Covid टीके ​के समान​ वितरण के लिए नोबल विजेता अर्थशास्त्रियों ने उठाई आवाज़

नोबल पुरस्कार से नवाज़े गए अर्थशास्त्री जोसेफ़ स्टिग्लिज़ और माइकल स्पैंस ने कहा है कि ग़रीब देशों को कोरोनावायरस महामारी के गहरे प्रभाव से उबारने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की ज़रूरत है.

- Khidki Desk


Covid-19 के ​टीके के इजाद होने के दुनियाभर में असमानता की खाई जिस तरह और उभर कर सामने आई है, उसके ख़िलाफ़ आवाज़ें उठ रही हैं.


इसी क्रम में Institute for New Economic Thinking के Commission on Global Economic Transformation का साझे तौर पर नेतृत्व कर रहे और नोबल पुरस्कार से नवाज़े गए अर्थशास्त्री जोसेफ़ स्टिग्लिज़ और माइकल स्पैंस ने आवाज़ उठाई है.


कमिशन की एक नई अंतरिम रिपोर्ट में दोनों अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि ग़रीब देशों को कोरोनावायरस महामारी के गहरे प्रभाव से उबारने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की ज़रूरत है.


उन्होंने सुझाव दिया है कि वैक्सीन के वितरण में समानता, कर्ज माफ़ी और नक़दी की कमी से जूझ रहे देशों के लिए राजकाषीय संसाधनों को बढ़ाने के उपायों को अपनाना होगा.


स्पैंस ने इस रिपोर्ट में कहा है,

''असाधारण समय में असाधारण क़दम उठाने की ज़रूरत होती है. अगर सख़्त क़दम नहीं उठाए गए, तो विकासशील देशों की विकास की उपलब्धियां अपने ट्रैक से उतर कर सालों, और हो सकता है दशकों पीछे चली जाएं.''

वैश्विक अर्थव्यवस्था के आपस में एक दूसरे से जुड़ाव वाले चरित्र को उजागर करते हुए इस रिपोर्ट में अमीर देशों से अपील की गई है कि वे बौद्धिक संपदा के संरक्षण से जुड़े प्रावधानों को Covid-19 से जुड़े उपचार, जांचों और वैक्सीन उत्पादन से जुड़े उत्पादों के संबंध में या तो कुछ समय के लिए निरस्त कर दें या फिर उनमें सुधार करें.


रिपोर्ट की वर्चुअल लॉंचिंग के मौके पर, स्टिग्लिज़ ने कहा,

जिस तरह के हालात हैं और जो रवैया अभी अपनाया जा रहा है ऐसा ही चलता रहा तो कई विकासशील देशों तक वैक्सीन पहुंचने में कई साल लग जाएंगे. और कोरोनावायरस पर तब तक क़ाबू नहीं पाया जा सकता जब तक कि दुनिया भर में हर जगह इसे ना थाम लिया जाए.

संयुक्त राष्ट्र और डब्लूएचओ समेत कई वैश्विक संस्थाएं भी इस बात को बार बार दोहरा रही हैं.

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