरे सामने जैसे कोई सुअर नही बल्कि कोई नटखट बच्चा था, जो घर के बड़ों की मार से बचने के लिए यहाँ वहां दौड़ रहा था. मैं एक बार फिर से ये सब अपने सामने होता हुआ देख रही थी. ताली बजाकर हंस रही थी, सुअर घर के छोटे लड़के के हाथ लगा और फिर चला दी गई, गर्दन पर छुरी. उसकी गर्दन से खून बहा और मेरे अंदर से विरोध की आवाज़ भड़की, मैं चिल्ला उठी, मेरी आंखों में आंसू थे. मैं कांप रही थी.


घर के मर्द और औरतें मुझे इस तरह देख रहे थे जैसे अब मेरी बलि दी जाएगी. लेकिन मैं रुकी नही मैंने चिल्ला चिल्ला कर कहा, "ये कैसी देवी है..? ये देवी है या राक्षसी..? ख़ून मांगती है तुम्हारी देवी! जानवर चाहिए इसे! बंद करो ये सब...! मैंने ये सब कह तो दिया लेकिन अपने अंजाम के बारे में नही सोचा. मेरे बड़े मामा मुझे मारने के लिए आगे बढ़े. लेकिन मर्दो की इस सत्ता को मैं चुनौती देने के लिए तैयार थी.


मैंने कहना जारी रखा "तुम सब पागल हो गए हो.. क्या कर रहे हो?" सब मर्द और औरतें मेरी माँ को लाल आंखों से देखने लगे और चिल्लाने लगे, "अरे! ले जा इसे यहां से.. माई इसे शाप देगी.. इसे पाप लगेगा.. ये कहीं की नही रहेगी.."


मैं उस रात अंधेरे में छत पर छुपकर बहुत रोई.. शायद, उस मासूम सुअर के लिए.. या घर में मिली गालियों के लिए.. और शायद इस सब से ज़्यादा उस बंदिश के चलते जो हमेशा अपने इर्द-गिर्द महसूस करती हूँ.. जो ग़लत लगता है हम उसके ख़िलाफ़ बोल भी नहीं पाते..

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