संसार की सबसे छोटी प्रेम कथा

बमुश्किल कुछ लम्हों में सिमटी है यह प्रेमकथा.. शायद महज़ आधे या एक घंटे के टाइम स्लॉट में.. ऐसा छोटा सा टाइम स्लॉट जिसे समझने को कई युग भी कम हैं.

- मुकेश प्रसाद बहुगुणा

इससे पहले कि मैं यह कथा सुनाऊं, पहले इस कथा की कथा.

बात सन् 1985 के इसी माह की है. मैं पंजाब में पोस्टेड था. और एक युद्धाभ्यास के लिए अबोहर–फाजिल्का सेक्टर में किसी ग्रामीण क्षेत्र में था. देर शाम को हम तीन लोग वापिस अपने कैम्प लौट रहे थे कि हमारी गाड़ी खराब हो गयी. कैम्प बहुत दूर था तो हमने पास के खेतों में बने एक बड़े मकान में शरण मांगी, जो कि तुरंत मिल भी गयी (हरियाणा-पंजाब-राजस्थान सेक्टर में ग्रामीण फ़ौजियों के स्वागत के लिए तत्पर रहते हैं.) मकान के मालिक सरदार जी वृद्ध आदमी थे. खुशमिजाज़, दोस्ताना स्वभाव से भरपूर. वे विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आये थे. रात्रिपेय और भोज के दौरान उन्होंने यह कथा सुनाई. उनके अनुसार यह सच्चा क़िस्सा था, जो विभाजन के समय के आस पास पंजाब (भारत और पाकिस्तान दोनों ही वाले पंजाब) में क़ाफ़ी प्रसिद्द था.

अब कथा! बमुश्किल कुछ लम्हों में सिमटी है यह प्रेमकथा.. शायद महज़ आधे या एक घंटे के टाइम स्लॉट में .. ऐसा छोटा सा टाइम स्लॉट जिसे समझने को कई युग भी कम हैं.

विभाजन की बात अभी शुरू नहीं हुई थी शायद. रावी के उस पार (अब पाकिस्तान) कोई छोटा क़स्बा था. रावी के इस पार (अब भारत में) के लोगों का स्थानीय बाज़ार यही क़स्बा था- या शायद इसके विपरीत रहा हो, ठीक से याद नहीं.

लड़के और लड़की का नाम भी अब याद नहीं आ रहा. पर पाठकों की सुविधा के लिए उन्हें नाम दे देता हूँ - परवाना और शमा.. परवाना रावी के उस पार क़स्बे के किसी दुकानदार का पुत्र था और शमा रावी के इस पार किसान की बेटी. उम्र दोनों की ही लगभग 16-17 वर्ष.

एक दिन शमा अपनी सहेलियों के साथ क़स्बे में कपड़े खरीदने गयी. इत्तेफ़ाक़न दुकान पर दुकानदार न हो कर उसका बेटा, परवाना मौजूद था. सहेलियों के बीच शमा की नजरें परवाने से मिली, वहां मौजूद किसी ने न कोई आवाज़ सुनी न कुछ देखा. एक बिजली सी कड़क कर कौंधी और बरास्ता आँखों दोनों के दिल में उतर गयी. दोनों के लबों से एक लफ़्ज तक न निकला पर कानों ने जाने क्या कुछ सुन लिया- दिल ने समझ लिया.

एक क्षण पहले दोनों एक दूसरे से अनजान थे.. अब दोनों एक दूसरे को सदियों–जन्मों से जानते थे. शमा अपनी सहेलियों के साथ दुकान बाहर आई और बिना एक बार भी मुड़े, बिना एक बार भी पीछे देखे अपने गाँव की तरफ चल दी. परवाना पीछे–पीछे खिंचा चला आया, बिना कुछ कहे, बिन बुलाये, अनिमन्त्रित, अनियंत्रित.. दुकान बंद तक न की.

सहेलियों ने पीछे देखा. हंसी, फुसफुसाई... हंसी, फुसफुसाई और हंसी... शमा को सताती हुई, शमा कुछ न बोली. कुछ दूर चलने के बाद रावी नदी आ गयी. नदी के दो पाट ताउम्र साथ-साथ चलते हैं, पर कभी मिल नहीं पाते हैं.. यह शायद सबकी प्यास बुझाने वाली नदी की अतृप्त प्यास भी तो है. नदी पर पुल था, लोग कहते हैं कि पुल दो पाटों को जोड़ते हैं.. शायद सही कहते हैं लोग.

आगे-आगे ख़ामोश चलती, ख़ुद से जाने क्या क्या बातें करती शमा.. और उसके साथ हंसी–ठिठोली करती सहेलियों का झुण्ड. शमा सब सुन भी रही है पर उसे कुछ सुनाई भी नहीं दे रहा. पीछे पीछे शमा के हर पद चिन्ह पर पैर रखता परवाना. पुल के बीच जा कर अचानक सहेलियां रुक गयी और परवाने से पूछने लगी-

''ए तू हमारे पीछे क्यों आ रहा है ?''
''जहाँ यह जायेगी वहीँ मैं भी जाऊँगा.''
''तू पागल है क्या?''
''हाँ.''

बात बढ़ी. लड़कियों ने परवाना का उपहास शुरू कर दिया. शमा और परवाना अभी तक आपस में एक शब्द न बोले. लड़कियों ने फिर मज़ाक करना शुरू कर दिया.

''तू तो ऐसा दीवाना लग रहा है कि जैसे जो ये कहे वही करेगा तू ?''
''हाँ.''
''ये कहेगी कि मर जा तो मर जाएगा तू ?''
''हाँ.''
''ये कहेगी कि इस पुल से दरिया में कूद जा तो कूद जाएगा तू ?''
परवाना एक पल न ठिठका, बोला ''ये कहेगी तो कूद जाऊँगा.''
अचानक शमा बोल पड़ी – "तो कूद जा.."

परवाने ने एक नज़र शमा की तरफ देखा.. आगे बढ़ा .. और पुल से नीचे बहते गहरे दरिया में छलांग लगा दी, रावी ने उसे अपने आगोश में सदा के समेट लिया.. तैरना न आता था उसे शायद.. या फिर डूब कर जीने की हसरत लिए था परवाना. अब तलक हंसती-बोलती, एक दूसरे को चुटकी भरती सहेलियां एकाएक निष्प्राण, निर्जीव, चित्रस्थ सी हो गयीं. इससे पहले कि कोई कुछ सोचता और बोलता.. शमा, यंत्रवत, किसी अनजान डोर से खिंचती हुई सी आगे बढ़ी और ठीक उसी जगह से, जहाँ से परवाना कूदा था, दरिया में कूद गयी, रावी की गहराइयों में सदियों से इन्तज़ार कर रहे आतुर बाहें पसार निर्बाध प्रेम की बाहों में अनंत तक के लिए डूब जाने को.

सृष्टि का वह प्रथम क्षण जब आदम और हौव्वा के बीच प्रथम प्रेम के प्रथम अंकुर ने जन्म लिया था, तब से अब तक परवाने तो शमा की तपिश में ख़ाक होते आये हैं. लेकिन किसी परवाने के इश्क में कोई शमा लाखों सालों में एक ही बार डूबती है.

बाद में कभी किसी ने उस स्थान पर नदी के पास एक समाधि बना दी. विभाजन से पहले उस स्थान पर वर्ष में मेला सा लगता उस ख़ास दिन.

महज चंद घंटों की इस प्रेमकथा को समझने के लिए कई युगों तक जीना होता है.. हर रोज़.. हर पल..रावी के अविरल प्रवाह की मानिंद.

(तेरी कुडमाई हो गयी है ? धत्त.. चंद्रधरशर्मा गुलेरी जी लिखित अमर प्रेमकथा -“उसने कहा था “ के बाद यही कथा मुझे सबसे ज्यादा याद आती है. पंजाब-हरियाणा के मित्रों से आग्रह रहेगा कि वे अपने बुजुर्गों से इस कथा के बारे में दरियाप्त करें, और मुझे भी बताएं, शायद लाहौर - अमृतसर के आसपास के गाँवों की कथा है यह. )

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