महाविनाश के बीच जीवन..

धरती अब तक पांच महाविनाश झेल चुकी है और छठवें महाविनाश से गुजर रही है. लगभग 444 मिलियन सालों पहले धरती पर पहला महाविनाश आया. इस महाविनाश की चपेट में उस समय धरती पर मौजूद जीवन का ज्यादातर हिस्सा काल-कवलित हो गया.

- Kabir Sanjay

जिन भी दोस्तों को हॉलीवुड की एक्श्न, हॉरर या थ्रिलर सीरीज की फिल्में देखने का शौक है, उन्होंने फाइनल डेस्टीनेशन सीरीज की फिल्में जरूर देखी होगी। इस सीरीज में एक कांसेप्ट है। मौत हर किसी के जीवन को समाप्त करने के लिए एक योजना बनाती है। प्लान तैयार करती है। अगर किसी तरह से उसने मौत को मात दे दी। बच गया। तो मौत फिर प्लान बी पर काम करती है। उससे भी बच गया तो प्लान सी पर काम करती है। मौत अपनी कोशिशें बार-बार करती है।

इसी को अब हम कुछ दूसरे संदर्भ में देखेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि हमारी धरती की उम्र लगभग साढ़े चार अरब साल की है। शुरुआत में हमारी धरती अंतरिक्ष में घूमता गैस और धूल का गुबार भर था। लेकिन, धीरे-धीरे यह ठंडी होती गई। ठंडा होने के साथ-साथ इसके ऊपर की परत जमती गई। जैसे उबलने के बाद जब दूध ठंडा होना शुरू करता है तो उस पर मलाई जम जाती है। ऊपर मिट्टी की परत मोटी होने के साथ ही नीची जगहों पर पानी भर गया और समुद्रों का निर्माण हुआ।

धरती की ऊपरी परत कुछ इसी तरह से मोटी होती गई। अंदर खौलते लावे के ऊपर जमी हुई मलाई की मोटी परत की तरह। धरती पर जीवन कैसे पैदा हुआ होगा इसे लेकर तमाम अलग-अलग थ्योरियां हैं। कहा जाता है कि लगभग साढ़े तीन अरब साल पहले समुद्र मे पहली बार इस प्रकार के छोटे कण पनपने लगे थे। फासिल के रूप में जीवन के पहले साइनो बैक्टीरिया के मिलते हैं। ये बैक्टीरिया फोटोसिंथेसिस करते थे और वातावरण में ऑक्सीजन छोड़ते थे। भारत में जीवन के सबसे पुराने निशान 1600 मिलियन पुराने हैं। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और राजस्थान में भी सेडीमेंटरी रॉक में जीवन के सबसे पुराने स्वरूप फासिल यानी जीवाश्म के रूप में मिलते हैं।

जाहिर है कि उत्पत्ति के समय जीवन एक कोशिकीय और सरल था। सरल का मतलब है कि कोशिका अपने आप में पूरी तरह से आत्मनिर्भर थी। यानी वो कोशिका खुद का पोषण भी करती थी और प्रजनन भी करती थी। जीवन के सरल रूपों से जटिल रूप पैदा हुए। कोशिकाएं अलग-अलग कामों के लिए विशेषीकृत होती गईं और ऊतकों का निर्माण हुआ। जीवन के तमाम रूपों के फलने-फूलने के बाद कहानी शुरू होती है महाविनाश की। जिसके बारे में ही कहे जाने का यहां उद्देश्य है।

लेकिन, 375 मिलियन सालों पहले दूसरा महाविनाश आ गया। धरती का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ गया। बहुत सारे जीव इस गर्मी को बरदाश्त नहीं कर पाए। माना जाता है कि समुद्र के नीचे मौजूद ज्वालामुखियों के फूटने से समुद्र के पानी का तापमान बहुत ज्यादा हो गया। बहुत सारा जीवन नष्ट हो गया। समुद्र में पाए जाने वाले 75 फीसदी जीव समाप्त हो गए। लद्दाख की जंस्कार वैली में भी इस महाविनाश का शिकार हुए जीवों के जीवाश्म मिलते हैं।

समय लगा पर धरती इस महाविनाश से उबर गई। लेकिन, लगभग 250 मिलियन सालों पहले फिर से बहुत सारे ज्वालामुखियों के फूटने की शुरुआत हुई। माना जाता है कि यह महाविनाश लगभग दस लाख सालों तक चलता रहा और इसके परिणाम स्वरूप समुद्र में रहने वाले 95 फीसदी जीव नष्ट हो गए। ज्वालामुखियों से निकलने वाली राख और गैस की परत आसमान पर छा गई और इसके चलते धरती पर सूरज की रोशनी का पहुंचना भी बंद हो गया। इसके चलते धरती बेहद ठंडी हो गई। धरती लगभग पूरी तरह से ही मरने लगी।

लेकिन, धरती समाप्त नहीं हुई। उसने मौत को चकमा दे दिया। फिर से जीवन फलने-फूलने लगा। जीवन ने इस बार पहले से अलग रूप धरा। पर लगभग 201 मिलियन सालों पहले फिर से महाविनाश शुरू हुआ। इस महाविनाश ने भी धरती का सत्तर फीसदी जीवन नष्ट कर दिया।

इसके बाद, लगभग 65 मिलियन सालों पहले पांचवा महाविनाश शुरू हुआ। उल्कापिंडों के धरती से टकराने के चलते बहुत ज्यादा एनर्जी और गर्मी पैदा हुई। यह महाविनाश हमारे लिए सबसे ताजा है। इसी महाविनाश के फलस्वरूप धरती पर पैदा होने वाले सबसे बड़े जीव यानी डायनासोर भी विलुप्त हो गए। आपको यह जानकर शायद हैरत हो कि आज से लगभग दो सौ सालों पहले कोई डायनसोर के बारे में जानता भी नहीं था। जब 1820 के बाद पहली बार विज्ञानियों को खुदाई में विशालकाय हड्डियां व फासिल मिलना शुरू हुईं तो उन्होंने अनुमान लगाया कि यह कोई विशालकाय छिपकली जैसा जीव रहा होगा।


अपने जीवन काल से धरती ये पांच महाविनाश झेल चुकी है और छठवें का सामना कर रही है। महाविनाशों में एक बात सामान्य है। धरती पर मौजूद जीवन को नष्ट करने में गर्मी का बहुत बड़ा योगदान रहा है। कभी वो गर्मी हजारों ज्वालामुखियों के फटने से पैदा हुई तो कभी उल्कापिंड के टकराने से। गौर से देखें तो हमने बीते दो सौ सालों में धरती को लगभग वैसा ही गर्म कर दिया है। जिससे जीव-जंतुओं का जीना दूभर हो गया है। इसके चलते जीवों की तमाम प्रजातियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं। ये ऐसी प्रजातियां हैं जो धरती पर जीवन को आधार देती हैं।

खास बात यह भी है कि इससे पहले जो महाविनाश हुए हैं, उनका कारण कोई न कोई प्राकृतिक या खगोलीय घटना रही है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि धरती पर रहने वाली ही कोई प्रजाति इस महाविनाश को जन्म दे रही हो। कुदरत ने अपने लाखों सालों के विकासक्रम में जिस प्रजातियों को सबसे ज्यादा विकसित किया हो, उसी की कारगुजारियां कुछ ऐसी हों कि उससे पूरी धरती के ही खतम होने का खतरा पैदा होने लगे।

इनके विलुप्त होने का मतलब है कि धरती पर जीवन नष्ट होगा। यह हमारे सामने हो रहा है। हम इसे नष्ट होते हुए देख रहे हैं। हमने ज्यादातर जंगल काट डाले हैं। ज्यादातर समुद्रों को जहरीला बना दिया है। ज्यादातर बर्फ को गला डाला है। ज्यादातर नदियों को सुखा डाला है। धरती की उर्वरता नष्ट कर डाली है। कीटों की ज्यादातर प्रजातियां नष्ट होने की कगार पर हैं। मधुमक्खी भी इसी में से एक है। इसमें खास बात क्या है। शायद इस महाविनाश का दौर भी अगले सौ-डैढ़ सालों में पूरा हो जाए। बहुत सारी प्रजातियां नष्ट हो जाएं। बहुत सारी प्रजातियां नष्ट हो जाएं। हो सकता है कि नष्ट होने वाली प्रजातियों में मनुष्य भी शामिल हो।


अगर हम फाइनल डेस्टीनेशन वाली बात पर लौटें, तो यह कहा जा सकता है कि महाविनाश इस धरती को मारने की एक योजना बनाता है। धरती इस मौत को चकमा देती है। लेकिन, हर बार जब महाविनाश खतम होता है तो प्रजातियां वहीं नहीं रहतीं। बल्कि ऐसी प्रजातियां पैदा होती हैं जो नए वातावरण में जीवन जीने के ज्यादा अनुकूल होती हैं। पुरानी प्रजातियां समाप्त हो जाती हैं, नई प्रजातियां पैदा होती हैं।

हो सकता है कि इस महाविनाश से हमारे वर्तमान समय में मौजूद तमाम प्रजातियां सर्वाइव नहीं कर पाएं। लेकिन, इतना तय है कि यह धरती सर्वाइव करेगी। यहां पर जीवन फलेगा-फूलेगा। हो सकता है कि जीवन को हम लोग अभी जिस रूप में देख रहे हैं, आगे जीवन उससे कुछ अलग रूप में दिखे। लेकिन, जीवन दोबारा से पैदा जरूर होगा। क्योंकि, धरती के पास मौत को चकमा देने के हुनर हैं। उसने इससे पहले के पांच महाविनाशों में ऐसा किया है। उम्मीद है कि आगे भी ऐसा ही होगा।

हिरोशिमा, नागासाकी और चेर्नोबिल जैसी जगहें जो न्यूक्लियर हमले या न्यूक्लियर दुर्घटनाओं में नष्ट हुई हैं, वहां भी कुछ समय की चुप्पी के बाद जीवन ने अपने रंग दिखाए ही हैं। हालांकि, एक महाविनाश की तुलना में ये घटनाएं बहुत ही छोटी और तुच्छ हैं।


नोटः यहां पर बहुत सारी घटनाओं को बेहद ही संक्षेप में कहने का प्रयास किया गया है। इसलिए खामियां हो सकती हैं। आप चाहें तो इनकी तरफ ध्यान आकृष्ट करा सकते हैं। इससे लिखने वाले का भला ही होगा।

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