टोटके वाले नींबू की लेमन टी..

Updated: Apr 13

गर्मियों के दो-तीन महीनों तक यह सिलसिला जरूर चला होगा। इस दौरान हमने न जाने कितने लोगों के टोटकों को अपने माथे पर ले लिया। कितने लोगों की मुसीबतों को अपना बना लिया। कितने लोगों के चढ़ाए हुए नींबू ने हमारी चाय के स्वाद में इजाफ़ा किया।

-कबीर संजय



ये कोई बीस-बाईस साल पहले की बात होगी। हम वैसे तो शर्मीले और संकोची थे। लेकिन, हमारी दोस्तियों का दायरा बहुत बड़ा था। शायद ही कोई काम ऐसा हो, जो हम अकेले करने चले जाएं। एक साइकिल पर तीन-तीन आदमी बैठकर, उसे बदल-बदलकर चलाते हुए गौतम-संगीत-दर्पण तक सरपट खींच ले जाते। साइकिल की कमी नहीं थी। लेकिन, ज़्यादा साइकिल ले जाने पर साइकिल स्टैंड का किराया बढ़ जाता। फालतू का पैसा कौन खर्चा करता। हालत ये थी कि आपस में पैसा जुटाकर कई बार सबसे आगे की सीट पर बैठकर सिनेमा हाल के पर्दे को ठीक उसी तरह से गर्दन उठा-उठाकर देखते, जैसे किसी तारामंडल में नक्षत्रों और आसमान को देखते हैं। शायद ही कोई फ़िल्म छूटती। सप्ताह भर में तीन फ़िल्में देखना तो एकदम तय सा था। ज़माने में पता नहीं कहां से इतनी दोस्तियों की भरमार थी। इनमें कोई हिसाब-किताब भी नहीं था। ज़्यादातर चीजें जो किसी एक के पास थीं, वो सभी की हो जाती थीं। एक बार हम लोगों को तैराक़ी का शौक चढ़ा। गंगा जी घर से ज़्यादा दूर नहीं थीं। बचपन से ही गंगा में डूब-उतरा के मैं अच्छा तैराक़ बन चुका था। बाक़ी लोगों को भी कुछ न कुछ हाथ पांव मारना आता ही था। किसी ने अपने गांव की गढ़ई में हाथ-पांव मारे थे, तो किसी ने बरसाती नदी में। गर्मियों के दिन थे। सुबह साढ़े पांच-छह बजे हम नहाने के लिए तौलिया और कपड़े लेकर निकलते। हमारे रास्ते में कम से कम तीन चौराहे पड़ते थे। यहां पर सुबह-सुबह ही लोग नींबू पर सिंदूर लगाकर, दो-चार दाने चावल के डालकर, जल चढ़ाकर अपनी मुसीबतों को चौराहों पर छोड़ आते। इन मुसीबतों के साथ कई बार दो-चार रुपये की रिश्वत भी होती थी। सुबह-सुबह इन टोटकों को देखकर हमारी बांछें (रागदरबारी की भाषा में कि अब चाहे वे शरीर के जिस भी हिस्से में हों) खिल जाती थीं। रास्ते में पड़ने वाले सारे नींबूं हमारी जेबों में भर लिए जाते थे। ज़ाहिर है कि सिक्के भी उठाने से कौन हमें रोकता। हम गंगा जी तक पहुंचते तो किनारे पर तौलिया और कपड़े रखकर पानी में छलांग लगा देते। ख़ूब नहाते। कई बार इतना कि हमारी आंखे लाल हो जातीं। हमारे यहां गंगा का पानी एक ख़ास क़िस्म का मटमैला था। देर तक नहाने पर इस मटमैले पन के निशान हमारे चेहरे पर बचे रह जाते। त्वचा ख़ुश्क़ हो जाती। बालों में लगता कि जैसे बालू घुस गई हो। लेकिन, परवाह किसे थी। बार-बार पानी में कूदने, फिर धूप में बैठने, फिर पानी में कूदने के चलते हमारे चेहरे भी काले और तांबई होने लगते। हमारे शरीर छिपकलियों की तरह चुस्त-दुरुस्त और चीमड़ थे। कहीं से कोई चर्बी नहीं। मांस का कोई अलग टुकड़ा नहीं। सिक्स पैक एब्स। पेट एकदम पीठ से चिपका हुआ। मसला यह कि डेढ़-दो घंटे नहाने के बाद जब हम पानी से निकलते थे तो ऐसा लगता कि वहीं पर खाट बिछी हो और वहीं पर गिर पड़े। लेकिन, ऐसी सुविधा वहां कहां मिलती। गंगा के किनारे ही हमारे एक मित्र ने कमरा लिया हुआ था। यह एक ऐसा शहर था, जहां पर तमाम नौजवान अपने तमाम सपनों को लेकर आया करते थे। अपने इन सपनों को परवान चढ़ाने के लिए वे अपने छोटे-छोटे दड़बे नुमा कमरों में बंद हो जाते। पसीने से लथपथ दिन भर कंपटीशन की मोटी-मोटी किताबों में छपे काले अक्षरों पर अपनी आंखे फिराते रहते थे। सपनों को परवान चढ़ाने के लिए आने वाले कुछ ऐसे ही लोग हमारे भी हत्थे चढ़ जाते थे। हमारी दोस्तियों के दायरे में विस्तार हो जाता था। ऐसे ही एक दोस्त का कमरा गंगा के किनारे था। हम नहाकर लौटते तो थकान के मारे सीधे उसके कमरे पर पहुंच जाते। उसके पास ज़्यादा बर्तन नहीं थे। तो कुकर में एक सीटी लगाकर चाय बनाई जाती। उस चाय में हमारे टोटके वाले नीबूं निचोड़े जाते। स्टील के गिलास में वह नींबू की चाय उस समय अमृत जैसे ही लगती। हम कहते कि समुद्र मंथन से जो अमृत निकला होगा, वह यही होगा। लोगों ने उसका नाम बदल दिया है। बस। गर्मियों के दो-तीन महीनों तक यह सिलसिला जरूर चला होगा। इस दौरान हमने न जाने कितने लोगों के टोटकों को अपने माथे पर ले लिया। कितने लोगों की मुसीबतों को अपना बना लिया। कितने लोगों के चढ़ाए हुए नींबू ने हमारी चाय के स्वाद में इजाफ़ा किया। आज भी लेमन टी के नाम पर वह स्वाद याद आ जाता है। लेकिन, गुरू, सच कहूं तो फिर कभी वो स्वाद ज़ुबान को मिला नहीं। कैसे भी नींबू की चाय बना लो। कुछ कमी सी रह जाती है। शायद उन टोटकों की कमी रह जाती हो। शायद उन मुसीबतों की कमी हो जाती है। कहीं पर ऐसी दुकानें भी होनी चाहिए जो ऑर्गेनिक की तरह ही अभिमंत्रित नींबू की भी बिक्री करे। तब शायद स्वाद आए। (समझ ही सकते हैं कि फोटो ओरीजिनल नहीं है। इंटरनेट से साभार है) #junglekatha #जंगलकथा

Subscribe to Our Newsletter

  • White Facebook Icon

©