यौन शिक्षा का भूत: #4 सेक्स का झमेला

रमेश, जो कि एक स्वस्थ पुरुष है, हर सेकेण्ड 1500 के लगभग शुक्राणु बनाता है. रमेश के कितने बच्चे हैं ? एक, या दो,या तीन-चार-पाँच-दस-पन्द्रह. इमरती देवी जब पैदा हुई थी, तो बीस लाख अल्पविकसित अण्डे लेकर जन्मी थी. वे सभी कहाँ गये? उनमें से कितने रमेश के साथ मिलकर बच्चों में बदल पाये?

नौ महीनों बाद एक बच्चा पैदा करने के लिए इतनी बर्बादी किसलिए? पुरानी धार्मिक मान्यताएँ जो सेक्स को घिनौना बताती हैं और यौन-क्रिया में हिंसा-वृत्ति देखती हैं, वे कहीं-न-कहीं कुछ ढाँपने-छिपाने का प्रयास कर रही हैं. उन्हें डर था और है कि अगर इस मनुष्य-वृत्ति को ढीला छोड़ा गया तो समाज में बिखराव हो जाएगा. यौन क्रिया को विवाह से जोड़कर देखने के पीछे भी यही बात काम करती है. आदमी की औरत से शादी दो व्यक्तियों का मेल बाद में है: पहले यह जैविकी का सामाजिकी से विवाह है. बायलॉजी को उन्मुक्त छोड़ना सामाजिक ढाँचे और सत्ता को चुनौती देने का काम करने लगेगी. प्रकृति के नियम में सेक्स होता है, विवाह नहीं.


मगर फिर विवाह और यौनकर्म का सम्मेल हर जगह एक सा कहाँ है. वह हो भी नहीं सकता. जैविकी तो हर मनुष्य की एक ही है, क्योंकि वह कुदरती है. लेकिन सामाजिकी मनुष्य ने स्वयं बनायी है. और जो आदमी द्वारा निर्मित वस्तु है, उसमें शाश्वत होने का भाव कैसे हो सकता है?


इसलिए धर्म पर अटूट आस्था स्थापित करने के पीछे का मनोविज्ञान उसे प्राकृतिक साबित करना है, जो वो है नहीं. “आप मान लीजिए कि मेरा वाला मजहब कुदरती है. यह मैंने या किसी आदमी ने नहीं बनाया , यह हमेशा से ऐसे ही था. यह आदिकालिक है. यह प्राकृतिक है.यह मूलतः यों ही था , यों ही है , यों ही रहेगा.”


शाश्वत कुछ भी नहीं है. न कोई समाज , न लोकाचार और न कोई मानव-मूल्य ही. भूगोल तक बदल जाता है. ग्रह-तारे बदल जाते हैं. यहाँ तक की शरीर की क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ भी एक सी सदा-सर्वदा नहीं रहती , न रहेंगी.

आपने सूक्ष्मदर्शी तले अमीबा देखा न भी हो पर उसका नाम शायद ज़रूर सुना होगा. अमीबा जैसे एककोशिकीय प्राणी अमूमन अलैंगिक प्रजनन करते हैं. उनमें हमारी तरह नर-मादा नहीं होते. एक कोशिका कुछ समय बाद दो में बँट जाती है और फिर कुछ समय बाद दो से चार हो जाती हैं. मनुष्य भी तो ऐसे बँट सकता था. एक आदमी से वह दो बन जाता और फिर दो से चार. सेक्स जैसे ताम-झाम की भला क्या आवश्यकता थी?


आम मनुष्य की सोच यह है कि यह बर्बादी केवल पुरुष के शरीर में होती है- वह ही केवल एक अण्डाणु के निषेचन के लिए लाखों शुक्राणु छोड़ता है. ज़रूरत तो केवल एक शक्राणु की है. बाक़ी सभी नष्ट होंगे. लेकिन स्त्रियाँ में बर्बादी नहीं होती, यह सोचना भ्रम है. उनके शरीर में हर माह निकलने वाले एक परिपक्व अण्डाणु के बदले आठ-दस अण्डाणु अर्धविकसित ही नष्ट हो जाते हैं.


रमेश, जो कि एक स्वस्थ पुरुष है, हर सेकेण्ड 1500 के लगभग शुक्राणु बनाता है. रमेश के कितने बच्चे हैं ? एक, या दो,या तीन-चार-पाँच-दस-पन्द्रह. इमरती देवी जब पैदा हुई थी, तो बीस लाख अल्पविकसित अण्डे लेकर जन्मी थी. वे सभी कहाँ गये? उनमें से कितने रमेश के साथ मिलकर बच्चों में बदल पाये?


इस ‘हिंसा’ में, इस नाश के पीछे भी कोई है जो जी रहा है. इस मार-काट से भी किसी का भला हो रहा है. प्रकृति रमेश या इमरती देवी के लिए नहीं सोचती. वह प्रजाति के स्तर पर मनुष्य-जाति के लिए सोचती है. या फिर वह उससे भी बड़ी सोच रखती है और समूचे जीवन के लिए सोचती है. या फिर वह कुछ सोचती ही नहीं. यह सोचना मैं सोच रहा हूँ और आपको सोचवा रहा हूँ. खरबों वीरान तारों और खरबों निर्जन आकाशगंगाओं को ‘सोचकर’ बनाया नहीं गया, नहीं तो इतने पदार्थ के सृजन में किफ़ायत बरती जाती. सुजन-समझदार आदमी सफ़ेद कमीज़ पर काला दाग लगाता है. यहाँ मौत की काली कमीज पर सफ़ेद टीका है ज़िन्दगी का.


सेक्स की तैयारी के लिए की गयी बर्बादी के पीछे मूल उद्देश्य मनुष्य-जाति का उत्तरोत्तर विकास है. हर जीव पैदा नहीं हो सकता; हर जीव को कुदरत पैदा नहीं करना चाहती. वह चाहती है कि सबसे श्रेष्ठ ही प्रजनन के फलस्वरूप संसार में आएं और फिर वे ही प्रजनन करके अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाएँ (‘श्रेष्ठ’ के जैविक अर्थ में, न कि मनुष्यों के दम्भी और शोषक सामाजिक अर्थ में). प्रकृति की यही मूल मंशा है.


लेकिन ऐसा हमेशा हो ही जाएगा ज़रूरी नहीं. उसकी गोद में इंसान ही एकमात्र बच्चा नहीं है. साधारण माइक्रोस्कोपों से न दिखने वाले वायरसों से लेकर भीमकाय नीली ह्वेलों तक उसके पास हर साइज़ का शिशु है. ये बच्चे आपस में भिड़ सकते हैं, एक-दूसरे को चोटिल कर सकते हैं, यहाँ तक कि एक-दूसरे को मिटा भी सकते हैं. फिर जिस गोद में, जिस हाथ में ये सब हैं, वह ही उसका एकमात्र हाथ नहीं. कुदरत के सहस्रों हाथ हैं. वह न जाने कुछ सोचती है और अचानक दूसरे हाथ से इस हाथ की सारी बनावट गिरा देती है. एक ही पल में सब समाप्त! फिर किसी हाथ में नये शिशु गढ़ने लगती है.


लैंगिक प्रजनन इसलिए होता है कि नर और मादा अलग-अलग व्यक्ति हैं, अलग-अलग परिवारों से हैं. उनकी कोशिकाओं में मौजूद डी.एन.ए. में विविधता है. शुक्राणुओं और अण्डाणुओं का निर्माण साधारण कोशिका-विभाजन से नहीं होता, विशिष्ट ढंग से होता है. फिर इस विशिष्ट निर्माण के बाद जब सेक्स होता है तो नर का शुक्राणु मादा के अण्डाणु के डी.एन.ए. से मिल जाता है. दो डी.एन.ए. मिले और जो तीसरा डी.एन.ए. इस दुनिया में आया, वह न पूरी तरह अपने बाप-सा है, न माँ-सा. वह दोनों-सा है और नया भी. जब कोई कहता है कि “मेरी बिटिया मुझसी है” या “मेरा बेटा मुझसा है”, तो वह केवल बाह्य-सतही बात कर रहा होता है या फिर थोड़े-बहुत गुण-स्वभाव की. उसने यह नहीं देखा-जाना होता है कि बिटिया के मस्तिष्क की कोशिकाओं में अमुक काम मम्मी या डैडी किससे मिलता है या फिर हड्डियों का घनत्व किससे मेल खाता है.


आदमी-औरत चमड़ी की सतह-भर नहीं हैं. और भी बहुत-बहुत कुछ हैं उसके भीतर. आपकी सन्तान पूरी तरह से आप-सी तभी हो सकती है, जब वह अलैंगिक प्रजनन से पैदा हो. दो मिलकर किसी को पैदा करेंगे, तो वह दोनों-सा / दोनों-सी होगा/होगी. मिलन से उत्पन्न हुआ यह अंतर, यह बदलाव, ज़रूरी है ताकि मानव विकास करता रहे. संतान में मौजूद विविधता अगर संयोग से पर्यावरण की परिस्थितियों में सटीक बैठी तो नई पीढ़ी की जीवित रहने की सम्भावना और लचीलापन अधिक होगी. सेक्स में शामिल यह बर्बादी और जटिलता इसी सम्भावना की कीमत है.

साभार

डॉ . स्कन्द शुक्ला

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