स्मृति शेष: जितना सोचा जा रहा है, अपने चहेतों के लिए जेटली उससे बड़ी क्षति हैं

समकालीन भारतीय राजनीति में ख़ासकर भारतीय जनता पार्टी के लिए अरुण जेटली एक अद्वितीय व्यक्तित्व रहे हैं. यह एक ऐसा व्यक्तित्व रहा है, जिनकी मृत्यु से हुए नुक़सान का जितना अंदाजा उनके चहेते लगा रहे हैं यह नुक़सान असल में उससे कई ज्यादा है. भास्कर उप्रेती ने इस नुक़सान का एक आंकलन किया है पढ़ें.

- भास्कर उप्रेती



अरुण जेटली का जाना भाजपा के लिए उससे बड़ी क्षति है, जैसी वो महसूस कर रहे हैं. यह अपने एक नेता को अश्रुपूर्ण विदाई देने से अधिक है. आखिर जेटली ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने भाजपा को सबसे धनी पार्टी बनवा दिया- ‘इलेक्टोरल बांड’ के आविष्कारक जेटली. इस बांड को न चुनाव आयोग समझ पाया और न ही विपक्ष. नोटबंदी के साथ-साथ इसे लांच किया गया. परिणाम आज की हाई-टेक भाजपा. उनके कार्यालय अब पांच सितारा होटलों को मात दे रहे.

प्रधानमंत्री मोदी के लिए भी यह उससे बड़ी क्षति है, जैसा वो महसूस कर रहे हैं. उन्होंने मोदी कैबिनेट में रहते हुए अपनी कला से न सिर्फ बे-सिर-पैर के फ़ैसलों को जायज ठहरा दिया, बल्कि वो मोदी को उस समय तूफ़ान से बाहर निकालकर लाए जब उन्हें ‘मौत का सौदागर’ कहा गया था. वकील के रूप में ही जेटली ने असल में मोदी की क्षमताओं को पहचान लिया और दोनों की जुगलबंदी का पटाक्षेप वर्षों बाद तब हुआ, जब गोवा सम्मेलन में झटके से उन्होंने अडवानी का ताज मोदी के सिर में रख दिया. वह अपनी कानून-विद्या से अमित शाह को भी छुड़वा लाए. उनकी शीर्ष स्थान पर प्राण-प्रतिष्ठा की.

मीडिया इंडस्ट्री के लिए भी जेटली का जाना जितना सोचा जा रहा है, उससे भारी क्षति है. उन्हें ‘ब्यूरो चीफ’ कहा जाता है. उन्होंने टीवी चैनलों के लिए पत्रकारों के बीच से बेहतरीन भाजपा-प्रवक्ता चुने. यूपीए-2 के समय सरकार मीडिया-विज्ञापनों पर 1800 करोड़ खर्च कर रही थी उसे 7800 करोड़ तक पहुंचा दिया गया. यह खरी-खरी सौदेबाजी थी. इस हाथ ले, उस हाथ दे. यूँ ही उन्हें पहले मंत्रिमंडल में कमतर माना जाने वाला सूचना प्रसारण मंत्रालय नहीं दिया गया था. राजनाथ तो फर्जी के नंबर 2 रहे. मोदी के नाक, कान, हाथ जेटली ही थे.

राजनीति रणनीतिकारों से चलती है. दंगाई, फ़सादी, चीखने-चिल्लाने वाले, छाती पीट डालने वाले, गला फाड़ दहाड़ लगाने वाले, मर्दानगी से भरे हुए तो बहुत मिल जाते हैं. कूल रहकर कूटनीति गढ़ने वाले मुश्किल से ही मिलते हैं.

आखिर क्या वजह रही होगी कि कहीं अधिक काबिल, कुशाग्र, वाक्पटु और फौलादी लोहे से बने हिन्दू सुब्रमण्यम स्वामी को जेटली ने वर्षों से भाजपा की चौहद्दी से दूर रखा होगा? कैसे रखा होगा? आज भी वो जेटली की छाया से घबराते हैं. आखिर क्या वजह रही होगी कि आर.एस.एस. की गुड-बुक में न होने के बावजूद उनका कभी कोई बाल-बांका नहीं कर पाया? वह बाजपेई से लाकर मोदी सरकार तक में चहेते रहे? उन्हें न तो कभी खाकी कच्छा पहने किसी ने देखा, न ही राम मंदिर का जयकारा लगाते हुए. वे चुनाव हारने के बावजूद मंत्री बन जाते. बल्कि वह संसद में भाजपा के लिए विपक्ष का चेहरा भी रहे.

कुलीनता का चेहरा लिए जेटली वो चीज थे जो कॉर्पोरेट को पसंद थे, जिनके लिए वो पहली दफा विनिवेश मंत्री बने (जो खुद में उनकी गहरी सेटिंग का संकेत था). यह मंत्रालय ही विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने बनवाया था. यानी सरकार में सीधे-सीधे कॉर्पोरेट का आदमी. इस मायने में यह कॉर्पोरेट का भी नुकसान कहा जाएगा. ऐसा आदमी जो बिना शोर-शराबे के उनके एजेंडा को प्लेस कर दे, नहीं रहा. जेटली की सफलता का एक राज ये भी है कि वह पेप्सी और कोक के समर्थन में और किसानों के विरोध में कोर्ट में खड़े होते थे; और जीतते थे.

SUPPORT US TO MAKE PRO-PEOPLE MEDIA WITH PEOPLE FUNDING.

Subscribe to Our Newsletter

© Sabhaar Media Foundation

  • White Facebook Icon

Nainital, India