जीवन अनुभवों से हरा-भरा हो, वस्तुओं से घिरा-घुंटा नहीं

दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो अपना सब कुछ सिर्फ़ एक पिट्ठू में बांधकर निकल पड़ते हैं. वे अपने सामान की सूची बनाते हैं कि किन सामानों के बिना उनका काम नहीं चलेगा और पता चलता है कि ऐसे सामानों की सूची सचमुच बेहद कम है. मुझे नहीं लगता है कि उनका जीवन हमसे कम संतोषदायक नहीं होता होगा. वे भरपूर जीवन जीते हैं. अपने आसपास वस्तुओं का अंबार लगाने की बजाय वे दुनिया और जीवन के अनुभवों का अंबार लगाते हैं. हर क्षण समृद्ध होते हैं.

- कबीर संजय

इंसान की ज़रूरतें बहुत सीमित हैं. लेकिन, लालच का कोई अंत नहीं. यूं तो मिनिमलिज़्म के बारे में थोड़ा बहुत मैं पहले भी जानता था. लेकिन, हाल ही में नेटफ्लिक्स पर मैंने एक फ़िल्म देखी. मिनिमलिस्ट! फ़िल्म को देखकर कुछ बातें समझ आईं. उन्हीं को आपके साथ साझा कर रहा हूं. वास्तव में अगर हम अपने आस-पास ध्यान गड़ाएं तो हमें वस्तुओं का अंबार दिखाई देगा. तमाम क़िस्म की वस्तुएं. बाज़ार हमारे अंदर हर क्षण असंतोष पैदा करता है. यह असंतोष व्यवस्था के प्रति नहीं है. यह असंतोष वस्तुओं के प्रति है. हम जो फ़ोन इस्तेमाल कर रहे हैं. उससे असंतुष्ट हैं. जो लैपटाप इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे असंतुष्ट हैं. हमें अपनी कार छोटी लगती है. हमें अपना घर छोटा लगता है. टीवी का स्क्रीन छोटा है और उसमें फ़ीचर भी बहुत ही कम हैं. हर फ़ैशन के हिसाब से हमारे पास कपड़े नहीं हैं. हर चीज़ के प्रति असंतोष को उकसाने के बाद बाज़ार हमें उसे ख़रीद लेने के लिए उकसाता है. दुनिया के बहुत उन्नत क़िस्म के दिमाग़ इसमें लगे हुए हैं कि कैसे किसी को असंतुष्ट किया जाए, फिर उसे ख़रीदने के लिए उकसाया जाए. हम अपने फ़ोन के सत्तर फ़ीसदी फ़ीचर्स का इस्तेमाल नहीं करते या मामूली इस्तेमाल करते हैं. हमारे लैपटाप की क्षमताओं का बीस फ़ीसदी इस्तेमाल भी नहीं हो पाता. फिर भी बाजार हमें कहता है कि अब नया वर्ज़न आ गया है। इसे ले लो. हासिल कर लो. आपने देखा होगा कि कैसे आईफ़ोन के नए वर्ज़न के लिए लोगों की पहले से क़तारें लग जाया करती थीं और लोग दुकान ख़ुलने का इंतज़ार किया करते थे. जब लोग ऐसे नहीं ख़रीद पाते तो बाज़ार हमें बताता है कि कीमतें बहुत कम हो गई हैं. अब अगर चूक गए तो फिर कभी नहीं ख़रीद पाएंगे. बाज़ार हमारे अंदर एक लत पैदा करता है. यह एक तरह का एडिक्शन है. यक़ीन मानिये कि शराब और अफ़ीम से कम यह एडिक्शन नहीं है. इस एडिक्शन के मारे लोग अपने आसपास तमाम क़िस्म की संपत्ति जमा करते, वस्तुओं का अंबार लगाते हुए, ख़ुद से ऊबे हुए, अपने रिश्तों से ऊबे हुए, अपनी ज़िंदगी से ऊबे हुए, हमारे आसपास ऐसे तमाम लोग दिखाई दे जाते हैं. बच्चे जिस समय छोटे रहते हैं, उस समय जो भी उनकी केयर करता है, उनके साथ समय बिताता है, उससे वे जीवन भर सबसे ज़्यादा लगाव महसूस करते हैं. आज हमने अपना विकल्प उन्हें पकड़ा दिया है. उन्हें मोबाइल और आईपैड पकड़ा दिया है. वे अपने मां-बाप से कम और मोबाइल और आईपैड से ज़्यादा लगाव महसूस कर रहे हैं. उसके साथ ज़्यादा समय बिताते हैं. इसमें बच्चों का भला क्या दोष. यह एडिक्शन तो हम ख़ुद उनमें पैदा कर रहे हैं. दुनिया में एक विचार शृंखला है. मिनिमलिस्टों की. इसे सादा जीवन उच्च विचार भी कह सकते हैं. इसे थोड़ी सी ज़मीन-थोड़ा आसमान, तिनकों का बस इक आशियां भी कह सकते हैं. दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो अपना सब कुछ सिर्फ़ एक पिट्ठू में बांधकर निकल पड़ते हैं. वे अपने सामान की सूची बनाते हैं कि किन सामानों के बिना उनका काम नहीं चलेगा और पता चलता है कि ऐसे सामानों की सूची सचमुच बेहद कम है. मुझे नहीं लगता है कि उनका जीवन हमसे कम संतोषदायक नहीं होता होगा. वे भरपूर जीवन जीते हैं. अपने आसपास वस्तुओं का अंबार लगाने की बजाय वे दुनिया और जीवन के अनुभवों का अंबार लगाते हैं. हर क्षण समृद्ध होते हैं. अपने वार्डरोब में ऐसे कपड़ों को जमा करने से क्या फायदा, जिन्हें कभी पहना नहीं जाने वाला है. ऐसे पैसे जोड़ने से क्या फायदा, जिसका उपयोग नहीं किया जाने वाला. जिंदगी बहुत क़ीमती है और जीवन जीने के लिए सिर्फ एक बार मिलता है. सचमुच ज़रूरतें बहुत सीमित हैं. एक बार गंभीरता से उस पर सोचा तो जाना ही चाहिए. बाज़ारवाद के राक्षस की जान भी इसी तोते में छिपी है. इसकी गर्दन मरोड़ने की जरूरत है. हमारा जीवन अनुभवों से हरा-भरा हो. वस्तुओं से घिरा-घुंटा न हो.

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