क्या 'देशभक्त' होना ज़रूरी है?

आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में एक नागरिक ऐसा भी हो सकता है जिसकी किसी धर्म में आस्था ना हो, ईश्वर पर आस्था ना हो यानि वह 'भक्त' ना हो. इस बात का एक विस्तार यहां तक भी है कि यह भी ज़रूरी नहीं कि एक नागरिक 'देश' का 'भक्त' हो और 'भक्त' ना होने भर से वह 'देश' का 'द्रोही' भी नहीं हो जाता. आधुनिक समाजों को 'भक्तों' की ज़रूरत नहीं है उन्हें अपनी नागरिक ज़िम्मेदारियों का एहसास रखने वाले सचेत नागरिकों की ज़रुरत है. महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताने वाले, आतंकवाद की आरोपी और भाजपा सांसद प्रज्ञा ठाकुर के बयानों ने यह मौका दिया है कि हम इस बात पर चर्चा कर सकें कि एक आधुनिक लोकतंत्र में क्या एक नागरिक का देशभक्त होना ज़रूरी है. यहां सुशोभित का यह आलेख इसी आशय से ​प्रस्तुत है. (-संपादक)


-सुशोभित

भाजपा की सांसद ने गांधीजी के हत्यारे को फिर से देशभक्त कहा, और इस बार उन्होंने लोकसभा में वैसा कहा- यह समाचार मैंने सुना। इस पर पहले से ही बहुत विवाद और कलह है। अब तो और बढ़ेगा। मैं समझता हूं, इसके मूल में एक भाषाई विभ्रम है। यानी इस पर विवाद करने से पहले हमें यह तय कर लेना चाहिए कि देशभक्त शब्द अच्छा है या बुरा। क्योंकि सारी बाधा इसी से उत्पन्न होती है।

मुझको नहीं लगता कि देशभक्त नामक यह शब्द अपने शब्दार्थ से यह संकेत देता है कि यहां किसी भले व्यक्ति की बात हो रही है। यह केवल इतना ही बतलाता है कि फलां व्यक्ति देशभक्त है, यानी देश नामक भौगोलिक-सांस्कृतिक अवधारणा का वह उपासक है। वह व्यक्ति हत्यारा नहीं हो सकता, यह इस शब्द की ध्वनि नहीं है। वह व्यक्ति उत्तम चरित्र का स्वामी ही होगा, यह भी इस शब्द की ध्वनि नहीं है।

यह बात मैं यहां पर इसलिए स्पष्ट कर रहा हूं, क्योंकि आजकल इस शब्द को लेकर बहुत सारा विभ्रम उत्पन्न किया गया है। एक पक्ष कहता है, आप देशभक्त नहीं हैं, अपनी देशभक्ति सिद्ध कीजिए। दूसरा पक्ष कहता है, हम देशभक्त हैं, किंतु हमें यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। कोई भी साहस से यह नहीं कहता कि हम देशभक्त नहीं हैं, क्योंकि देशभक्त होना ज़रूरी नहीं है। आख़िर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य किसी भौतिक अवधारणा की भक्ति करना नहीं, अपनी चेतना का उन्नयन करना है। उसे क्यों किसी का भक्त होना चाहिए? किंतु इतना साहस अभी मुझे बौद्धिक-उदारवादियों में भी दिखलाई नहीं देता, जो अन्यथा उग्र राष्ट्रवाद की अवधारणा के धुर विरोधी होते हैं। वे देशभक्त शब्द में निहित प्रतीकात्मकता के दबाव में आ जाते हैं और कहते हैं कि हम भी देशभक्त हैं, किंतु इसका प्रमाण देने की हमको आवश्यकता नहीं। मैं उनसे कहूंगा कि इतना डरने की आवश्यकता नहीं है।

इसलिए जब भाजपा की सांसद, और केवल वह ही नहीं, इस पार्टी के कैडर के अनेक कार्यकर्तागण जब महात्मा के हत्यारे को देशभक्त कहते हैं तो इससे मैं विचलित नहीं होता। क्योंकि देशभक्त हत्या नहीं करेगा, यह इस शब्द की व्युतपत्ति और पारिभाषिकता में कहीं निर्दिष्ट नहीं है। उल्टे, देशभक्त हत्या करने को किसी भी दूसरे व्यक्ति की तुलना में अधिक तत्पर होगा, इसकी सम्भावना ही अधिक है। वह देश का भक्त है, मानव का भक्त नहीं है। मानव उसके लिए देश की तुलना में गौण है। वह किसी भी क्षण देश के लिए मानव की बलि चढ़ाने को तत्पर रहेगा। इन अर्थों में तो मुझको इस धारणा पर विवाद नहीं कि महात्मा का हत्यारा देशभक्त था या नहीं। बहुत सम्भव है कि वह निष्ठावान देशभक्त ही हो। प्रश्न तो यह है कि तब क्या मैं स्वयं को देशभक्त कहलाना चाहूंगा या नहीं, या आपको वैसा मानना चाहिए या नहीं। आपका जो मत हो, वो तो मैं नहीं बतला सकता। किंतु मेरा मत मेरी दृष्टि में सुस्पष्ट है। मैं तो स्वयं को देशभक्त नहीं कहता। वैसी कोई कोटि या संज्ञा ही मेरे जैसे स्वतंत्रचेता के लिए लज्जा का विषय है। देश तो क्या, मैं किसी भी धर्म, मत, सम्प्रदाय, विचार, व्यक्ति, अवधारणा का भक्त नहीं हूं, ना कभी हो सकता हूं। भारत-देश में मेरा जन्म हुआ, इससे मेरा उससे लगाव है। यहां का मैं निष्ठावान नागरिक हूं, तो उसका कल्याण हो, यही मैं हमेशा चाहूंगा। किंतु स्वयं को वैसा भक्त कहलाना, जिसमें दूसरी कोटियों का विचार शून्य हो जाए, नीति विशृंखल हो जाए, संदर्भ मैले हो जाएं, तात्पर्य निष्प्रभ पड़ जाएं, वैसा तो मैं कभी कहला नहीं सकता। जो स्वयं को देशभक्त कहते हों, उन्हें वैसी कोटियां मुबारक। मैं तो मुक्त हूं।

यह तो हुआ देशभक्त शब्द का भाषाई विवेचन। अब तनिक इसके राजनीतिक अभिप्रायों की बात करें। यह तो निश्चित है कि जैसे मैंने अभी यहां पर कहा कि मैं देशभक्त नहीं हूं, वैसा कहने का नैतिक और बौद्धिक साहस भारत देश के प्रधानमंत्री में तो नहीं ही होगा। वे तो गर्व से स्वयं को देशभक्त ही कहेंगे। दूसरे शब्दों में, देशभक्त एक गौरवशाली प्रत्यय है, इसमें उन्हें कोई संदेह नहीं है। तब अगर उनकी पार्टी की एक सांसद राष्ट्रपिता के हत्यारे को देशभक्त कहती है तो उनके सामने यह स्पष्ट करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता है कि क्या तब वे प्रकारांतर से इस बात की अभ्यर्थना करते हैं कि गांधीजी की हत्या एक नेक क़दम था, जो कि देश के हित में था?

हम देख रहे हैं कि गांधीजी की 150वीं जन्म-जयंती के अवसर पर प्रधान जी बहुत सारे कार्यक्रम करवा रहे हैं और गांधीजी का गुणगान करने का कोई अवसर वो कभी चूकते नहीं हैं। वैसे में उनसे यह स्पष्टीकरण मांगना देश का अधिकार है कि अगर उनके लिए देशभक्त होना एक गौरव की बात है, तब गांधीजी के हत्यारे को देशभक्त कहने वाली सांसद, जो कि दुर्भाग्य से मेरे ही नगर की लोकसभा-प्रतिनिधि है, का उनकी पार्टी का सदस्य बने रहना कैसे सम्भव है? ये दोनों बातें एक साथ नहीं हो सकतीं।

हम जानते हैं कि भाजपा का ज़मीनी-कैडर गांधीजी के बारे में क्या विचार रखता है। प्रचलित-नैरेटिव के प्रति उसकी लापरवाही की अति यह है कि वह अपने विचारों को छुपाने का भी यत्न नहीं करता। वही इस पार्टी को वोट भी देता है। तब अगर प्रधान में नैतिक साहस है तो वे गांधीजी की हत्या के औचित्य को स्वीकार करें, और उनके गुणगान का पाखण्ड बंद करें। माना कि एक राजनेता को बहुत सारे स्वांग करना होते हैं, विशेषकर तब, जब वो किसी संवैधानिक पद पर हो। फिर भी यह पाखण्ड की अति होगी। उन्हें गांधीजी पर अपने मत को स्पष्ट करना ही होगा। कम से कम इतना तो वो कह ही सकते हैं कि माना गांधीजी हमारे लिए पूज्य हैं, किंतु उनका "वध" उस समय की ज़रूरत थी और वह सर्वथा देशहित में था, इसलिए मेरी पार्टी की सांसद अगर उनके हत्यारे को देशभक्त कहती है तो यह तर्कसंगत ही है। इतना तो उन्हें कहना ही चाहिए। राष्ट्र प्रतीक्षा कर रहा है।

पिछले दिनों मैं बिड़ला भवन में था, जहां गांधीजी की हत्या की गई थी। इस भवन को एक गांधी-स्मृति-स्मारक की तरह विकसित किया गया है। भारतीय यहां कम ही आते हैं, विदेशी बहुत आते हैं। वो जब यहां आकर गांधी जी के जीवन की झांकी देखते हैं, उनके विचार पढ़ते हैं तो अभिभूत हो जाते हैं। फिर गाइड उन्हें उस स्थान पर ले जाता है, जहां 30 जनवरी 1948 को वह पाप-कृत्य हुआ था। गाइड बतलाता है कि यही वो जगह थी, जहां प्वॉइंट ब्लैंक रेंज से एक व्यक्ति ने गांधी जी को तीन गोलियां मार दी थीं। विदेशी पर्यटक पूछते हैं, लेकिन क्यों? एक भारतीय ने ही गांधीजी को गोली क्यों मारी? इस प्रश्न का कोई उत्तर मैं गाइड के चेहरे पर नहीं देखता हूं। उलटे एक गहरी लज्जा उसकी चेतना पर आच्छादित हो जाती है।

पिछले सत्तर से भी अधिक सालों से लज्जा का यह स्मारक भारतीय-चेतना पर हावी है कि एक भारतीय ने ही गांधीजी को गोली मारी, और वो भी उनके ही धर्म के व्यक्ति ने, जबकि गांधीजी तो इतने धर्मनिष्ठ थे। इतना ही नहीं, हत्यारे ने वैसा धर्म और देश के हितों का हवाला देते हुए ही किया। यह कैसे सम्भव हो सकता है? इस कहानी में कोई न कोई तो पूरी तरह से ग़लत है। आप कह दीजिए कि गांधीजी ही पूरी तरह से ग़लत थे, कोई हर्ज़ नहीं है, किंतु इस प्रश्न से बचना अब सम्भव नहीं है। इस प्रेतबाधा की सुस्पष्ट व्याख्या किए बिना कोई भी अधिक समय तक सार्वजनिक जीवन में नीति और गुण के भाषण नहीं कर सकता।

प्रधान जी अगर अपनी पार्टी-कैडर की विचारधारा को चुनौती नहीं दे सकते तो कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं कि गांधीजी का नाम लेना बंद कर दें और एक संगीन चुप्पी अख़्तियार कर लें? गांधीजी के नाम से आज कोई चुनाव नहीं जीत सकता। उस बूढ़े के कंधों का आसरा लेने की वैसी भी क्या विवशता कि चरित्र का दोहरापन पूरी दुनिया के सामने ऐसे उजागर हो जाए, जो न उगलते बने न निगलते। इति।

सुशोभित 'आहा ज़िंदगी!' पत्रिका से जुड़े हैं।

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