• Krishan Joshi

'वो मैराथन जो मेरे बचपन का सपना था'

Updated: Apr 13

उस दिन इस मुंबई मैराथन को टीवी पर देखने के बाद मेरे ज़ेहन में एक सपने ने दस्तख़ दी. एक ख़ुली आंखों से देखा ऐसा सपना जो कभी ढलता नहीं जब तक कि आप उसे जी ना लें. ख़ुद को ललकारते हुए मेरे भीतर एक गूंज पैदा हुई, ''एक दिन मैं भी जरूर मैराथन दौड़ुंगा!'' इसकी साश्वत अनुगूंज ने मुझे आज यहां ला खड़ा किया था, भरपूर रोमांच के साथ उन साहसी धावकों के बीच जिन्हें पूरी बया​लीस किमी की दौड़ लगानी थी.

- कृष्ण जोशी


मैराथन! मुहावरों में मैराथन से गुजरना कई बार हुआ है, या फिर उन तस्वीरों या विडियोज़ से गुजरना जो कि मैराथन के माहिर ख़िलाड़ियों की, हम बचपन से देखते आए हैं. पर अचानक जब आप भरपूर रोमांच के साथ उन साहसी धावकों के बीच ख़ुद खड़े हों जिन्हें पूरी बया​लीस किमी की दौड़ लगानी है तो यह एहसास बिल्कुल अलग है. बचपन का एक ऐसा गोलू-मोलू लड़का, जिसके लिए 1 किलोमीटर भागना भी मुश्किल रहा हो वह एक साथ इतना भागेगा! मैराथन असल में 42.167 किमी की रेस होती है. बेशक़ ये बहुत लम्बी दूरी है और इसके लिए काफ़ी प्रैक्टिस की ज़रुरत होती है. प्रैक्टिस की शुरुआत अपनी कुल क्षमता में धीमे-धीमे, कुछ-कुछ किलोमीटर जोड़ते जाने से होती है और इसकी तैयारी का आधा पड़ाव है, हाफ़ मैराथन. हाफ़ यानि आधा, यानि 21.0975 किलोमीटर की दौड़. जो कि 42.167 किमी की मेराथन से स्वाभाविक है कम ही है. तो कुछ एक साल की तैयारी के बाद मैंने भी कोलकाता में आयोजित एक मैराथन में आपना नाम दाख़िल कर लिया. मेरी क़द काठी को बचपन में जिसने देखा होगा वे जानते हैं कि ये कितना बड़ा अवसर होने वाला था मेरे लिए! एक राज़ की बताऊं! इसकी शुरुआत बचपन में एक सपने से हुई. लेकिन खुली आंखों से देखे एक ऐसे सपने से जो कि फिर नज़रों से हटा ही नहीं. जाने कौन सा साल रहा होगा, टीवी पर मुंबई मैराथन का सीधा प्रसारण चल रहा था. बहुत सारे लोग, जिसमें नेता, अभिनेता, बच्चे, जवान, अधेड़, बूढे, ये सारे लोग सुबह-सुबह सड़को पर निकल पड़े थे दौड़ने को. अद्भुत् नज़ारा था. लेकिन कुछ घंटों में देखा तो बस कुछ ही लोग इस दौड़ में शेष रह पाए थे. प्रतिशत में कहें तो शुरूआत करने वाली भीड़ का अंदाजन 10 प्रतिशत लोग ही पूरा ख़त्म कर पाए थे, इस मैराथन को. इसकी तकनीक़ी गुत्थी मेरे सामने बाद में खुली. ऐसा असल में इसलिए हुआ था क्योंकि एक मैराथन के इवेंट में, 4 क़िस्म के सब-इवेंट्स होते हैं। मैराथन, हाफ़ मैराथन, 10 किलोमीटर और 5 किलोमीटर फ़न रन. इसमें प्रतिभागियों की सँख्या आम तौर पर दूरी के विपरीत अनुपात में होती है. उस दिन इस मुंबई मैराथन को टीवी पर देखने के बाद मेरे ज़ेहन में एक सपने ने दस्तख़ दी. एक ख़ुली आंखों से देखा ऐसा सपना जो कभी ढलता नहीं जब तक कि आप उसे जी ना लें. ख़ुद को ललकारते हुए मेरे भीतर एक गूंज पैदा हुई, ''एक दिन मैं भी जरूर मैराथन दौड़ुंगा!'' इसकी साश्वत अनुगूंज ने मुझे आज यहां ला खड़ा किया था, भरपूर रोमांच के साथ उन साहसी धावकों के बीच जिन्हें पूरी बया​लीस किमी की दौड़ लगानी थी. यह सन् दो हज़ार बीस में फ़रवरी महीने की बीसवीं तारीख़ थी. इसे अंकों में लिखा जाए तो 20/02/2020. दो और शून्य का शानदार कॉम्बिनेशन. रविवार की सुबह कोलकता मे रेंजर मैदान के सामने सुबह 6 बजे ये हाफ़ मैराथन शुरू होने वाली थी. हालांकि हरदीप जी और मैं सुबह 5 बजे ही वेन्यू की ओर निकल गए थे, पर कोलकाता की सड़कों को मैराथन के लिए जगह-जगह बंद कर दिया गया था. तो हम गाड़ी से इवेंट तक नहीं पहुंच सकते थे. इसलिए हमने सोचा कि क्यों ना भाग कर ही पहुंचा जाय स्टार्टिंग पॉइंट तक, जो कि तीन किलोमीटर की दूरी पर था. पहले ही बहुत समय बीत चुका था और लेट हो जाने की आशंका थी, तो ये दौड़ यहीं से शुरु हो गयी. जब तक हम इवेंट मे पहुंचते काउंट डाउन स्टार्ट हो चुका था लोग स्ट्रेचिंग करके स्टार्ट लाइन पर पहुंचने लगे थे. करिश्माई क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने फ्लैग दिखा कर इवेंट को स्टार्ट किया. मेरे लिए यह भावनाओं से भर जाने वाला क्षण था. मैं उस स्टार्ट प्वॉइंट पर था जिसका सपना सैकड़ों किलोमीटर दूर पहाड़ों में, कई साल पहले मैंने टीवी पर देखा था. जो सपना मुझे हरदम बेक़रार करता रहा और इतने सालों में मेरे ​ज़ेहन से एकपल भी नहीं उतरा. तो यहाँ से शुरू होती है, मेरी हाफ़ मैराथन. लगभग 700 लोग होंगे, जब दौड़ शुरू हुई. इस भीड़ में भी बहुत कुछ था देखने को जो आपको विष्मय से भर दे. मैंने देखा एक व्हील चेयर पर एक लड़का है, जिसकी आखें ऊर्जा से भरी हुई हैं. एक क़रीब 50 साल की 'जवान' महिला है, जो बिना जूतों के रेस में कूद रही हैं. कुछ विदेशी चेहरे हैं, कुछ बच्चे. कुछ लोग पीठ पर श्लोगन ओढ़े, जागरूगता फ़ैलाना चाहते हैं. और भी ऐसे ही कई लोग. सब दौड़ पड़ते हैं. यह दौड़ असल में पहला स्थान पा जाने की नहीं है. अधिकतर लोगों को बस दौड़ पूरी करनी है, और कुछ को अपनी पिछली दौड़ से बेहतर करना है. लोग एक दूसरे को मोटिवेट करते हुए आगे बढ़ते रहते हैं. एक पेस को बरक़रार रखते हुए. क्यों​कि दूरी बहुत ज़्यादा है, तो इसके लिए शरीर की शक्ति के साथ ही दिमाग़ का भी पूरा इम्तिहान होता है. मैं भी कुछ लोगों को पीछे छोड़ता हुआ आगे बढ़ता गया. शुरू के 10 किलोमीटर कुछ आसान थे. इतना मैं प्रैक्टिस में भागता रहा था. कुछ 58 मिनट में यह दूरी पूरी कर ली. इतने उत्साही लोगों के बीच शायद कोई भी भाग सकता है, 10 किलोमीटर. लेकिन इससे आगे लोग काफ़ी कम होते गए. कुछ मुझसे आगे निकल जाते तो कुछ पीछे रह जाते. और अचानक इतनी भीड़ के बाद आप अकेले हो जाते हैं. हालांकि लगातार चढ़ती हुई सांसों की आवाज़ के बीच इस मैराथन में आपके साथ निरंतर कोई दौड़ रहा है. उसके पद्चाप आप सुन सकते हैं, जो लगातार आपके साथ बरक़रार हैं. वह है, अंतहीन विचारों का एक ऐसा अनवरत् सिलसिला, जो आपसे संवाद करता है, आपकी थकन के बीच आपको हरदम मोटिवेट करता है. कुछ दूर मेरी ही पेस से दौड़ने वाले एक लड़के से मुलाक़ात हुई. आशुतोष नाम था उसका और उसकी ये 10वीं मैराथन थी. उसको मैराथन के बहाने शहर घूमने का शौक था. विक्टोरिया मेमोरियल के सामने से गुजरते हुए मुझे उसकी बात की सार्थकता महसूस हुई. ये मैराथन का रास्ता कोलकाता शहर की कुछ प्रमुख जगहों से होकर गुजर रहा था. ये सब इतना रोमांचक था कि पैरों की दुखन का पता नहीं लग रहा था. बातें करते करते 3-4 किलोमीटर निकल गए. आशुतोष तो कुछ पेस बढ़ा कर आगे निकल गया. उसने अपने अनुभव से अपने पेस का दूरी के साथ मेल करना सीख लिया था. दूसरी ओर मैं अब तक अपना बेस्ट दे चुका था. धीरे-धीरे मेरा पेस कम होने लगा. पांव दर्द करने लगे. कुछ वॉलेंटेएर जो पेन-रिलीफ़ स्प्रे लेकर खड़े थे उन्होंने दर्द भुलाने में कुछ मदद की और इस तरह मैं हांफ़ती सांसों से 19 किलोमीटर पूरा कर पाया. अब हर एक क़दम उठाना मुश्किल हो रहा था. सांसें फूल गई थी. पैर शिथिल पड़ रहे थे. देह की हरक़तों पर क़ाबू धीमा हा चला था. लोग दिख रहे थे, मुझसे आगे बढ़ते हुए. ये अनुभवी लोग थे शायद. कहता था इन्होंने अंतरमन की किसी पोटली में आगे की दौड़ के लिए ऊर्जा बचा कर रखी होगी. लेकिन मैंने तो ऐसी कोई पोटली बनाई ही नहीं थी. संभवत: यह अगली बार के लिए सबक हो. लेकिन ऐसे में एक चीज़ थी जो मुझे मेरे लक्ष्य की ओर धकेल रही थी और वह चीज़ थी मेरा सपना. मैराथन में हिस्सा लेने का मेरा सपना, जिसमें उसे पूरा करने की स्वाभाविक उत्कंठा शामिल थी. यह सपना मुझे किसी तरह खींच कर उस ओर धकेल रहा था जहां तक़रीबन 2-3 किलोमीटर बाद मेरे बीते कई सालों के एक सबसे अहम सपने की मंज़िल थी. अब बस 400 मीटर शेष बच गए थे. शरीर जवाब दे चुका था और पांव में शायद कोई छाला निकल आया होगा, वह भी बुरी तरह दुख रहा था. अब बस ढह जाना था. चूर हो जाना. लेकिन कैसे? फ़िनिश लाइन 200 मीटर भी नहीं रह गई थी. मैं किसी तरह ख़ुद को रगड़ते हुए खींच रहा था. कुछ लोगों ने पीछे से आकर कंधे पर हाथ रखा. वे मेरा हौसला बढ़ाना चाहते थे. अब आख़िर के सौ मीटर बचे थे. मैंने देखा वह व्हील चेयर वाला लड़का मुझे पार कर आगे निकला जा रहा है. उसकी आंखें उत्साह से चमक रही थी, जैसे मेरा हौसला बढ़ाने. ऐसी सकारात्मक ऊर्जा मुझे छू गई, पूरी देह की ऊर्जा को फिर से समेट मैं उसके साथ-साथ दौड़ने लगा और हमने हाफ़ मैराथन की फ़िनिश लाइन साथ साथ पूरी की. यह थी मेरी हाफ़ मैराथन की पूरी कहानी. ऐसा कुछ कर लेना जो तुम्हें कभी लगता हो कि ये असंभव है, बड़ा ही सुखदायी होता है.


कृष्ण, Indian Institute of Technology Kharagpur में

Quality and reliability Engineering के छात्र हैं.

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