इतिहास का वह पन्ना जब मच्छर के भीतर मलेरिया मिला

ये बातें आज के जीव-विज्ञान-छात्रों को बड़ी साधारण जान पड़ती हैं. लेकिन मात्र सवा सौ साल पहले यह सब ज्ञान रहस्य था और अन्धकार में था मलेरिया का मानव-बस्तियों में फैलाव और उससे होने वाली ढेरों मौतें भी. रॉस जैसे ढेरों वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के कारण समझ बेहतर होती गयी और आज हम मलेरिया को टीकाकरण से मिटाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं.

- डॉ स्कन्द शुक्ल


टीवी पर मच्छर भगाने वाली क्रीमों व यन्त्रों के विज्ञापन आ रहे हैं. मच्छर के काटने से मलेरिया हो सकता है , डेंगी भी. फायलेरिया भी इन्हीं से फ़ैलता है और जापानी एनसेफेलाइटिस भी. एक उड़ने वाले नन्हें कीड़े को केन्द्र में रखकर बनाये गये विज्ञापन को देखते हुए मन सोचने लगता है कि दुनिया पिछले सवा सौ सालों में कितनी बदल गयी !


चिकित्सा-नोबेल पुरस्कार : सन् 1902

सर रॉनल्ड रॉस

सन् 1902. ब्रिटिश डॉक्टर सर रॉनल्ड रॉस को मलेरिया-परजीवी व मच्छर पर शोध के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. रॉस जिन्होंने भारत में अपने शोध के दौरान यह सिद्ध किया था कि मलेरिया-परजीवी का विकास मच्छर के शरीर के भीतर होता है. मादा एनोफ़िलीज़ मच्छर से उन्होंने मलेरिया-रोगी हुसैन ख़ान को आठ आने ( एक आना प्रति मच्छर ) क़ीमत देते हुए, कटवाया और फिर मानव-ख़ून पी चुकी उन मच्छरों का सूक्ष्मदर्शी-तले डिसेक्शन किया. अनेक मच्छरों के पाचन-तन्त्र में मलेरिया-परजीवी उपस्थित था और वह वहाँ अपना विकास कर रहा था.


एक परजीवी मनुष्य में कोई रोग पैदा करता है, किन्तु उसका विकास मच्छर और मनुष्य दोनों के भीतर होता है. उसे अपना जीवन जीने के लिए मनुष्य और मच्छर दोनों की आवश्यकता पड़ती है. ये बातें आज के जीव-विज्ञान-छात्रों को बड़ी साधारण जान पड़ती हैं. लेकिन मात्र सवा सौ साल पहले यह सब ज्ञान रहस्य था और अन्धकार में था मलेरिया का मानव-बस्तियों में फैलाव और उससे होने वाली ढेरों मौतें भी. रॉस जैसे ढेरों वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों के कारण समझ बेहतर होती गयी और आज हम मलेरिया को टीकाकरण से मिटाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं.


रॉस ने मलेरिया-संक्रमण को समझने में केवल मनुष्यों ही नहीं, ढेरों शोध पक्षियों पर भी किये. पक्षियों और मच्छरों में मलेरिया-परजीवी के विकास को समझना मनुष्यों में इनके अध्ययन से कहीं आसान भी था. मच्छर के भीतर मलेरिया-परजीवी के विकास को उद्घाटित करने के लिए ही उन्हें चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार दिया गया.


रॉस ने आजीवन मलेरिया पर अपना शोध जारी रखा. मलेरिया की रोकथाम पर उन्होंने दुनिया के कई देशों में बहुत काम किया. वे एक अच्छे कवि-उपन्यासकार-गीतकार भी थे. मच्छर के पाचन-तन्त्र में मलेरिया-परजीवी को सूक्ष्मदर्शी-तले देखने के बाद उन्होंने कविता-रूप में ये पंक्तियाँ लिखीं :


आँसुओं और मेहनतक़श साँसों के साथ, ओ सहस्र-हत्यारिणी मृत्यु मैं तुम्हारे चालाक बीज देखता हूँ ! जानता हूँ यह दिख रही लघुता बचाएगी प्राण कितने ही मनुष्यों के मृत्यु, तुम्हारा डंक कहाँ है?


( चित्रों में डॉ. रॉस , ख़ून चूसती मादा मच्छर एवं उसके पाचन-तन्त्र में विकसित होता मलेरिया-परजीवी प्लाज़्मोडियम।)

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