सोशल डिस्टेंसिंग पहले से थी, कोरोना ने बस उभार दी

विभाजन, अकाल और विश्व युद्ध जैसी त्रासदियों के पन्नों से गुजरना मैं इसलिए भी ज़रूरी समझता हूं क्योंकि अकादमिक मूल्य से इतर इन सबका मेरे लिए निजी मूल्य भी है. मैं उस दर्द और क़सक़ को महसूसना अपनी व्यक्तिगत् ज़िम्मेदारी समझता हूं. कई मायनों में यह संजीदगी मेरे लिए मनुष्य बने रहने का अभ्यास है.

- अभिनव श्रीवास्तव


मैंने भारत के विभाजन को नहीं देखा, लेकिन इतिहास के उन अध्यायों और विवरणों से ज़रूर गुज़रा हूं जहां उन हज़ारों-हज़ार लोगों का अकल्पनीय दर्द और अपनों और अपनी मिट्टी से दूर हो जाने की क़सक़ दर्ज है जो विभाजन की त्रासदी में या तो मारे गए या ज़िन्दगी भर के लिए किसी गहरे सदमे के साथ जीने को मजबूर कर दिए गए.


विभाजन, अकाल और विश्व युद्ध जैसी त्रासदियों के पन्नों से गुजरना मैं इसलिए भी ज़रूरी समझता हूं क्योंकि अकादमिक मूल्य से इतर इन सबका मेरे लिए निजी मूल्य भी है. मैं उस दर्द और क़सक़ को महसूसना अपनी व्यक्तिगत् ज़िम्मेदारी समझता हूं. कई मायनों में यह संजीदगी मेरे लिए मनुष्य बने रहने का अभ्यास है.


लेकिन मौजूदा वक़्त हमारी आंखों के सामने दर्द, बेबसी और मृत्यु का ऐसा आख्यान रच रहा है जिसकी मिसाल इतिहास और शायद निकट भविष्य में भी मिलना दुर्लभ है. देश के अलग-अलग हिस्सों से अपने घर लौटने की आस में मज़दूरों और उनके परिवारों की अमानवीय स्थितियों में तिल-तिलकर मरने की ख़बरें हमारे उत्तर-आधुनिक समय और उसकी विडंबनाओं की सबसे स्याह तस्वीर है.


इन तस्वीरों में देश की सरकार की क्रूरता, उसका अट्टाहस और देश के तथाकथित संभ्रांत वर्ग की अश्लीलता सब कुछ जैसे बिल्कुल साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है. ये कहने में गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि बीते दो महीने में देश के एक बड़े हिस्से को ना सिर्फ़ मौत के मुंह में धकेला गया है बल्कि एक तरह से उसकी हत्या की पटकथा बुनी गई है. इस पटकथा को बुनने में सरकार और देश की मीडिया ने एक बेहद शर्मनाक भूमिका निभाई है. कई-कई स्तरों पर पहले ही चली आ रही सोशल डिस्टेंसिग को कोरोना महामारीने जैसे बिल्कुल उघाड़ कर रख दिया है.


लेकिन हमारे समय की एक कहीं बड़ी विडंबना ये है कि दुनिया भर में पॉपुलिस्ट शासकों ने अपनी सत्ता और प्राधिकार सड़कों पर दबे-कुचले और खून से लथपथ पड़े इन लोगों के प्रतिनिधित्व के नाम पर ही हासिल की है. यहां ब्रेख़्त को याद करना अस्वभाविक नहीं है जो अक्सर सवाल उठाते थे कि 'ऑल दि पॉवर कम्स फ्रॉम दि पीपुल बट वेयर डज इट गो'. हमारे देश में यह संदर्भ थोड़ा और जटिल है क्योंकि हिंदुत्व की विचारधारा इस पॉपुलिज्म को कहीं खतरनाक और आक्रामक बना देती है.


नरेंद्र मोदी की परिघटना के कुछ सूत्र इस संदर्भ से मिलते हैं. हालांकि यह परिघटना अपनी ऐतिहासिक निर्मिति से इतर कुछ और भी है. मोदी जिस तरह से 'आम लोगों के प्रधानमंत्री' होने और अपने 'मन की बात' उन तक पहुंचाने का एस्थेटिक्स गढ़ते हैं, उससे मोदी परिघटना कई स्तरों पर बहुत जटिल हो जाती है. सत्ता में होते हुए भी वे ख़ुद को सत्ता का विक्टिम दिखाने के लिए आए दिन कोई न कोई आधुनिक ट्रिक तलाश लेते हैं और ये मानना होगा कि अक्सर ही इसमें सफ़ल होते हैं. वे भारत की कुछ सभ्यतात्मक विशिष्टताओं को अपने भोंडे और अश्लील एजेंडे के लिए भी बहुत सजगता से इस्तेमाल करते हैं.


लेकिन मेरी स्पष्ट राय है कि मोदी अपनी चमड़ी से बेशक आम दिखने वाले लेकिन दिल से कहीं अधिक आक्रामक और खूंखार पूंजीपति शासक हैं. कोरोना महामारी के दौरान शायद पहली बार सड़कों पर अपना सब कुछ गंवा रहे बेबस मज़दूरों और लोगों की लाशों के आईने में उनका ये खूंखार चेहरा थोड़ा साफ दिखने लगा है. हालांकि इस देश का मीडिया इसको ढंकने की भरसक कोशिश कर रहा है. बिल्कुल स्याह तस्वीर को सफ़ेद बनाकर दिखाने के उसके पास सारे औज़ार हैं. देर-सबेर मोदी कोई न कोई आधुनिक ट्रिक निकालेंगे.

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