प्रवासी नेपाली मज़दूरों के लिए और भयानक है मौजूदा लॉकडाउन का संकट

भारत में प्रवासी मजदूरों का यह संकट, उन मजदूरों के लिए और भयावह हो गया है जो कि नेपाल से भारत आए हैं. 300-500 रूपये की दिहाड़ी कमाने वाले ऐसे हज़ारों मजदूर उत्तराखंड में भी हैं. लॉकडाउन की घोषणा इतनी आकस्मिक थी कि प्रवासी मजदूर वापस लौटने के बारे में सोच भी पाते उससे पहले सब कुछ बंद हो चुका था.

- Special Correspondent

कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते देश भर में लागू लॉकडाउन से सबसे अधिक परेशानी का सामना प्रवासी मजदूरों को करना पड़ रहा है. देश के अलग अलग इलाक़ों से ऐसे कई विडियोज़ और तस्वीरें सोशल मीडिया के ज़रिए सामने आ रही हैं जहां लोग राशन-पानी में या तो अपने कमरों में बंद हैं या फिर पैदल ही अपने गांवों की ओर लौट रहे हैं. दिल्ली के आनंद विहार स्टेशन का एक विडियो वायरल हुआ, जिसमें दसियों हज़ार प्रवासी कामगार अपने घरों को वापस लौटने क लिए स्टेशन पहुंचे हैं. ऐसे कई मज़दूरों के रास्ते में ही मारे जाने की भी ख़बरें आई हैं जो कि अपने घरों को लौट रहे थे. भारत में प्रवासी मजदूरों का यह संकट, उन मजदूरों के लिए और भयावह हो गया है जो कि नेपाल से भारत आए हैं. 300-500 रूपये की दिहाड़ी कमाने वाले ऐसे हज़ारों मजदूर उत्तराखंड में भी हैं. अल्मोड़ा के कर्नाटकखोला में एक टीन शेड में अपने चार और साथियों के साथ रहने वाले छियालीस वर्षीय जय बहादुर कहते हैं, ''जब से बंद हुआ है हमें कोई काम ही नहीं मिल रहा. पुलिस सड़क पर उतरने नहीं देती. आज सुबह एक सिलेंडर का ट्रक यहां उतरा तो मैंने कुछ सिलेंडर लोगों के घर पहुंचाए. इससे मुझे 50 रूपये मिले. यही पिछले 6 दिनों की मेरी कमाई है.''  साथ में रहने वाले करन बहादुर बताते हैं, ''हमारा राशन ख़त्म हो गया है. जहां से हम सामान लाते हैं उस दुकानदार ने कहा है कि वह हमें राशन उधार दे देंगे. बाद में मजदूरी करके हम उनका उधार चुकाएंगे. लेकिन वह भी ऐसे कब तक उधार दे पाएंगे?'' लॉकडाउन की घोषणा इतनी आकस्मिक थी कि प्रवासी मजदूर वापस लौटने के बारे में सोच भी पाते उससे पहले सब कुछ बंद हो चुका था. इन्हीं नेपाली मजदूरों में एक नवीन बहादुर कहते हैं, ''शुरू में एक दिन का जनता कर्फ्यू लगा लेकिन फिर कर्फ्यू और बढ़ गया और अब तो काफी सख़्ती भी है. पता नहीं कब तक और यह सब चलेगा. हम तो पैसा कमाने ही परदेश आए हैं. बिना कमाई के हम यहां क्या करेंगे क्या खाएंगे?'' नवीन मायूसी से भरकर आगे कहते हैं, ''हमें परिवार की भी चिंता हो रही है. नेपाल में भी बंदी हुई है. किसी को घरों से बाहर नहीं निकलने दे रहे. वे लोग भी क्या करेंगे?''   जय बहादुर कहते हैं, यह लॉकडाउन बहुत ही अचानक हुआ, ''हमें मौका ही नहीं मिला घर वापस जाने के बारे में सोचने का. अब बॉर्डर भी बंद कर दिया है. पिथौरागढ़ और नज़दीकी इलाक़ों से जो लोग वापस लौटे भी वे भी सीमाओं पर फंस गए हैं.'' इधर उत्तराखंड से लगने वाली नेपाल की सीमा को पूरी तरह बंद कर दिया गया है. धारचूला, जौलजीबी, झूलाघाट, बनबसा, पंचेश्वर आदि जिन भी जगहों से नेपाल जाने के रास्ते हैं वे दोनों ओर से बंद हैं. इन जगहों में सैकड़ों की तादात में नेपाली मजदूर इकट्ठा हो गए हैं. प्रशासन ने फ़ौरी तौर पर उनके ठहरने और खाने-पीने का इंतज़ाम किया है. काम से महरूम हो गए भारत में फंसे जिन नेपाली मजदूरों से Khidki ने बात की उन्हें अब तक किसी भी क़िस्म की राहत सामग्री नहीं पहुंची है. कोई एनजीओ या दूसरे राहत टीमें उनके पास नहीं गई हैं. विदेशी नागरिक होने के चलते सरकारी सहायता योजनाओं में भी उनके लिए कोई राहत की व्यवस्था होगी इसकी गुंजाइश कम है. लॉकडाउन के बेहद शुरूआती दिनों में ही नेपाली मजदूरों के हालात ख़स्ता हो गए. ऐसे में उन्हें चिंता है कि लॉकडाउन के शेष दिनों में उनका गुजारा कैसे होगा?

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