मेरे दादा ने मुझे सच्चा हिंदू बनाना चाहा

उनके मुंह से अक्सर मैंने इस्लाम के लिए अपशब्द ही सुने. उलटे हाथ धोते हैं, सूरज की तरफ मुंह करके पेशाब करते हैं. और भी न जाने क्या-क्या. मैं हैरान होता हूं कि संस्कार मेरे दादा जी के दिए हुए हैं फिर भी मेरे अंदर मुसलमानों को लेकर नफरत क्यों नहीं है, जबकि मेरे कर्मकांडी ब्राह्मण और संस्कृति के विद्वान दादा खुद इस्लाम के कट्टर आलोचक थे.

- विवेक आसरी

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अपने दादा को मैंने हमेशा सफेद कुर्ते में देखा. मेरे दादा जी एक कर्मकांडी ब्राह्मण थे. दोनों वक्त राम का नाम लेते थे. हर सेशन करीब घंटा भर चलता था. उस वक्त उनके पास तांबे की एक लुटिया रखी रहती थी जिसमें हर बार धो-मांजकर पानी भरा जाता था. राम नाम के सेशन के बाद वह उस पानी से अपने को और अपने आस-पास की हर चीज को शुद्ध करते थे. राम नाम कर लेने के बाद खाना खाते. खाने में एक रोटी कुत्ते के लिए और एक गाय के लिए निकाली जाती. खाना खाने के बाद वह हमें कहानियां सुनाते थे. वह अद्भुत कथावाचक थे. उन्हें हजारों कहानियां याद थीं. रामायण, महाभारत, भागवत, पुराण सब उन्हें जबानी याद था. और उनसे ही मुझ तक पहुंचा.


उनके मुंह से अक्सर मैंने इस्लाम के लिए अपशब्द ही सुने. उलटे हाथ धोते हैं, सूरज की तरफ मुंह करके पेशाब करते हैं. और भी न जाने क्या-क्या. मैं हैरान होता हूं कि संस्कार मेरे दादा जी के दिए हुए हैं फिर भी मेरे अंदर मुसलमानों को लेकर नफरत क्यों नहीं है, जबकि मेरे कर्मकांडी ब्राह्मण और संस्कृति के विद्वान दादा खुद इस्लाम के कट्टर आलोचक थे.


इसका जवाब मुझे कल मिला. मेरे पापा ने एक किस्सा सुनाया. उन्होंने बताया कि बंटवारे के वक्त हमारे गांव के मुसलमान भी पाकिस्तान चले गए थे. 1990 के दशक में उन चले गए परिवारों में से एक भारत यात्रा पर आया. वे लोग गांव भी आए. और गांव में आकर उन्होंने पंडित गंगा दत्त शर्मा से मिलना चाहा. पता चला कि गंगा दत्त तो अपने बेटे (यानी मेरे पापा) के साथ अब शहर में रहते हैं. वे लोग मेरे दादाजी से मिलने शहर में हमारे घर आए.


पापा बताते हैं कि मेरे दादाजी उन लोगों से मिलकर ऐसे भाव-विभोर हो गए थे. ऐसे प्रसन्न. खूब प्रेम से खाना खिलाया गया. बातें की गईं. और आज रात रुक जाने की गुजारिश भी. मेरे दादा ने नाम ले-लेकर अपने साथियों का हाल चाल पूछा. पता चला कि नसीरू अभी जिंदा है लेकिन बहुत उम्र हो गई है.


जब वे लोग चले गए तो मेरे पापा ने दादाजी से पूछा कि ये लोग तो मुसलमान थे. और मुसलमानों को तो तुम बहुत बुरा-भला कहते हो.


दादाजी ने कहा, इन्हें थोड़े ही कहता हूं. वो तो मुसलमान राजा लोग होते थे जिन्होंने हमारे परिवारों का धर्म परिवर्तन वगैरह करवाया था. ये लोग तो हमारे अपने थे. बहुत अच्छे थे. हमारा साथ उठना बैठना था. बहुत प्यार सम्मान था. ये हमारे गांव के जुलाहे थे. हम कपड़े इन्हीं से रंगवाते थे. ये लोग पाकिस्तान चले गए तो हमें सफेद कपड़े पहनने पड़ गए थे. जब तक ये लोग थे हम लोग रंगीन कुर्ते पहनते थे.


अब मैं समझता हूं कि मेरे दादा के दिए संस्कारों ने मेरे अंदर नफरत क्यों नहीं भरी. क्योंकि मेरे दादा की कहानियों में हमेशा इन्सान के लिए प्यार सिखाया गया. इस्लाम के लिए उनके मुंह से मैंने अच्छाई नहीं सुनी पर इन्सान के लिए बुराई भी नहीं सुनी. और मुसलमानों के खिलाफ कोई कहानी कभी नहीं सुनी. उन्होंने मुझे ये सिखाया कि सबसे प्यार करो, सबका सम्मान करो. किसी को अपने घर से खाना खाए बिना मत जाने दो. किसी को दुख मत पहुंचाओ. अन्याय मत करो. ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि वह मुझे एक सच्चा हिंदू बनाना चाहते थे.


विवेकआसरी वरिष्ठ पत्रकार हैं.

अभी आॅस्ट्रेलिया के सिडनी में रहते हैं.

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