• Rohit Joshi

वनों से बेदखल जन

“…वनों और वन्य जीवन के संरक्षण के नाम पर इन पार्कों और सेंचुरीयों की तय सीमाओं के भीतर आने वाले हजारों गांवों के लोगों को उनके जंगलों से लकड़ी, घास, पत्ती, औषधि, पानी आदि के उनके हकों से वंचित कर दिया गया है। जहांं एक ओर कृषि उत्पादन पर ही आजीविका चलाने वाले इन ग्रामीणों के जंगल से जुड़े सीधे हक प्रभावित हुए हैं, वहीं दूसरी ओर जंगली जानवर उनकी खेती तबाह कर देते हैं, पालतू जानवरों को मार डालते हैं और इंसानों पर हमला होना भी आम बात हो गयी है।…”

उत्तराखण्ड के सम्पूर्ण क्षेत्रफल का तकरीबन 45 फीसदी भाग वनों से ढका पड़ा है, और अगर उच्चहिमालय की सदा हिमाच्छादित रहने वाली चोटियों को छोड़ दिया जाय जो कि वनस्पति रहित क्षेत्र है तो वनों की स्थिति यहां 66 फीसदी क्षेत्रफल को घेरे है।

भारत में राज्यों के लिए कुल क्षेत्रफल का 33 फीसदी वन क्षेत्र होना आदर्श माना गया है। कुल मिलाकर उत्तराखण्ड वनों की दृष्टि से एक समृद्ध राज्य है। इन्हीं वनों के प्रबंधन के लिए उत्तराखण्ड सरकार ने तमाम नीतियां बनाई हैं और बेतहाशा बजट खर्च किया है। लेकिन ये नीतियां, इन्हीं जंगलों के साये में पैदा हुऐ क्षेत्रीय जनसमुदाय को जंगलों का दुश्मन मानती हैं और इन्हें जंगलों से बेदखल करने की हैं।

वनों, वन्य जीवों और पारिस्थितिकी के संरक्षण के नाम पर ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर से ही सरकार ने जनता के जंगलों के अधिकारों पर कानून बनाकर कब्जा कर लिया था, जो आज भी अनवरत् जारी है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर में हिमालयी वनों को सरकार ने प्रचुर कच्चे माल के ख़जाने के तौर पर देखा। मुख्य रूप से वनों से प्राप्त लकड़ी के लिए जंगलों को बेतहाशा काटा गया। पहाड़ों पर तीव्रता से लुड़कती नदियों पर लकड़ी को बहाकर मध्य हिमालय की तलहटी के मैदानी क्षेत्रों में पहुंचाया जाता, और यहां तक लकड़ी के ढुलान के लिए रेल भी पहुंचा दी गई थी।

एक ओर से वनों का बेतहाशा विदोहन हुआ दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार ने वनों के अध्ययन एवं नऐ प्रबन्धन के लिए देहरादून में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट की स्थापना कर स्वयं को वन प्रेमी और संरक्षक दिखलाने का भ्रम भी पैदा किए रखा। यही आलम आजादी के बाद भी बरकार है।

1936 में मशहूर कार्बेट नेशनल पार्क बनाकर स्थानीय जनता के जंगलों से जुड़े हकों को छीनने की शुरूआत हुई। पार्क के 520 वर्ग किमी के क्षेत्र में आने वाले तमाम गांवों के वाशिंदों के अपने जंगल अब अपने नहीं रहे। जंगलों से जुड़ी उनकी छोटी जरूरतें पार्क के कानूनों की मोहताज थी। भारत की आजादी के बाद से वर्तमान उत्तराखण्ड में इसके क्षेत्रफल के 11 प्रतिशत में छः राष्ट्रीय उद्यान (नेश्नल पार्क) और छः पशुविहार (सेंचुरी) बनाए गए हैं।

कार्बेट पार्क के अलावा इन पांच राष्ट्रीय उद्यान में 1982 में चमोली जिले में नन्दादेवी राष्ट्रीय उद्यान और फूलों की घाटी को 625 और 87.50 वर्ग किमी में बनाया गया। 1983 में हरिद्वार और देहरादून जिलों में 820 वर्ग किमी में राजाजी नेश्नल पार्क को, 1989 में उत्तरकाशी जिले में 2390 वर्ग किमी में ‘गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान’ और 1990 में उत्तरकाशी जिले के ही 472 वर्ग किमी में ‘गोविन्द नेश्नल पार्क’ भी बनाया गया।

इसके अतिरिक्त छः वन्य जीव विहारों में, 1955 में ‘उत्तरकाशी’ जिले के 485 वर्ग किमी में ‘गोविन्द पशुविहार’, 1972 में ‘चमोली’ के 975 वर्ग किमी में ‘केदारनाथ वन्य जीव विहार’, 1986 में पिथौरागढ़ के 600 किमी में ‘अस्कोट वन्य जीव विहार’, 1988 में अल्मोड़ा के 47 वर्ग किमी में बिनसर वन्य जीव विहार, 1993 में देहरादून के 10 वर्ग किमी में ‘मसूरी वन्य जीवविहार’, और 1997 में ‘पौड़ी’ जिले में 301 वर्ग किमी ‘सोनानदी वन्य जीव विहार’ बनाए गए।

वनों और वन्य जीवन के संरक्षण के नाम पर इन पार्कों और सेंचुरीयों की तय सीमाओं के भीतर आने वाले हजारों गांवों के लोगों को उनके जंगलों से लकड़ी, घास, पत्ती, औषधि, पानी आदि के उनके हकों से वंचित कर दिया गया है। जहांं एक ओर कृषि उत्पादन पर ही आजीविका चलाने वाले इन ग्रामीणों के जंगल से जुड़े सीधे हक प्रभावित हुए हैं, वहीं दूसरी ओर जंगली जानवर उनकी खेती तबाह कर देते हैं, पालतू जानवरों को मार डालते हैं और इंसानों पर हमला होना भी आम बात हो गयी है।

कानूनों से बधे ये लोग सिर्फ मूकदर्शक बनकर रह जाते हैं। उत्तराखण्ड के अलग राज्य बनने के बाद से गुलदार, भालू, बाघ, सूंअर आदि जंगली जानवरों ने 300 से अधिक लोगों को मार डाला है। इसके अलावा इन जानवरों के हमले में 800 से अधिक लोग गम्भीर रूप से घायल हुए भी हुए हैं।

चाहे इन उद्यानों और विहारों के वन जनता के लिए दुर्लभ हो गऐ हों लेकिन कुप्रबन्धन के चलते तस्करों के लिए ये उद्यान लगभग खुले हैं। जहां से वन्य सम्पदाओं और वन्य जीवों की बेतहाशा तस्करी होती रहती है। राज्य बनने के बाद से यहां अब तक 43 बाघ, 457 गुलदार, और 173 हाथियों की सरकारी तौर पर जान जा चुकी है। इनमें प्राकृतिक रूप से 8 बाघ, 132 गुलदार और 15 हाथी मरे हैं। जब्कि शेष शिकारियों और तस्करों का निशाना बने हैं।

वन्य संरक्षण के लिए घोषित इन क्षेत्रों में अमीर पर्यटकों के लिए बड़ी कम्पनियों व एनजीओ आदि द्वारा वन भूमि पर ही बनाऐ गऐ बड़े-बड़े होटल, रेस्त्रां आदि को वन विभाग ने इको टूरिज्म के विस्तार के नाम पर छूट दे रखी है। वन एवं वन्य जीव संरक्षण के नाम पर तमाम सेंचुरी और पार्क बनाने के अलावा, वन अधिनियम सरीखे कानून ने पूरे राज्य के जंगलों से जनता को बेदखल कर दिया है। जबकि जितने जंगल अब भी जनता के पास ‘वन पंचायतों’ के जरिए हैं, उनकी हालत वन विभाग के जंगलों से बेहतर है।

दरअसल जनता के जंगलों से भावनात्मक रिश्ते भी हैं जब्कि वन विभाग जंगलों के प्रति व्यावसायिक रिश्ते बनाऐ हुऐ है। वनों के प्रति जनता और वन विभाग की मानसिकता को परखने का पर्याप्त उदाहरण यहां है। वन पंचायत के जंगलों को, ग्रामीण तय अवधि तक स्थानीय देवी देवताओं को चढ़ा देते हैं। इस अवधि में जंगलों से किसी भी किस्म का विदोहन धार्मिक आस्थाओं के चलते सफल रूप से प्रतिबन्धित हो जाता है और जंगल भर उठते हैं।

वहीं वन विभाग ने पूरे प्रदेश में बेतहाशा बजट लुटा कर जो जंगल तैयार किए हैं उनमें पतली पत्ती वाले चीड़ के जंगलों की प्रचुरता है। पतली पत्ती के जंगलों के बजाय चैड़ी पत्ती के जंगलों को जैव विविधता के आधार पर ज्यादा उपयोगी माना जाता है। लेकिन चीड़ के जंगल बिना अधिक मेहनत के उग आते हैं, इनका विस्तार तीव्रता से होता है और वन विभाग के लिए ‘लीसा’ उत्पादन कर यह भारी कमाई करते हैं। सो विभाग चैड़ी पत्ती के जंगलों के बजाय चीड़ के जंगलों को प्राथमिकता देता है।

देहरादून में एफआरआई से जुड़ी एक फोटो गैलरी का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन केन्द्रीय पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने कहा था, ‘क्षेत्रीय जनता को साथ लिए बिना जंगलों का वास्तविक संरक्षण संभव नहीं है। उन्हें साथ लेना जरूरी है।’ दरअसल ये जरूरी बातें मंचों में ही सिमट कर रह जाती हैं। जब्कि सवाल यह है कि जंगलों के संरक्षण के लिए बनने वाली वास्तविक नीतियों में क्षेत्रीय जनता को कितनी तरजीह दी जाती है? और वन से जुड़ा प्रशासन और नीति नियंता किस गहराई तक इस बात को समझ भी पाते हैं।

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