प्रकृति से दूरी की नई प्रकृति

प्रकृति कोई अलग चीज नहीं है। हम खुद प्रकृति हैं। इस बात का अहसास जितना कम होता जाता है। हमारा सहज ज्ञान उतना ही कमजोर होता जा रहा है।

- Kabir Sanjay


चालीस पार कर चुकी हमारी पीढ़ी के लोग निश्चित तौर पर ऐसा बहुत कुछ जानते हैं, जिनसे हमसे आगे की पीढ़ी वंचित रह गई है। मैं सौ से ज्यादा किस्म के पेड़ों को पहचान सकता हूं। जानवरों की सौ से ज्यादा प्रजातियों और पक्षियों की भी पचासियों के किस्मों की शकल मैं जानता हूं। कितनी ही मछलियों के अलग-अलग नाम मैं जानता हूं।


और यह सब कुछ मुझे किसी स्कूल में नहीं पढ़ाया गया। यह मेरे सहज ज्ञान का हिस्सा रहा है। मैं पेड़ पर चढ़ सकता हूं। नदी में तैर सकता हूं। प्रकृति के साथ एकात्म स्थापित करने के क्रम में बचपन से ही यह कुछ मैंने अपने आप सीखा है। जैसे धीरे-धीरे खड़े होकर चलना और अपनी भाषा बोलना। चालीस पार कर चुके मेरे जैसे तमाम लोगों के जीवन में यह सहज ज्ञान शामिल रहा है।


मेरे खयाल से इनसान ने सबसे पहले अपनी कलाकारी गुफाओं की दीवारों पर दिखानी शुरू की। उसने गुफा पर भित्ति चित्र बनाए। अपने अनगढ़ तरीकों से उसने अपने जीवन की सच्चाइयों को उकेरना शुरू किया। इसमें उसने उन जानवरों को शामिल किया जो उनके आस-पास रहते थे, जिनका वे शिकार किया करते थे। वे उनके सहज ज्ञान में शामिल थे। हजारों साल पहले उकेरे गए यह चित्र आज भी हमारे पूर्वजों के सहज ज्ञान और जिजीविषा के प्रतीक हैं और उन्हें सहेज कर रखने की जरूरत है।


मुश्किल यह है कि प्रकृति के साथ यह तादात्म लगातार कम होता जा रहा है। हमसे पहले वाली पीढ़ी प्रकृति के ज्यादा करीब थी। उसके सहज ज्ञान में ज्यादा चीजें शामिल थीं। वह पीढ़ी गेहूं, जौ और जई के सप्ताह भर पुराने पौधे को देखकर भी उन्हें पहचान सकती थी। लेकिन, आज हममें से शायद बहुत सारे लोग ऐसा नहीं कर पाएंगे।


क्या जो सब्जियां हम खाते हैं, उनके पौधों को पहचान सकते हैं। जो फल हम खाते हैं, उनके पत्तों से भी हमारी पहचान हैं। जो साग यानी पत्तियां, जो तने और जो जड़ें हम खाते हैं, क्या उन्हें पहचानते हैं।


खराब बात यह है कि हमसे आगे की पीढ़ी मोबाइल के ढेर सारे मॉडलों को अलग-अलग पहचान लेती है। उसको कारों और बाइकों के बारे में बहुत कुछ पता है। उसके फीचर उसने रटे हुए हैं। कितने जीबी रैम है, कितने मेगा पिक्सल कैमरा। उसके सहज ज्ञान का हिस्सा यही कुछ बनता जा रहा है।


प्रकृति कोई अलग चीज नहीं है। हम खुद प्रकृति हैं। इस बात का अहसास जितना कम होता जाता है। हमारा सहज ज्ञान उतना ही कमजोर होता जा रहा है।


जरूरत इस बात की है कि हम अलग-अलग पेड़ पौधों को उनके नाम से जानें। जीव-जंतुओं को पहचानें और ईको सिस्टम में उनकी भूमिका को जानें। कीट-पतंगे हमारे जीवन का आधार है।


मोबाइल और कारों के फीचर से नहीं बल्कि अपने आस-पास की प्रकृति के साथ बच्चों का परिचय कराएं। हो सके तो खुद भी नो मोबाइल और नो टीवी डे मनाएं। और खुद याद करने की कोशिश करें कि हम कितने पेड़ों को पहचान सकते हैं।


(चित्र भीमबैठका की गुफाओं की दीवारों का है और इंटरनेट से लिया गया है। भीमबैठका भोपाल शहर के पास है। अपने पूर्वजों की जिजीविषा और जीवन को देखने हर किसी को यहां जाना चाहिए)


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