क्या बाज़ार 'पर्यावरण के संकट' में भी 'बाज़ार' तलाश रहा है?

Updated: Oct 2, 2019

संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में दर्शाई गई मौजूदा वैश्विक बाज़ार की हालत, पर्यावरणीय चिंताएं और इन दोनों से निपटने के दिए गए सुझावों को अगर गहराई से पढ़ा जाए तो यही संकेत मिलते हैं कि तेज़ी से गर्त की तरफ़ बढ़ती ​वैश्विक अर्थव्यवस्था अब गहराते पर्यावरण संकट में अर्थव्यवस्था को सुधारने का 'बाज़ार' तलाश रही हैं.

- रोहित जोशी


संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में दर्शाई गई मौजूदा वैश्विक बाज़ार की हालत, पर्यावरणीय चिंताएं और इन दोनों से निपटने के दिए गए सुझावों को अगर गहराई से पढ़ा जाए तो यही संकेत मिलते हैं कि तेज़ी से गर्त की तरफ़ बढ़ती ​वैश्विक अर्थव्यवस्था अब गहराते पर्यावरण संकट में अर्थव्यवस्था को सुधारने का 'बाज़ार' तलाश रही हैं. इसे उसने 'ग्लोबल ग्रीन न्यू डील' का नाम दिया है.


बुधवार को 'संयुक्त राष्ट्र, व्यापार, निवेश और विकास ऐजेंसी' (UNCTAD) की एक ताज़ा रिपोर्ट में दुनिया भर के देशों से साथ आकर 30 खरब डॉलर्स जुटा कर सार्वजनिक क्षेत्रों में निवेश करने की बात कही गई है जिससे कि 'वैश्विक अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से' निपटा जा सके.


इस रिपोर्ट में दुनिया भर के देशों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि 'पर्यावरण पर बढ़ती चिंताओं, आर्थिक विकास' की चुनौतियों के बीच मौजूदा आर्थिक मॉडल पर फिर से सोचने की ज़रूरत है. इसके लिए उसने ''ग्लोबल ग्रीन न्यू डील'' की बात कही है.


UNCTAD के वैश्वीकरण और विकास रणनीति विभाग से प्रमुख रिचर्ड कोज़ुल-राइट ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा है कि संयुक्त राष्ट्र ने 1930 की भीषण मंदी Great Depression से उबरने के लिए जिस महत्वाकांक्षी मॉडल का इस्तेमाल किया था, ठीक उसी मॉडल का इस्तेमाल, मौजूदा पर्यावरण और वैश्विक बाज़ार के हालातों को सुधारने के लिए वैश्विक स्तर पर करने की ज़रूरत है.


मौजूदा दुनिया, दो चिंताओं से भयानक तरह से ग्रसित है. पहली है पर्यावरण की चिंता. जिसके लिए पूरी दुनिया भर में बहस है. ​कहा जा रहा है कि अगर इसे लेकर अभी नहीं जागे तो फिर पर्यावरण का संकट पर्यावरण से जुड़ी भयानक त्रासदियों के ज़रिए इस पूरी दुनिया को हमेशा के लिए सुला देगा. इसके अलावा दूसरी चिंता वैश्विक बाज़ार की चिंता है जो गर्त की तरफ़ ढहता जा रहा है. इसके कोलैप्स करने से जो त्रासदी जन्म लेगी उसकी बानगी हमने ताज़ा अतीत में 2008 में, और उससे पहले 1930 की महामंदी में देखी है, जिसके चलते दुनिया भर के कई बिजनेस हाउसेज़ डूब गए और व्यापार में हुए बेतहाशा नुक़सान से लेकर कई लोगों के रोजगार छिनने तक की कई घटनाएं घटीं. कई लोगों ने आत्महत्याएं की और कईयों के घर परिवार बर्बाद हो गए.


भारत में आई असमय 'मंदी' जिसे सरकार के मंत्री/समर्थक 'सुस्ती' कह रहे हैं, भी इसका तुरत उदाहरण बनने वाली है, हालांकि यह वैश्विक बाज़ारों की स्वाभाविक मंदी के बजाय देश की मौजूदा सरकार की दृष्टिहीन आर्थिक ​नीतियों की देन है.

बहरहाल, ये दोनों ही चिंताएं विश्व की सबसे बड़ी चिंताएं हैं, जिनसे उबरना मौजूदा दौर की सबसे बड़ी चुनौती है. दुनिया भर में सर्वशक्तिशाली संस्थाओं और देशों का भी इन चिंताओं की ओर खासा ध्यान है. हालांकि, मूलत: बाज़ार के गणित से संचालित होने वाली ये संस्थाएं, पर्यावरण के आसन्न संकट को समझ तो रही हैं लेकिन अपनी संरचना में यह पर्यावरण सम्मत रास्ते नहीं तलाश सकतीं. मुनाफ़े को केंद्र में रख कर बुनी गई यह पूरी व्यवस्था एक बाज़ार है. जिसके लिए प्रकृति की ओर से उपलब्ध कराई गई नि:शुल्क नेमतें 'संसाधन' हैं. जिनकी प्रोसेसिंग करके दुनियाभर में फैले कॉरपोरेशंस ने अतीत में अकूत मुनाफ़ा कमाया गया, वर्तमान में भी यह प्रक्रिया चरम पर है और इसकी होड़ बताती है कि निकट भविष्य में भी इस प्रवृत्ति को समेट पाना संभव नहीं है.


लेकिन अब 'ग्लोबल ग्रीन न्यू डील' का एक नया सिगूफ़ा छोड़ा जा रहा है. मोटे तौर पर इस डील का मक़सद दुनियाभर के देशों से उनके टेक्सपेयर्स की कमाई में से सालाना 17 खरब डॉलर्स यानी तकरीबन 1225 खरब रुपया जुटाकर उन्हें ऐसी परियोजनाओं में खर्च किया जाएगा जो कि कथित तौर पर पर्यावरण सम्मत होंगी. कहा जा रहा है कि इससे 17 करोड़ नए रोज़गार पैदा होंगे और विकासशील देशों में कथित स्वच्छतापूर्ण औद्योगीकरण हो पाएगा और कुल मिलाकर 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को शून्य करने के उस लक्ष्य को पाया जा सकेगा जिन्हें संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलेपमेंड गोल्स के लिए निर्धारित किया गया है.


'ग्लोबल ग्रीन' का यह टर्म पहले पहल अमेरिका के डेमोक्रेट्स की ओर से उठाया गया है, जिसका मक़सद ऊर्जा ज़रूरतों को फ़ोसिल फ्यूल्स से पूरा करने के बजाय अक्षय उर्जा की तरफ़ शिफ्ट करने का है. जिससे तेज़ी से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को शून्य किया जा सके.


लेकिन यहां कुछ सवाल हैं. अर्थव्यवस्था और पर्यावरण का यह संकट किसका खड़ा किया है? क्या पर्यावरण में इस क़दर क्षरण के लिए पृथ्वी पर मौजूद हर एक मनुष्य बराबर का भागीदार है? क्या सभी देशों की समान भूमिका है? क्या अक़ूत मुनाफ़े के लिए प्रकृति की नेमतों को लूटकर, पर्यावरण को बरबादी की कग़ार पर ला खड़ा करने वाले कॉरपोरेशंस और विश्व का एक आम नागरिक़ इसके लिए बराबर ज़िम्मेदार हैं?


पृथ्वी के पर्यावरण पर ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेट चेंज का जो इतना बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है, इसकी वजह प्रकृति के जीवनदायी स्रोतों को कुछ लोगों के मुनाफ़े के लिए निचोड़ लेना रहा है. यह दोनों प्रक्रियाएं अपने चरम की ओर बढ़ी हैं और पर्यावरण और बाज़ार दोनों, साथ साथ संकट से घिर रहे हैं.


ऐसे में इसकी भरपाई करने और इस संकट के उबरने के लिए जो बाज़ारोन्मुख नीतियां बनाई/सुझाई जा रही हैं उनमें संयुक्त राष्ट्र की नज़र देशों के पास मौजूद आम नागरिकों द्वारा जमा किए गए टेक्स के पैसे पर क्यों है? क्यों ​नहीं मुनाफ़े से अगाध धन बटोर चुके दुनिया के सबसे बड़े कॉरपोरेशंस से यह पैसा बक़ायदा छीन लिया जाए जो कि असल में पर्यावरण को तबाह करके ही जुटाया गया है.


मोटे तौर पर बाज़ार के अब जब यह समझ आ गया ​है कि प्रकृति की लूट अनंत काल तक नहीं चल सकती और बाज़ार ख़ुद अपने स्ट्रक्चर से ढह जाने को तैयार है. ऐसे में दुनिया को अलग अलग संस्थानों के ज़रिए कंट्रोल करने वाली ताक़तें, पर्यावरण के मौजूदा ख़तरों में बाज़ार की संभावनों को तलाशते हुए ऐसे रास्ते देख रही हैं कि मंदी झेल रही अर्थव्यवस्थाओं को धक्का लगा जाए.


दुनियाभर के ​वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् मानते हैं दुनिया को तबाही से बचाने के लिए इसके बढ़ते तापमान को तुरंत ही 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर देना होगा. अगर ऐसा नहीं होता है और दुनिया हर साल 2 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म होती चली जाएगी तो इससे निपटने में हज़ारों खरब डॉलर्स को खर्च करना होगा. इसी तर्क को सामने रखते हुए कोज़ुल-राइट कहते हैं, ''हमारे पास संसाधन उपलब्ध हैं. जो नहीं है वह है राजनीतिक इच्छा शक्ति... अगर 17 खरब डॉलर्स सालाना नहीं जुटाया जा सकता तो जो तबाहियां आएंगी उसके लिए हम, 'हज़ारों खरब डॉलर्स' का भार नहीं झेल सकते.''


कोज़ुल-राइट के तर्क से मैं भी सहमत हूं हमारे पास वाकई राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी है और उनकी आशंकाओं का अधार बिल्कुल वैज्ञानिक है लेकिन जो समाधान वे सुझाते हैं उसके लिए धन का आग्रह दुनिया को इस क़दर पर्यावरण संकट में धकेल देने वाले कॉरपोरेशंस से किया जाना चाहिए. इसके लिए वाकई हमारे राजनीतिक नेतृत्व में इच्छा शक्ति की कमी है. क्योंकि दुनिया भर के राजनीतिक नेतृत्व इन्हीं कॉरपोरेशंस द्वारा फंडेड/संचालित हैं.


हम वाकई पर्यावरणीय प्रलय की दहलीज़ पर हैं. असल में समाधान सिर्फ एक है, ठीक अभी प्रकृति को मुनाफ़े की लूट के लिए देखा जाना बंद कर दिया जाए. गांधी को यहां याद करने की ज़रूरत है, 'प्रकृति के पास हमारे लिए सब कुछ है, लेकिन हमारे लालच के लिए नहीं.'