धरती की सतह पर गिरते देखे गए उल्का पिंड

उल्का पिंड सामान्य तौर पर धूमकेतु या क्षुद्रग्रह का टुकडा होते है, जो पृथ्वी के वायुमंडल में गिरते है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये पथरीले उल्कापिंड, कार्बनिक चट्टानी सामग्री से बने होते है। मंगल और बृहस्पति के ग्रहों के बीच क्षुद्रग्रह बेल्ट में भी उल्कापिंड उत्पन्न होते हैं। एक उल्कापिंड का आकार रेत के कण से लेकर एक कार से बड़ा भी हो सकता है।

-Khidki Desk


रविवार शाम तकरीबन 8 बजे पृथ्वी की सतह पर कुछ उल्का पिंडों उत्तराखंड के अल्मोड़ा, हल्द्वानी, और बाजपुर से गिरते हुए देखे गए हैं. उल्का पिंड के गिरते हुए देखे जाने की पुष्टि अल्मोड़ा स्थित अंतरिक्ष एस्ट्रोनामी क्लब के खगोलविद् राकेश बिष्ट ने की है. हांलाकि उन्होंने बताया कि

"इन उल्का पिंडों के गिरने की निश्चित जगह का अभी पता नही लगाया जा सका है, और ये उल्का पिंड कहाँ पर समाप्त हुए इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नही की जा सकी है.” उन्होंने ये भी कहा कि “हो सकता है कि यह पूरी तरह हवा में ही जल गया होगा या फिर इसका कुछ अवशेष जमीन पर भी गिरा हो.”

उल्का पिंड सामान्य तौर पर धूमकेतु या क्षुद्रग्रह का टुकडा होते है, जो पृथ्वी के वायुमंडल में गिरते है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है ये पथरीले उल्कापिंड, कार्बनिक चट्टानी सामग्री से बने होते है। मंगल और बृहस्पति के ग्रहों के बीच क्षुद्रग्रह बेल्ट में भी उल्कापिंड उत्पन्न होते हैं। एक उल्कापिंड का आकार रेत के कण से लेकर एक कार से बड़ा भी हो सकता है।


अल्मोड़ा स्थित अंतरिक्ष एस्ट्रोनामी क्लब के खगोलविद् राकेश बिष्ट ने बताया कि जब उल्कापिंड उच्च वेग से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करता है, यह एक चमकदार घटना होती है जिसे हम उल्का या शूटिंग तारा कहते हैं। एक बहुत ही चमकीले उल्का को एक आग का गोला कहा जाता है और अगर इसे स्मोक ट्रेन और डेटोनेशन (जो अक्सर उल्कापिंड पैदा करता है) के साथ जोड़ा जाता है, तो इसे एक बोल्ट कहा जा सकता है। उल्कापिंडों में कार्बन युक्त, यौगिक, जीवित जीवों के आणविक आधार होते हैं, और कभी-कभी पानी के निशान भी होते हैं, जो यह सुझाव देते हैं कि जीवन के लिए सामग्री हमारी दुनिया में पैदा होने से पहले उत्पन्न हुई होगी।


इस उल्का पिंडों के धरती पर गिरने से आम जन को भ्रमित या घबराना नहीं चाहिए, समान्यया इन उल्का पिंडों का आकर काफी छोटा है, इसलिए इसके धरती पर गिरने के बावजूद नुकसान बहुत कम होते है, लेकिन कभी कभी जब इन उल्का पिंडों का आकर अगर बहुत बड़ा हो और ये इनकी धरती पर गिरने की गति भी तेज हो तो ये यह उल्का पिंड वायुमंडल में पूरी तरह जल नही पातें है, जिससे ये पृथ्वी की सतह गिरने के बाद पृथ्वी की सतह को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं. एरिज़ोना की पहाड़ियों पर बने क्रेटर और महाराष्ट्र की लोनार लेक उल्का पिंड के धरती के सतह पर गिरने का एक उदहारण है.

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